@विनोद भगत
काशीपुर। शहर के मध्य स्थित गोविषाण टीला कभी प्राचीन सभ्यता, इतिहास और पुरातात्विक वैभव का प्रतीक माना जाता था। इतिहासकारों के अनुसार काशीपुर का प्राचीन नाम ‘गोविषाण’ रहा है और यही टीला उस गौरवशाली अतीत का साक्षी है। यहां से विभिन्न कालखंडों के अवशेष प्राप्त हुए, जो यह प्रमाणित करते हैं कि यह क्षेत्र हजारों वर्षों से मानव बसावट और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। कभी यहां इतिहास प्रेमी, विद्यार्थी और स्थानीय नागरिक जिज्ञासावश पहुंचते थे, लेकिन आज यह स्थल आम लोगों के लिए लगभग निषिद्ध क्षेत्र बन चुका है।
पिछले कुछ वर्षों से गोविषाण टीले की घनी झाड़ियों और सुनसान वातावरण ने तेंदुओं को अपना स्थायी ठिकाना बनाने का अवसर दे दिया है। स्थिति यह है कि कई बार वन विभाग द्वारा लगाए गए पिंजरों में तेंदुए पकड़े भी जा चुके हैं। बावजूद इसके, वन्यजीवों की आवाजाही थमी नहीं है। तेंदुओं की मौजूदगी के कारण पुरातत्व विभाग ने सुरक्षा का हवाला देते हुए इस ऐतिहासिक स्थल को आम नागरिकों के लिए बंद कर दिया है। सवाल यह उठता है कि क्या एक प्राचीन धरोहर का भाग्य अब वन्यजीवों की गतिविधियों पर निर्भर रहेगा?
शहर के बुजुर्ग आज भी बताते हैं कि उन्होंने इस टीले को खुले रूप में देखा है, वहां तक गए हैं, उसके महत्व को समझा है। नई पीढ़ी के लिए यह स्थान अब केवल नाम भर रह गया है। विडंबना यह है कि जिस स्थल को पर्यटन मानचित्र पर उभारकर काशीपुर की पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया जा सकता था, वही स्थान आज उपेक्षा और भय का प्रतीक बन गया है। क्या प्रशासन के पास ऐसा कोई समन्वित योजना नहीं है जिससे वन विभाग और पुरातत्व विभाग मिलकर इस समस्या का स्थायी समाधान निकाल सकें?
यह भी विचारणीय है कि शहर के बीचोंबीच स्थित एक संरक्षित ऐतिहासिक टीले पर झाड़ियां इस कदर कैसे फैल गईं कि वह वन्यजीवों का सुरक्षित आश्रय बन गया? क्या नियमित सफाई, प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षा घेरा और निगरानी की व्यवस्था नहीं की जा सकती थी? यदि समय रहते समुचित रखरखाव किया जाता तो शायद यह स्थिति उत्पन्न ही न होती। सरकारी विभाग अक्सर संसाधनों की कमी या सुरक्षा कारणों का हवाला देते हैं, परंतु क्या धरोहर संरक्षण केवल कागजी दावों तक सीमित रह जाएगा?
सरकारें पर्यटन को बढ़ावा देने और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की बातें करती हैं, योजनाएं बनाती हैं, बजट घोषित करती हैं। फिर भी गोविषाण टीला जैसे महत्वपूर्ण स्थल वर्षों से बंद पड़े हैं। क्या यह प्रशासनिक असहायता का प्रमाण नहीं है कि एक ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व की धरोहर को सुरक्षित और व्यवस्थित करने के बजाय उसे आम जनता से दूर कर दिया गया? क्या यह मान लिया जाए कि तेंदुओं के खौफ के आगे हमारी व्यवस्थाएं नतमस्तक हैं?
गोविषाण टीला केवल एक भूखंड नहीं, बल्कि काशीपुर की ऐतिहासिक आत्मा है। आवश्यकता इस बात की है कि वन्यजीव संरक्षण और धरोहर संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। सुनियोजित योजना, समुचित बजट और विभागीय समन्वय के माध्यम से इस स्थल को सुरक्षित कर पुनः जनता के लिए खोला जा सकता है। अन्यथा आने वाली पीढ़ियां केवल पुस्तकों और बुजुर्गों की स्मृतियों में ही गोविषाण टीले का इतिहास खोजती रह जाएंगी, और यह अमूल्य धरोहर यूं ही उपेक्षा की धूल में दबती चली जाएगी।
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