@शब्द दूत ब्यूरो (28 जुलाई 2022)
काशीपुर। अक्सर देखने में आता है कि छोटी-छोटी जिन ज्वलंत जन समस्याओं को लेकर राजनीतिक दल एवं सामाजिक संगठन आए दिन शोर मचाते नहीं थकते उन समस्याओं के बारे में। यदि यही संगठन रचनात्मक सोच दिखाएं। जो लोग उन समस्याओं को लेकर आंदोलन कर रहे हैं वह खुद मिलकर अपने संसाधनों से उन छोटी-छोटी समस्याओं का समाधान करा दें तो समस्याएं स्वत: ही समाप्त हो जाए। लेकिन विडंबना यह है कि इन संगठनों का ध्यान जन समस्याओं के समाधान की तरफ कम बल्कि अपनी पब्लिसिटी की ओर अधिक रहता है ।यही कारण है कि यह संगठन समस्याओं के समाधान हेतु बंदूक शासन-प्रशासन के कंधे पर रखकर चलाने के शिवाय कुछ नहीं करते।
यह बात सही है कि समस्याओं के समाधान की जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की है। लेकिन राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन भी अपनी जिम्मेदारियों से विमुख नहीं हो सकते। जिन समस्याओं के तत्काल समाधान की आवश्यकता है। उसमें कई बार प्रशासनिक मशीनरी बजट के अभाव एवं लंबी चौड़ी प्रक्रिया के चलते कुछ नहीं कर पाती। जबकि देखने में आया है कि राजनीतिक दल व सामाजिक संगठन चाहे तो तत्काल अपने स्तर से उन समस्याओं का समाधान करा सकते हैं। मगर समाज में एक दूसरे का मुंह देखने की बनती आदत और समाज हित के प्रति बढ़ती गैर जिम्मेदारी जनसमस्याओं के प्रति घातक सोच को जन्म दे रही है ।
बेबाक बात की जाए तो यहां समाजसेवी और मौजूदा भाजपा नेता दीपक बाली का उदाहरण अपने आप में काबिले तारीफ है। जो राजनीतिक दलों तथा सामाजिक संगठनों को आईना दिखाता नजर आता है। नगर के मुख्य चौराहे पर नाला टूटा पड़ा था जो लोगों के लिए जानलेवा सिद्ध हो रहा था। क्योंकि हाईवे है इसलिए सत्ता पक्ष, विपक्ष और शासन प्रशासन के छोटे बड़े अधिकारियों की निगाह इस पर नहीं गई होगी। ऐसा हो ही नहीं सकता। मगर जनता के दुख दर्द को कौन समझे। दीपक बाली की इस पर नजर पड़ी और उन्होंने काम की राजनीति का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए तत्काल अपने पैसे से इस टूटे पड़े नाले का निर्माण करा दिया ।
यह बात अलग है कि जिन संस्थाओं को खुद ध्यान देकर तत्काल नाले का निर्माण कराना चाहिए था वे उल्टे दीपक बाली को ही कोसने लगी। 2021 के करोना काल में जब लोग बुरी तरह मौत का शिकार हो रहे थे तब भी सत्ता में बैठे लोग विफल सिद्ध हुए और दीपक बाली ने विपक्ष में रहते हुए भी वह काम कर दिखाया जो किसी ने नहीं किया ।
उन्होंने दिन रात प्रयास कर राजकीय चिकित्सालय में कोरोना हॉस्पिटल चालू कराकर और अपनी ओर से हर तरह का सहयोग देकर ही नही बल्कि समय-समय पर इसका निरीक्षण कर इसकी व्यवस्थाओं को खुद भी देखा कि कहीं रोगियों के साथ कोई खिलवाड़ तो नहीं हो रहा। दूसरे शहरों में बैठे लोगों के लिए भी उन्होंने कोरोना बीमारी से बचाने में प्रयुक्त होने वाले महंगें उपकरण ,गैस सिलेंडर एवं सर्व सुविधा युक्त बेड उपलब्ध कराने में जो योगदान दिया उसकी मिसाल बहुत कम मिलती है ।
काशीपुर के इंदिरा गांधी स्कूल की इतनी जर्जर हालत हो गई थी कि अभिभावकों ने भी किसी भयंकर दुर्घटना की आशंका के चलते उसमें बच्चों को भेजना ही बंद कर दिया था। बाद में सरकार ने भी स्कूल की जर्जर हो चुकी बिल्डिंग को तोड़ने के आदेश कर दिए ।सब तमाशा देख रहे थे कि अब क्या होगा? मगर दीपक बाली के अलावा कोई आगे नहीं आया । उन्होंने शासन प्रशासन से कहा कि वह इस स्कूल को उन्हें गोद दे दे । वे उसका जीर्णोद्धार कराएंगे। उनकी बात मान ली गई और उन्होंने इस खंडहर हो चुके स्कूल को इतना शानदार बना दिया कि जिस स्कूल में बच्चों ने पढ़ने आना बंद कर दिया था अब उस स्कूल में अभिभावक सिफारिशों के बल पर बच्चों का एडमिशन करा रहे हैं। अब हालात यह हैं कि स्कूल में जगह तो कम पड़ ही गई है साथ ही शिक्षक भी कम पड़ गए हैं। अब लोग इस शानदार बने स्कूल को देखने जाते हैं ।
बगैर किसी के कहे अपने खर्चे पर कराए गए दीपक बाली के सेवा कार्य हमारे राजनीतिक दलों व सामाजिक संगठनों के प्रति एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह गवाही है इस बात की कि समाज सेवा का मन बना कर यदि सच्चे दिल से सेवा की जाए तो शासन और प्रशासन की भी कोई जरूरत नहीं पड़ती ,वरना जब तक शासन प्रशासन का मुंह ताकते रहेगे और वह आएगा तब तक तो जन समस्याएं पता नहीं क्या से क्या रूप ले लेती हैं।
दीपक बाली जैसे लोग किसी भी दल में रहें वह अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ सकते। क्या खुद को समाजसेवी कहने वाले सिर्फ आंदोलन और अपने वरिष्ठ लोगों की प्रशंसा में कसीदे गाड़ने को ही सेवा समझ लेते हैं?
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