@विनोद भगत
उत्तराखंड की राजनीति में काशीपुर विधानसभा को लंबे समय से “हॉट सीट” के रूप में देखा जाता रहा है। पिछले लगभग ढाई दशक से यह सीट भारतीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ रही है। भाजपा ने यहाँ लगातार जीत दर्ज कर अपने संगठनात्मक कौशल और जातीय-सामाजिक समीकरणों पर मजबूत पकड़ का प्रदर्शन किया है।
चीमा परिवार का दबदबा
इस सीट पर पूर्व विधायक हरभजन सिंह चीमा और उनके पुत्र मौजूदा विधायक त्रिलोक सिंह चीमा की जोड़ी भाजपा की जीत का पर्याय बन चुकी है। पिता-पुत्र ने संगठन और कार्यकर्ताओं के साथ गहरे तालमेल के जरिए एक स्थायी वोट बैंक तैयार किया। यही कारण है कि कांग्रेस हर चुनाव में चुनौती देने के बावजूद निर्णायक बढ़त हासिल नहीं कर सकी।
चीमा परिवार का राजनीतिक अनुभव, संगठन पर पकड़ और क्षेत्र में वर्षों की सक्रियता भाजपा के लिए बड़ी ताकत रही है। ऐसे में 2027 के चुनाव में उन्हें नजरअंदाज करना पार्टी नेतृत्व के लिए आसान निर्णय नहीं होगा।
धामी फैक्टर की एंट्री?
इसी बीच राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी 2027 में काशीपुर से चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। पिछले कुछ समय से उनका काशीपुर के कार्यक्रमों में लगातार आना-जाना इन अटकलों को हवा दे रहा है।
यदि धामी काशीपुर से चुनाव लड़ते हैं तो यह सीट राज्य की सबसे चर्चित और प्रतिष्ठित सीटों में शामिल हो जाएगी। मुख्यमंत्री का प्रत्याशी बनना चुनाव को सीधे तौर पर “प्रतिष्ठा की लड़ाई” में बदल सकता है।
दीपक बाली: उभरता स्थानीय चेहरा
दूसरी ओर, काशीपुर के मौजूदा मेयर दीपक बाली भी भाजपा से प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। कम समय में उन्होंने नगर स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बनाई है। विकास कार्यों, जनसंपर्क और संगठन से नजदीकी के कारण उनकी छवि एक सक्रिय और जुझारू नेता की बनी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पार्टी स्थानीय समीकरणों को प्राथमिकता देती है तो दीपक बाली का दावा मजबूत हो सकता है। वहीं, बाली और मुख्यमंत्री धामी के बीच समीपता भी किसी बड़े राजनीतिक निर्णय का संकेत मानी जा रही है।
भाजपा के सामने दुविधा
भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन साधने की होगी।
- क्या पार्टी अनुभव और परंपरागत जीत के फार्मूले को बरकरार रखेगी?
- या फिर नए चेहरे और बड़े दांव के साथ चुनावी रणनीति बदलेगी?
चीमा परिवार की उपेक्षा असंतोष का कारण बन सकती है, जबकि नए चेहरे को आगे बढ़ाना भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखकर लिया गया निर्णय माना जाएगा।
कांग्रेस की उलझन
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की स्थिति फिलहाल असमंजस भरी दिख रही है। सबसे बड़ी समस्या एक ऐसे स्थानीय और लोकप्रिय चेहरे की तलाश है जो भाजपा के मजबूत संगठनात्मक ढांचे को चुनौती दे सके।
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि कांग्रेस स्थानीय कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर बाहरी चेहरे पर दांव लगाने की तैयारी में है। यदि ऐसा होता है तो यह रणनीति “बगल में बच्चा, नगर में ढिंढोरा” वाली कहावत को चरितार्थ करती नजर आ सकती है। स्थानीय जुड़ाव के अभाव में कांग्रेस को एक बार फिर कठिन मुकाबले का सामना करना पड़ सकता है। वैसे कांग्रेस की चर्चा एक अलग लेख में की जायेगी।
2027: मुकाबला दिलचस्प या एकतरफा?
2027 का विधानसभा चुनाव काशीपुर में कई मायनों में ऐतिहासिक हो सकता है।
- यदि मुख्यमंत्री मैदान में उतरते हैं तो यह राज्यस्तरीय बनाम स्थानीय समीकरण की लड़ाई होगी।
- यदि दीपक बाली को मौका मिलता है तो यह नए नेतृत्व के उभार की कहानी हो सकती है।
- और यदि चीमा परिवार को ही दोबारा जिम्मेदारी मिलती है तो यह निरंतरता और परंपरागत राजनीति की जीत मानी जाएगी।
फिलहाल प्रत्याशी कौन होगा, इस पर अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व के पत्ते खोलने के बाद ही स्पष्ट होगा। लेकिन इतना तय है कि काशीपुर विधानसभा 2027 में उत्तराखंड की सबसे चर्चित और रणनीतिक सीट बनी रहेगी।
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