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न पुलिस बदली और न जनता@राकेश अचल

राकेश अचल, लेखक देश के जाने-माने पत्रकार और चिंतक हैं, कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में इनके आलेख प्रकाशित होते हैं।

कहते हैं कि देश बदल रहा है,लेकिन मुझे लगता है कि कुछ भी नहीं बदल रहा.न जनता,न नेता,न पुलिस .जिस बिहार में आज से सौ साल पहले चौरा-चौरी काण्ड हुआ था उसी बिहार में जनता ने पुलिस ज्यादती के खिलाफ बेतिया का थाना फूंक दिया .सौ साल पहले जनता के प्रतिकार में 22 लोग मारे गए थे सौ साल बाद बेतिया में एक जवान मारा गया और 10 घायल हो गए ,लेकिन ये खबर इसलिए खबर नहीं बनी क्योंकि देश एक फिल्म में उलझा हुआ है.

पुलिस और जनता के बीच टकराव की खबरें नई नहीं हैं. बेतिया में पुलिस हिरासत में एक व्यक्ति की मौत के बाद जमकर उपद्रव हुआ। गुस्साई भीड़ ने थाना और पुलिस गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया। पुलिस कर्मियों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। पुलिस कर्मियों ने जान बचाने के लिए थाना छोड़कर खेतों में दौड़ लगा दी थी। उपद्रव में एक पुलिसकर्मी राम जतन सिंह की भी मौत हुई है। सिर को कुचल दिया गया है। हमले में 10 से अधिक जवान घायल हैं। चार घंटे बाद पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे पुलिस अफसरों ने भीड़ को हटाने की कोशिश की। भीड़ ने दोबारा पथराव कर दिया। पुलिस ने भीड़ को हटाने के लिए लाठीचार्ज और हवाई फायरिंग की। छह घंटे बाद भीड़ काबू हो सकी।

आपको याद होगा कि बिहार के चौरी चौरा कांड में 4 फरवरी 1922 असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाले प्रदर्शनकारियों का एक बड़ा समूह पुलिस के साथ भिड़ गया था। जवाबी कार्रवाई में प्रदर्शनकारियों ने हमला किया और एक पुलिस स्टेशन में आग लगा दी थी, जिससे थाने में मौजूद सभी पुलिस वाले मारे गए। इस घटना के कारण तीन नागरिकों और 22 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हुई थी। महात्मा गांधी ने इस हिंसा के बाद 12 फरवरी 1922 को राष्ट्रीय स्तर पर असहयोग आंदोलन को रोक दिया था.

सौ साल हो गए लेकिन न जनता का चरित्र बदला और न पुलिस का ,और अब तो देश में कोई महात्मा गांधी भी नहीं है.अब गांधी के विरोधियों की बहुतायत है .अब पुलिस गरीब को सताती है और दबंग के आगे भीगी बिल्ली बन जाती है ,बेतिया में पुलिस डीजे बजाने पर एक युवक को पकड़कर थाने लायी थी और वहीं उसे पीट-पीटकर मार दिया गया,जबकि मध्यप्रदेश में सरेआम शराब की एक दूकान पर पत्थर से हमलाकर शराब की बोतलें तोड़ने वाली एक पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की .पुलिस का यही दोहरा चरित्र साल दर साल खतरनाक होता जा रहा है .
बेतिया और चौराचौरी से बेतिया की दूरी मात्र 82 किलोमीटर है लेकिन गांधी का सन्देश अब न चौराचौरी में हैं और न बेतिया में .गांधी लगता है अब वहां अप्रासंगिक हो गए हैं .चूंकि पुलिस निष्पक्षता और मानवीयता को तिलांजलि दे चुकी है इसलिए भीड़ भी अब जैसे को तैसा करने पर आमादा है .भीड़ को हिंसा के लिए पुलिस का चरित्र ही नहीं , सिस्टम का चरित्र भी आक्रामक बना रहा है .सिस्टम भीड़ को मुफ्त में सिनेमा दिखाकर ,मुफ्त में राशन देकर अपना उल्लू सीधा कर रहा है ,लेकिन कोई इसके खिलाफ न बोलने को तैयार है और न खड़े होने के लिए .

देश में पुलिस हिरासत में कितनी मौतें होती हैं इसका की आधिकारिक आंकड़ा विश्वसनीय नहीं है ,फिर भी आंकड़े जुटाने वाली सरकारी संस्था के मुताबिक पिछले दो दशकों में, पूरे भारत में 1,888 लोगों की मौतें पुलिस हिरासत में हुई है जिनमें पुलिसकर्मियों के खिलाफ 893 मामले दर्ज किए गए हैं जबकि केवल 358 पुलिस अधिकारी और न्याय अधिकारी औपचारिक रूप से अभियुक्त थे. आधिकारिक रिकॉर्ड से पता चलता है कि इस अवधि में सिर्फ 26 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया था. लोकसभा में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ने राष्‍ट्रीय मानवाध‍िकार आयोग (एनएचआरसी) के आंकड़े पेश किए थे इन आंकड़ों के मुताबिक, हिरासत में मौत के मामलों में उत्‍तर प्रदेश पहले नंबर पर है। उत्‍तर प्रदेश में पिछले तीन साल में 1,318 लोगों की पुलिस और न्‍याय‍िक हिरासत में मौत हुई है।

पुलिस के चरित्र का मुद्दा है इसलिए मै आंकड़ों के जाल में न उलझना चाहता हूँ और न उलझाना चाहता हूँ. बेतिया की ताजा घटना के प्रकाश में देश की पुलिस के चरित्र की बात करना आज जरूरी है. पुलिस की छवि ‘पब्लिक पुलिस’ की बने और वह राजनीतिक दबावों से मुक्त हो इसके लिए बड़े सुधारों की दरकार है। राजनीतिक दबाव का आलम यह है कि नेता बड़े पुलिस अधिकारियों तक को ‘औकात दिखाने’, ‘वर्दी उतारने’ जैसी धमकियां दे देते हैं। सांसद, विधायक तो दूर की बात, छुटभैये नेता तक एसएसओ को धमका देते हैं। नेता अगर सांसद या विधायक है तब तो उसे जैसे पुलिस अफसरों को बात-बात पर धमकाने का जैसे लाइसेंस मिल गया है।
मैंने अपने सूबे मध्यप्रदेश में दो दर्जन से ज्यादा पुलिस प्रमुखों को प्रदेश की पुलिस को बदलने का सपना देखते हुए देखा.कोई प्रदेश की पुलिस को इंग्लैंड की पुलिस की तरह बना देना चाहता था और कोई अमेरिका की पुलिस की तरह ,लेकिन दुर्भाग्य कि किसी का भी सपना पूरा नहीं हुआ .पुलिस को बदलना इतना आसान नहीं है .पुलिस को बदलने की कोशिश सरकार को करना होती है और सरकार नहीं चाहती की अंग्रेजों के जमाने के ढाँचे पर खड़ी पुलिस आज के भारत की जरूरतों के हिसाब से तैयार की जाये .क्योंकि सरकार भी तो खुद नहीं बदली ? फिर पुलिस कैसे बदल सकती है .

पुलिस को सुधरने के लिए 1977 में गठित राष्ट्रीय पुलिस आयोग आज किस दशा में है ,कोई नहीं जानता.इस आयोग ने जो रिपोर्टें सरकार को दी थीं वे कहाँ हैं ,किसी को नहीं पता .राष्ट्रीय पुलिस आयोग बनने के बाद से अब तक एक दर्जन प्रधानमंत्री बन और बिगड़ चुके हैं लेकिन किसी को पुलिस के सुधार की चिंता नहीं है. मुमकिन है कि कोई फिल्म निर्माता इस विषय पर फिल्म बनाकर सरकार को दिखाए तो सरकार को हकीकत का पता चल जाये, क्योंकि आजकल सरकारों को सच का पता फ़िल्में बनने के बाद चलता है,अन्यथा वे 32 साल तक नींद से जागती ही नहीं है .

बहरहाल मुद्दा पुलिस को बदलने का है. केवल सिस्टम का नाम बदलने से कुछ नहीं बदलता.जैसे मध्यप्रदेश में दो शहरों को पुलिस कमिशनर प्रणाली दे दी गयी लेकिन कुछ नहीं बदला.पुलिस राजनीतिक दबाबों के सामने आज भी तनकर खड़ी नहीं हो पा रही है .यहां नेता आज भी पुलिस संरक्षण में पथराव कर सकते हैं. बिहार में पुलिस हिरासत में निर्दोष युवक को मारा जा सकता है. उत्तर प्रदेश पुलिस तो फर्जी मुठभेड़ों से देश को निरुत्तर कर ही चुकी है. दक्षिण में पुलिस बलात्कार के चार आरोपियों को सीधे यमलोक पहुंचा सकती है ,और दुर्भाग्य ये कि इस सबको जनता का समर्थन मिलता है. पुलिस हिरासत में मौतों में नंबर एक पर रहने वाले उत्तर प्रदेश में जनता आदरणीय योगी आदित्यनाथ को दोबारा चुनती है .नीतीश कुमार बार-बार मुख्यमंत्री बन जाते हैं .यानि गड़बड़ बहुत गहरी है .
@ राकेश अचल

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