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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर देहरादून में जन गोष्ठी “भेदभाव मन का विषय, शक्ति और संस्कार से होगा समाज परिवर्तन” — मोहन भागवत

@शब्द दूत ब्यूरो (23 फरवरी 2026)

देहरादून। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में “संघ यात्रा – नये क्षितिज, नये आयाम” विषय पर प्रमुख जन गोष्ठी एवं विविध क्षेत्र समन्वित संवाद का आयोजन देहरादून स्थित हिमालयन कल्चरल सेंटर सभागार में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।

कार्यक्रम का शुभारंभ भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पण और सामूहिक वंदेमातरम् गायन से हुआ। संचालन विभाग प्रचार प्रमुख गजेन्द्र खंडूड़ी ने किया। प्रांत कार्यवाह दिनेश सेमवाल ने शताब्दी वर्ष के अंतर्गत उत्तराखंड में आयोजित कार्यक्रमों—विजयदशमी पथ संचलन, घोष संचलन, व्यापक गृह संपर्क अभियान, हिंदू सम्मेलन एवं परिवार संपर्क—की जानकारी देते हुए आगामी योजनाओं पर प्रकाश डाला।

“संघ को समझने के लिए संघ में आना होगा”

मोहन भागवत ने कहा कि संघ को बाहर से देखकर उसकी वास्तविकता को नहीं समझा जा सकता। पथ संचलन देखकर कुछ लोग उसे अर्धसैनिक संगठन मान लेते हैं, राष्ट्रगीत सुनकर संगीत मंडली और सेवा कार्य देखकर केवल सेवा संगठन समझ लेते हैं, जबकि संघ एक व्यापक सामाजिक शक्ति है। उन्होंने कहा कि जैसे चीनी की मिठास को जानने के लिए उसे चखना पड़ता है, वैसे ही संघ को समझने के लिए उसके कार्य से जुड़ना आवश्यक है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ का किसी संगठन से प्रतिस्पर्धा नहीं है। संघ का उद्देश्य व्यक्ति निर्माण है, क्योंकि सशक्त व्यक्ति से ही सशक्त समाज और राष्ट्र का निर्माण होता है। राष्ट्र सशक्त होगा तो नागरिक भी सुरक्षित और सम्मानित होंगे।

केशव बलिराम हेडगेवार का उल्लेख

संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि वे जन्मजात देशभक्त थे। बाल्यकाल में महारानी विक्टोरिया के जन्मदिवस पर विद्यालय में वितरित मिठाई लेने से उन्होंने यह कहकर इंकार कर दिया था कि वे अपने देश पर शासन करने वालों के उत्सव में भाग नहीं लेंगे। अनुशीलन समिति से जुड़े रहने और वंदेमातरम् गान के कारण अंग्रेजों द्वारा देशद्रोह का मुकदमा झेलने का भी उन्होंने उल्लेख किया।

“भेदभाव व्यवस्था नहीं, मन की समस्या”

प्रश्नोत्तर सत्र में सामाजिक कुरीतियों पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि भेदभाव का मूल कारण व्यवस्था नहीं, बल्कि मन है। अंधकार को कोसने से नहीं, प्रकाश जलाने से समाप्त किया जा सकता है। व्यवहार में परिवर्तन से ही समाज में समरसता आएगी।

तकनीक साधन, संस्कार प्रधान

डिजिटल युग पर उन्होंने कहा कि तकनीक साधन है, साध्य नहीं। उसका उपयोग संयम और अनुशासन के साथ होना चाहिए। परिवार में संवाद और आत्मीयता आवश्यक है; तकनीक के लिए मनुष्य की बलि नहीं दी जा सकती।

महिलाओं की 50 प्रतिशत भागीदारी का समर्थन

भागवत ने कहा कि महिलाएं पूर्णतः स्वतंत्र हैं और देश संचालन में उनकी भागीदारी 33 प्रतिशत ही नहीं, 50 प्रतिशत तक होनी चाहिए। संघ के प्रतिबंध काल में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

पर्यावरण, शिक्षा और नीति पर विचार

उत्तराखंड की नदियों और पर्यावरण संरक्षण पर उन्होंने समन्वित नीति और स्थानीय सहभागिता पर बल दिया। शिक्षा में पाठ्यक्रम से अधिक शिक्षकों के संस्कारों को महत्वपूर्ण बताया। आरक्षण, वर्गीकरण और समान नागरिक संहिता जैसे विषयों पर उन्होंने प्रमाणिकता और सद्भाव से आगे बढ़ने की आवश्यकता जताई।

“संघ राजनीति नहीं, व्यक्ति निर्माण करता है”

राजनीति पर उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ हिंदुत्व की राजनीति नहीं करता, बल्कि व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज उत्थान का कार्य करता है। भ्रष्टाचार मन से प्रारंभ होता है और वहीं समाप्त किया जा सकता है। जनसंख्या को उन्होंने बोझ और संसाधन—दोनों दृष्टियों से देखने की बात कही तथा समान रूप से लागू होने वाली संतुलित नीति पर बल दिया।

कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों के प्रबुद्धजन, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद्, उद्योग जगत से जुड़े प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में स्वयंसेवक उपस्थित रहे। कार्यक्रम राष्ट्रगान के साथ सम्पन्न हुआ।

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