@नई दिल्ली शब्द दूत ब्यूरो (25 अक्टूबर, 2021)
लाइटर का जमाना है, लेकिन माचिस की डिमांड और कारोबार पहले जैसा ही है। आमतौर पर भारत में माचिस के दाम में एक दशक के बाद बदलाव होता है। लेकिन इस बार करीब 14 साल के बाद माचिस की कीमतें बढ़ी हैं। कीमत में 100 फीसदी बढ़ोतरी यानी एक रुपये वाली माचिस की डिब्बी अब दो रुपये में मिलेगी।
माचिस के दाम इससे पहले वर्ष 2007 में बढ़े थे। तब 50 पैसे की माचिस एक रुपये की हो गई थी। शिवकाशी में ऑल इंडिया चैंबर ऑफ मैचेस ने करीब 14 साल बाद माचिस का दाम बढ़ाने का फैसला लिया है। माचिस की कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे लागत बढ़ने का हवाला दिया गया है। आइए जानते माचिस से जुड़ी कुछ रोचक बातें।
भारत में साल 1950 में माचिस की एक डिब्बी की कीमत महज पांच पैसे थी। जो 1994 में बढ़कर 50 पैसे की हो गई। उसके बाद 2007 में कीमत 50 पैसे से बढ़कर एक रुपये की गई थी।
माचिस के प्रत्येक बॉक्स में 50 तीलियां होती हैं। वहीं, 600 माचिस डिब्बों का एक बंडल होता है। माचिस बनाने में 14 तरह के कच्चे माल की जरूरत होती है। जिसमें लाल फास्फोरस, मोम, कागज, स्प्लिंट्स, पोटेशियम क्लोरेट और सल्फर का मुख्य रूप से इस्तेमाल होता है। इसके अलावा माचिस की डिब्बी दो तरह के बोर्ड से बनते हैं। बाहरी बॉक्स बोर्ड और भीतरी बॉक्स बोर्ड।
भारत में सबसे बड़ा माचिस उद्योग तमिलनाडु में है। मुख्य तौर पर तमिलानाडु के शिवकाशी, विरुधुनगर, गुडियाथम और तिरुनेलवेली मैन्युफैक्चरिंग सेंटर हैं। भारत में फिलहाल माचिस की कई कंपनिया हैं, अधिकतर फैक्टरीज में अब भी हाथों से काम होता है। जबकि कुछ फैक्ट्रियों में मशीनों की मदद से माचिस का निर्माण होता है।
तमिलनाडु में इस उद्योग में लगभग चार लाख लोग काम करते हैं और इन कर्मचारियों में 90 फीसदी से अधिक महिलाएं हैं। माचिस की कीमत बढ़ने के बाद अब कर्मचारियों की थोड़ी आय बढ़ने वाली है। माचिस बनाने वालों को बॉक्स बनाने की उनकी क्षमता के आधार पर भुगतान किया जाता है।
भारत में माचिस के निर्माण की शुरुआत साल 1895 से हुई थी। इसकी पहली फैक्ट्री अहमदाबाद में और फिर कलकत्ता में खुली थी। भारत में सबसे पहले स्वीडन की एक मैच मैन्युफैक्चरिंग कंपनी ने माचिस बनाने की कंपनी खोली थी।
दुनिया में सबसे पहले ब्रिटेन में 31 दिसंबर 1827 को माचिस का आविष्कार हुआ था। आविष्कार करने वाले वैज्ञानिक जॉन वॉकर ने एक ऐसी माचिस की तीली बनाई थी, जो किसी भी खुरदरी जगह पर रगड़ने से जल जाती थी।
माचिस की तीली पर फॉस्फोरस का मसाला लगाया जाता है। फॉस्फोरस अत्यंत ही ज्वलनशील रासायनिक तत्व है। तमिलनाडु में सबसे पहले माचिस की फैक्ट्री 1922 में शिवकाशी शहर में लगाया गया था।
पहले सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल किया जाता था, जिससे गंध की समस्या का तो समाधान हो गया था। लेकिन जलते वक्त निकले वाला धुआं भी काफी विषैला होता था। इससे बाद में सफेद फॉस्फोरस के इस्तेमाल पर बैन लगा दिया था।
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