
देश चलाने के लिए अब किसी पांच वर्षीय योजना की जरूरत नहीं है । अब देश केवल शिगूफों की बिना पर चलाया जा रहा है । एक शिगूफा फीका पड़ने से पहले ही दूसरा शिगूफा जनता के सामने पेश कर दिया जाता है। यूपी इस मामले में अग्रणीय है। यूपी में बाबा यानि मुख्यमंत्री महंत योगी आदित्यनाथ ने अब जनसंख्या नियंत्रण का पुराना और घिसा-पिटा शिगूफा छोड़ा है। इस मुद्दे पर कांग्रेस बहुत पहले बहुत सा काम कर चुकी है।
देश में जनसंख्या नियंत्रण की बात नई नहीं है। कांग्रेस की सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में जितना काम किया उसी बराबरी करने के लिए भाजपा को कम से कम दो दशक चाहिए। कांग्रेस की सरकारों ने जन संख्या नियंत्रण के लिए न सिर्फ नीतियां बनाएं बल्कि कानून भी बनाये। जिस तरह आज अक्षय कुमार लोक शिक्षण के लिए फ़िल्में बना रहे हैं उसी तरह १९६८ में जितेंद्र ने परिवार फिल्म भी बनाई थी जिसमें जनसंख्या की समस्या को एक अलग अंदाज में प्रदर्शित किया गया था।
जनसंख्या विस्फोट को रोकने के लिए भारत में जितने भी कार्यक्रम चलाये गए उनमें से अधिकाँश स्वैच्छिक थे। आपातकाल में इसमें जबरदस्ती भी की गयी और उसके नतीजे भी कांग्रेस ने भुगते। जनसंख्या विस्फोट के लिए देश में किसी एक समुदाय को लांछित करने का दुस्साहस पहली बार हो रहा ह। भाजपा शासित केंद्र और राज्यों में डबल इंजन की सरकारें जनसंख्या विस्फोट के लिए मुसलमानों को निशाने पर रखे हुए हैं। इसके समर्थन में सरकारों के पास छद्म आंकड़े भी हैं। छद्म इसलिए क्योंकि उनका कोई साक्ष्य नहीं है।
जनसंख्या का दबाब कोई माने या न माने लेकिन देश के हर संसाधन और नीतियों पर पड़ता है। सरकार भी इसे समझती है और जनता भी । फिर भी इसे सियासत से जोड़ने की गलती की जा रही है । हिन्दू हो या मिसलमान ,सिख हो या ईसाई ,जैन हो या बौद्ध सबको पता है कि बड़े परिवार अब अतीत की कहानी हो गए हैं। लोगों ने इसे धर्म के आधार पर नियंत्रित नहीं किया है बल्कि आर्थिक आधार पर नियंत्रित किया है। देश में तेजी से बढ़ती जागरूकता क़ानून के मुकाबले जनसंख्या नियंत्रण में कारगर हो रही है ,लेकिन यूपी सरकार अलग से क़ानून लेकर इस मसले को साम्प्रदायिक बनाने की कोशिश कर रही है ताकि देश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया थमे नहीं।
भाजपा की जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं है । बीते एक साल में केंद्र सरकार दो बार अपना रुख बदल चुकी है। सवाल ये है कि जो काम स्वैच्छिक है उसे क़ानून से क्यों बांधा जा रहा है ?सरकार ने क़ानून बनाकर देख लिए उससे क्या हासिल हुआ । जनसंख्या नियंत्रण के लिए कोई भी क़ानून भूतलक्षी प्रभाव से लागू तो नहीं हो रहा और इसी वजह से वे लोग आज राजनीति में शीर्ष पर हैं जो अपने परिवार की पांचवी,छठवीं सातवीं संतान हैं। जिन नेताओं के सर पर जनसंख्या नियंत्रण का भूत सवार है वे निश्चित ही जनसंख्या वृद्धि के पाप से दूर हैं ,किन्तु सिर्फ इसी वजह से उन्हें साम्प्रदायिक आधार पर कोई कानून बनाने का हक नहीं मिल जाता।
जनसंख्या वृद्धि का सबसे बड़ा केंद्र चीन ह। चीन ने भी तरह-तरह के कानून बनाकर जनसंख्या को नियंत्रित करने की कोशिश की किन्तु अंतत:उसे भी अपने ही बनाये कानूनों को शिशील करना पद रहा है। अब वहां एकल शिशु क़ानून वापस ले लिए गए हैं। भारत में भी पिछले कुछ दशकों में परिवारों का आकर बदला है। कामकाजी परिवारों ने बिना किसी कानों के एक शिशु की अवधारणा को स्वीकार कर लिए है। मुस्लिम भी इसमें पीछे नहीं है ,लेकिन उन्हें निशाने पर आज भी रखा जा रहा है। सरकार को लगता है की जनसंख्या विस्फोट के लिए जैसे अकेले मुस्लिम ही जिम्मेदार हैं।
ये हकीकत है कि देश में 1951 जो मुस्लिम 9.8 फीसदी थे वे 2011 में 14.2 फीसदी हो गए। वहीं, इसी काल खंड में हिंदुओं की संख्या 84 फीसदी से 79.8 फीसदी पर आ गई है। लेकिन इसमें क़ानून की नहीं जागरूकता की बड़ी भूमिका है। परिवार नियोजन के तरीकों को अपनाने वाले मुस्लिम 45.3 फीसदी हैं दूसरा नंबर हिंदुओं का है। 54.4 फीसदी हिंदू परिवार नियोजन को अपनाते हैं। आबादी के अनुपात से यदि इसे जोड़कर देखें तो मुस्लिम आगे खड़े दिखाई देते हैं। दुनिया में भारत ही अकेला ऐसा देश है जहां परिवार नियोजन में सम्प्रदाय को निशाने पर रखा गया है।दुनिया के अनेक मुस्लिम देश जैसे ईरान, मिस्र , इंडोनेशिया और बांग्लादेश में परिवार नियोजन को अपनाया जा रहा है। यहां पर ऐसा करने की कोई राजनीतिक बाध्यता नहीं है।
जनसंख्या नियंत्रण क़ानून की वकालत करने वाला उत्तर प्रदेश देश में जनसंख्या बढ़ने वाला तीसरा प्रदेश है। बिहार नंबर एक पर और मेघालय नंबर दो पर है किन्तु इन दोनों प्रदेशों ने कभी भी जनसंख्या वृद्धि के लिए किसी ख़ास समुदाय को निशाने पर नहीं रखा। सरकार के ही आंकड़े उठाकर देखें तो पाएंगे कि बीते दो दशकों में मुस्लिमों में प्रजनन दर लगातार कम हुई है ,लेकिन सियासत चलाने के लिए इन आंकड़ों पर धूल डाली जा रही है
एनएफएचएस के पिछली पाँच रिपोर्ट के आँकड़े बताते हैं कि हिंदू और मुसलमानों में बच्चे पैदा करने का अंतर एक बच्चे से ज़्यादा कभी नहीं रहा. साल 1991-92 में ये अंतर 1.1 का था, इस बार ये घट कर 0.3 का रह गया है. ये बताता है कि मुस्लिम महिलाएं तेजी से फैमिली प्लानिंग के तरीके अपना रही हैं. हकीकत ये है कि गर्भनिरोधक तरीकों की मांग भी उनमें ज़्यादा है जो पूरी नहीं हो रही.
उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र ने एक रिपोर्ट जारी करके बताया था कि 2023 में भारत चीन को पीछे करके दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा। इसके बाद योगी आदित्यनाथ ने कहा था, ‘ऐसा नहीं होना चाहिए कि किसी एक समुदाय की जनसंख्या बढ़ाने की रफ्तार या पर्सेंट ज्यादा है और हम कानून और जानकारी के जरिए उस इलाके के मूल निवासियों की जनसंख्या को कम कर दें।’
इसके जवाब में मुस्लिम नेता ओवैसी ने कहा कि ‘क्या मुस्लिम भारत के मूल निवासी नहीं है। अगर सच को देखें तो यहां के मूल निवासी केवल आदिवासी और द्रविड़ लोग हैं। उत्तर प्रदेश में बिना किसी कानून के 2026 से 2030 के बीच वो फर्टिलिटी रेट हासिल किया जा सकता है, जिसका लक्ष्य रखा गया है।’
@ राकेश अचल
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