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एक काला सच :आयुष्मान योजना से रोगी स्वस्थ, मगर सरकार और अस्पताल बीमार?

@नई दिल्ली शब्द दूत ब्यूरो (10 जुलाई 2022)

देश की जनता को स्वास्थ्य लाभ देने के लिए केंद्र सरकार ने जो आयुष्मान योजना शुरू की थी उससे निसंदेह रोगियों का तो स्वास्थ्य सुधरा मगर केंद्र व राज्य सरकारों के साथ सा्थ रोगियों का उपचार करने वाले अस्पतालों का स्वास्थ्य बिगड़ गया ।

तथ्य और हालात बताते हैं कि सरकार ने इस योजना को दूरदर्शी सोच के साथ शुरू तो किया मगर योजना को क्रियान्वित करने हेतु मानकों में दूरदर्शिता नहीं दिखाई। यदि योजना के लाभार्थियों के प्रति आर्थिक पैमाना भी अपनाया जाता तो आज यह दिन नहीं देखना पड़ता । कुल मिलाकर गरीबों के हक पर उन साधन संपन्न लोगों ने जमकर डांका डाला जो अपना तो क्या औरों का भी उपचार कराने में भली भांति सक्षम हैं ।उसी का परिणाम है कि आयुष्मान योजना के क्रियान्वयन में आर्थिक मानक न होने से मजा तो लिया साधन संपन्न लोगों ने और अब चोर सिद्ध हो रहे हैं वें अस्पताल और डॉक्टर जिन्होंने रोगियों का उपचार कर उन्हें स्वास्थ्य लाभ दिया।

ऐसा भी नहीं है कि अस्पतालों पर उठ रही उंगलियां भी बेवजह हो, क्योंकि अधिकांश अस्पतालों ने योजना को इतनी बेरहमी से लूटा कि योजना की जान ही निकल गई ,और अब दोषियों के साथ पिस रहे हैं कम बजट वाले छोटे अस्पताल । इन बेचारों ने सरकार के मानकों को दृष्टिगत रख अपनी ओर से रोगियों को हर संभव सुविधा दी मगर अब भूगतान लेने की बारी आई तो सरकार ने उन्हें नोटिस थमा दिए। चिकित्सा प्राधिकरणो द्वारा अस्पतालों को जो नोटिस दिए जा रहे हैं उनमें भी कोई मानक नहीं हैं। नोटिस दिया जा रहा है एक माह बाद योजना से हटाए जाने का जबकि हटा दिया जाता है 1 माह पहले ही। जिन्हें आयुष्मान योजना से हटाए जाने का नोटिस दिया जा रहा है और उनका कोई कसूर नहीं बताया जा रहा कम से कम सरकार की जिम्मेदारी है कि उन छोटे अस्पतालों के भुगतान तो कर दे ।आखिर कब तक उनकी गर्दन पर आर्थिक तंगी की तलवार लटकती रहेगी?

छोटे बजट वाले अस्पतालों के हालात तो ऐसे हैं कि अब उनकी हालत उन रोगियों से भी परे हो चुकी है जिन्हें उपचार देकर उन्होंने ठीक किया था ,क्योंकि सरकार से भुगतान न मिलने की स्थिति में यह अस्पताल बंद होने के कगार पर आ खड़े हुए हैं। अस्पतालों के संचालकों का कहना हैं कि सरकार ने इस योजना को चलाने में जितने बजट की तैयारी की थी बजट उससे कई गुना अधिक हो गया और अब अपने ऊपर लटकती भुगतान की तलवार से बचने हेतु सरकार अस्पतालों और डॉक्टरों को चोर साबित कर रही है। सरकार को चाहिए कि आयुष्मान योजना को पलीता लगाने वाली बड़ी मछलियों को पकड़ा जाए।

इस बात पर भी गंभीरता से ध्यान दिया जाए कि कहीं बड़े अस्पतालों के साथ मिलकर विभागीय मशीनरी ने भी तो कोई मौन स्वीकृति का खेल नहीं खेला। कहीं चहेते अस्पतालों को लाभ पहुंचाने के लिए तो गोटियां नहीं बिछायी जा रही ? बहरहाल सत्यता कुछ भी हो मगर जिस सोच के साथ आयुष्मान योजना प्रारंभ की गई थी उसे लूटने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि उन्होंने उपचार के नाम पर इस योजना को लूटने में जो जो हथकंडे अपनाए वह रोगियों के रोग से भी अधिक दहलाने वाले हैं। आखिर जनता देखना चाहती है कि उसके स्वास्थ्य के असली सौदागर कौन हैं ?

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