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उपन्यास समीक्षा :इतिहास के बंद तहखानों से ‘सच’ की तहकीकात :”गद्दार ‘

@ मनीष वैद्य
क़रीब एक सौ साठ साल पहले इतिहास के धुंधलके में छुपी उन अंधी सुरंगों में एक बार फिर ले जाकर यह उपन्यास हमें कई जाने-अनजाने तथ्यों के साथ रोचक क़िस्सागोई के साथ भारत के सबसे पहले स्वतंत्रता संग्राम के उलझे हुए तारों, उनसे उपजे राजनैतिक समीकरणों, उनके पीछे की मज़बूरियों-बेबसियों से हमें रु-ब-रु कराता है।

भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम में झाँसी की रानी के बलिदान को कौन भूल सकता है। सुभद्रा कुमारी चौहान की वह कालजयी कविता ‘ख़ूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी…’ को पढ़ते हुए कौन ज़ोशों-ख़रोश से न भरा जाता होगा। लेकिन इसी कविता की एक पंक्ति बेचैन कर देती है-“अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी…” यह पंक्ति दिखाती है कि स्वतंत्रता के समर में जब पूरा देश क्रांति की मशाल लिए आज़ादी के इन अमर सेनानियों के साथ खड़ा था तब कुछ बड़ी रियासतों ने उनका साथ नहीं दिया। यदि ऐसा नहीं हुआ होता तो 1857 में देश की तक़दीर कुछ और होती।

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पत्रकार राकेश अचल ग्वालियर के बाशिंदे हैं और उनका ताज़ा उपन्यास ‘गद्दार’ ग्वालियर’ शहर और सिंधियाओं पर लगे इस दाग को ठीक ढंग से समझने और उसके पीछे की पृष्ठभूमि को साफ़ करने में हमारी मदद करता है, ऐतिहासिक प्रामाणिकता के साथ। हालाँकि इसके प्रामाणिक होने का वे शुरू में ही खंडन भी करते हैं। यह उपन्यास एक तरफ़ मराठी राजपरिवार और उससे जुड़ी संस्कृति से परिचित कराता है तो दूसरी तरफ़ महल के भीतर और बाहर हो रही साज़िशों से भी रूबरू कराता है।

इस तरह हमें वह इतिहास के कुहासों के भीतर ले जाकर सच को सामने लाने का जतन करते हैं। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि झाँसी की रानी को मदद नहीं करने के आरोप ग्वालियर और उसके सिंधिया परिवार पर लगते रहे हैं। लंबे समय से यह सवाल बार-बार उठाया जाता है। यह उपन्यास सिंधिया घराने और उसके तत्कालीन महाराजा जयाजीराव के सामने आ रही अंग्रेजों की नीतियों और दबावों का भी तरतीब से खुलासा करता है। एक बात और, यदि मैंने इसे नहीं पढ़ा होता तो दीवान दिनकर राव राजवाड़े के चरित्र से कभी मिल नहीं पाता। बाक़ी किरदारों को तो क़िस्सों-कहानियों और लेखों में बहुतेरे पढ़ा है लेकिन इस चरित्र ने मुझे काफ़ी प्रभावित किया। एक तरह से देखा जाए तो झाँसी की रानी को ग्वालियर से मदद नहीं मिलने के पीछे राजवाड़े की अहम् भूमिका है।

सरल-सहज और फ्लो के साथ लिखते हुए लगभग सौ पृष्ठों में उन्होंने उस काल को जीवंत बना दिया है। हालाँकि कुछ जगह उपन्यास विस्तार की मांग भी करता है लेकिन विस्तार के साथ इसके फ़ैल जाने का अपना जोखिम भी था। शायद इससे बचने के लिए ही इसे ‘टू द पॉइंट’ ही रखा गया। यह कथा बहुश्रुत होने के बाद भी उपन्यास पूरी रोचकता के साथ आगे बढ़ता है तो यह इसके लिखे जाने की तरतीब का ही कमाल है। उपन्यास जैसे बड़े फलक की रचना सबसे पहले पाठक से जुड़ने के लिए रोचक होने की अनिवार्य शर्त से बँधी होती है। यह कहना इसलिए और भी मानीखेज है कि वे साहित्य की दुनिया से जुड़े रहने के बावजूद सदैव एक सजग पत्रकार के रूप में ही अपना काम करते रहे हैं, लेकिन बीते महीनों उन्होंने दो उपन्यासों के साथ साहित्य में बकायदा प्रवेश किया है। इसे मैंने एक बैठक में पूरा किया है। पहले से आख़िरी पन्ने तक।

आवरण पर छपा जयाजीराव का चित्र और नेपथ्य में झाँसी की रानी का वह मशहूर युद्धरत चित्र उपन्यास की विषयवस्तु को बड़ी ख़ूबसूरती रेखांकित करता है। पत्रकारिता से इतर राकेश अचल का साहित्यिक हलके में स्वागत के साथ उम्मीद है कि वे आगे और बेहतर कृतियाँ दे सकेंगे।
कुल मिलाकर उपन्यास एक ज़रूरी और मानीखेज विषय पर पूरी तैयारी के साथ लिखा गया है। इसे पढ़ा जाना चाहिए। इतिहास की गुत्थियों को समझने में यह मदद करता है।
गद्दार (उपन्यास)
लेखक-राकेश अचल
प्रकाशक- सन्मति पब्लिशर्स
हापुड़ (उप्र)
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