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परशुराम जयंती पर विशेष :जानिए क्यों अपनी ही माता का सिर काट दिया? क्षत्रिय विहीन कर दिया था धरती को, कुछ खास बातें

परशुराम को चारू चरित, मेटत सकल अज्ञान।
शरण पड़े को देत प्रभु, सदा सुयश सम्मान ।।

@पंडित सुधांशु तिवारी

(हिन्दू धर्म गुरू व श्री राम कथा प्रवक्ता)

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जाता है। इस बार ये तिथि 3 मई को है। इसी दिन भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम की जयंती भी मनाई जाती है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी तिथि पर परशुरामजी का जन्म हुआ था।

ऐसी भी मान्यता है कि है भगवान विष्णु के ये अवतार आज भी जीवित हैं। परशुरामजी जन्म से तो ब्राह्मण थे लेकिन उनमें क्षत्रियों के गुण थे। अपने पिता की हत्या का प्रतिशोध लेने के लिए उन्होंने 17  बार धरती को क्षत्रियों से विहिन कर दिया था। ब्राह्मण होकर भी परशुराम इतने क्रोधी क्यों थे, इसका रकारण उनके जन्म से जुड़ा है और बहुत कम लोग इसके बारे में जानते हैं।

 

ऐसे हुआ भगवान परशुराम का जन्म

– पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि भृगु के पुत्र ऋचिक का विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती से हुआ था। सत्यवती अपने पिता की एक ही संतान थी। विवाह के बाद सत्यवती ने महर्षि भृगु से अपने व अपनी माता के लिए योग्य पुत्र के लिए प्रार्थना की।
– महर्षि भृगु ने सत्यवती को क्षत्रिय और ब्राह्मण गुणों से युक्त दो फल दिए और एक स्वयं और दूसरा अपनी माता को देने को कहा। भूल से सत्यवती ने अपनी माता को ब्राह्मण गुणों से युक्त फल खिला दिया और स्वयं ने क्षत्रिय गुणों से युक्त फल खा लिया।
– ये बात जब महर्षि भृगु को बता चली तो उन्होंने कहा कि “तुम्हारी गलती के कारण तेरा पुत्र ब्राह्मण होने पर भी क्षत्रिय गुणों वाला रहेगा और तेरी माता का पुत्र क्षत्रिय होने पर भी ब्राह्मणों की तरह आचरण करेगा।”
– तब सत्यवती ने महर्षि भृगु से प्रार्थना की कि “मेरा पुत्र क्षत्रिय गुणों वाला न हो भले ही मेरा पौत्र (पुत्र का पुत्र) ऐसा हो।”
– कुछ समय बाद जमदग्रि मुनि ने सत्यवती के गर्भ से जन्म लिया। इनका विवाह रेणुका से हुआ। परशुराम मुनि जमदग्रि के चौथे पुत्र थए और उनका आचरण क्षत्रियों के समान था।

इस विधि से करें भगवान परशुराम की पूजा

तृतीया तिथि की सुबह पवित्र नदी में स्नान करें। ऐसा संभव न हो तो थोड़ा सा गंगाजल पानी में मिलाकर घर पर ही स्नान कर सकते हैं। इसके बाद व्रत करने का संकल्प लें। भगवान परशुराम की प्रतिमा या चित्र एक साफ स्थान पर स्थापित करें। धूप-दीप जलाएं। पंचोपचार पूजा करें यानी चावल, अबीर, गुलाल आदि चीजें चढ़ाएं। इसके बाद भगवान को भोग लगाएं। भगवान परशुराम के सामने अपनी इच्छा प्रकट करें और अंत में आरती कर प्रसाद लोगों में बांट दें। इस दिन व्रत करने वाले लोगों को किसी तरह का कोई अनाज नहीं खाना चाहिए। फलाहार कर सकते हैं।

ये हैं शुभ मुहूर्त

तृतीया तिथि 3 मई, मंगलवार की सुबह 05:19 से शुरू होगी, जो अगले दिन यानी 4 मई, बुधवार की सुबह 07:33 तक रहेगी। तृतीया तिथि दो दिन सूर्योदयकालीन रहेगी, लेकिन पर्वकाल यानी स्नान,दान आदि कार्य 3 मई, मंगलवार को करना ही श्रेष्ठ रहेगा। इसलिए भगवान परशुराम की पूजा इसी दिन करना शुभ रहेगा। इस दिन रोहिणी नक्षत्र होने से मातंग नाम का शुभ योग भी इस दिन बन रहा है।

भगवान ​परशुराम की जयंती, जानें उनके जीवन से जुड़ी 10 खास बातें

भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाने वाले भगवान परशुराम की जन्मोत्सव कब मनाई जाएगी, उनका यह नाम आखिर कैसे पड़ा और आखिर किसलिए उन्होंने अपनी ही मां का सिर काट दिया था।

हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया को अत्यंत ही पुण्यदायी तिथि माना गया है. सभी शुभ एवं मांगलिक कार्यों के लिए उत्तम मानी जाने वाली इसी तिथि पर भगवान श्री विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम की जन्मोत्सव भी मनाई जाती है. धन की देवी मां लक्ष्मी की पूजा के साथ भगवान परशुराम की कृपा बरसाने वाली यह पावन तिथि इस साल 03 मई 2022, मंगलवार को पड़ने जा रही है.

भगवान परशुराम ने क्षत्रियों को आखिर क्यों दिया 21 बार दंड और उन्हें क्यों कहा जाता है परशुराम आइए इसे विस्तार से जानते हैं.

1- मान्यता है कि भगवान परशुराम का अवतार पृथ्वी पर अन्याय के प्रति न्याय का प्रतिपादन, दुष्टों का नाश तथा धर्म राज्य की स्थापना करने के लिए हुआ था.

2- भगवान परशुराम के पिता का नाम जमदग्नि और माता का नाम रेणुका था. जमदग्नि ऋषि के पुत्र होने के कारण उन्हें जामदग्नेय भी कहा जाता है. उनका विवाह प्रसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ.

3- भगवान परशुराम को देवों के देव महादेव का एकमात्र शिष्य माना जाता है. मान्यता है कि ​उन्होंने एक बार कठिन तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था. जिसके बाद भगवान शिव ने उन्हें अपना फरसा प्रदान किया था. जिसके बाद उन्हें परशुराम के नाम से जाना गया.

4- पौराणिक कथा के अनुसार एक बार जब भगवान परशुराम भगवान शिव का दर्शन करने के लिए कैलाश पर्वत पहुंचे तो उनके पुत्र यानि भगवान श्री गणेश जी ने उन्हें उनसे मिलने से रोक दिया, जिससे क्रोधित होकर भगवान परशुराम ने अपने फरसे से उनका एक दांत तोड़ दिया. जिसके बाद भगवान गणेश एकदंत के नाम से जाने गए.

5- मान्यता है कि एक बार जब भगवान परशुराम की माता रेणुका से अनजाने में कोई अपराध हो गया तो उनके पिता ने क्रोधित होकर पहले उनके बड़े भाईयों को उनका वध करने को कहा. जब उनके भाईयों ने इसके लिए मना कर दिया तो उन्होंने अपने श्राप से उनकी विचार शक्ति समाप्त कर दिया. लेकिन भगवान परशुराम ने पिता की आज्ञा मानते हुए अपने मां का सिर काट दिया.

6- आज्ञाकारी पुत्र परशुराम से प्रसन्न होकर महर्षि जमदग्नि ने जब उनसे वर मांगने को कहा तो उन्होंने तीन वर मांगे. जिसमें पहला मां को जीवित करने का, दूसरा बड़े भाईयों को ठीकर करने का और तीसरा अपने लिए जीवन में कभी भी पराजय न होने का आशीर्वाद मांगा.

7- भगवान परशुराम ने जिन लोगाें को शस्त्र की शिक्षा दी, उनमें भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे शूरवीर शामिल हैं.

8- भगवान परशुराम को चिरंजीवी माना जाता है. मान्यता है कि वे प्रत्येक युग में मौजूद रहते हैं और वर्तमान कलयुग में भगवान विष्णु के होने वाले कल्कि अवतार को शस्त्र की शिक्षा देंगे.

9- भगवान परशुराम ने धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र और शास्त्र दोनों को धारण कर सनातन संस्कृति को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया. भगवान परशुराम को न्याय का देवता माना जाता है, जिन्होंने 21 बारक्षत्रियों को दंड दिया था.

10- सनातन परंपरा में भगवान परशुराम जी की पूजा जीवन से जुड़े ज्ञात-अज्ञात शत्रुओं से रक्षा के लिये की जाती है. मान्यता है कि अक्षय तृतीया या फिर कहें परशुराम जयंती के दिन श्रद्धा भाव के साथ भगवान परशुराम का सुमिरन, पूजन करने पर अक्षय फल की प्राप्ति होती है.

परशुराम गायत्री मंत्र

‘ॐ ब्रह्मक्षत्राय विद्महे क्षत्रियान्ताय धीमहि तन्नो राम: प्रचोदयात्।।’

‘ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि तन्न: परशुराम: प्रचोदयात्।।’

‘ॐ रां रां ॐ रां रां परशुहस्ताय नम:।।’ इत्यादि।

जप-ध्यान करने के बाद दशांस हवन पायस-घृत से करें। इससे जीवन की समस्त समस्याएं दूर हो जाएंगी।

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