@शब्द दूत ब्यूरो (17 फरवरी 2026)
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत हाल ही में 10 ग्राम के लिए 1 लाख 76 हजार रुपये तक पहुंच गई थी। लेकिन अब कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले समय में यह 1 लाख रुपये के नीचे भी आ सकता है। इसकी बड़ी वजह मानी जा रही है रूस और अमेरिका के बीच संभावित आर्थिक समझौता, जिसके तहत रूस फिर से अमेरिकी डॉलर में व्यापार शुरू कर सकता है।
क्यों बढ़ा था सोना इतना महंगा?
पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक स्तर पर आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी। खासकर BRICS देशों ने अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की रणनीति अपनाई।
इन देशों ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) में डॉलर का हिस्सा घटाकर सोने की हिस्सेदारी बढ़ानी शुरू कर दी।
- भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में 2005 में सोने की हिस्सेदारी करीब 4.3% थी, जो 2025 तक बढ़कर लगभग 15% हो गई।
- ब्राजील ने 2025 में 16 टन सोना खरीदा, जबकि पिछले चार वर्षों में उसने कोई सोना नहीं खरीदा था।
- BRICS देशों के पास मिलकर अब दुनिया के करीब 20% गोल्ड रिजर्व हैं।
जब केंद्रीय बैंक बड़े पैमाने पर सोना खरीदते हैं, तो मांग बढ़ती है और कीमतें उछलती हैं। यही कारण रहा कि सोना रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया।
ट्रंप की टैरिफ नीति और वैश्विक अस्थिरता
पिछले वर्ष डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका ने कई देशों पर आयात शुल्क (टैरिफ) बढ़ा दिए। इससे वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता बढ़ी और निवेशकों ने सुरक्षित निवेश (Safe Haven) के रूप में सोने की ओर रुख किया।
जब दुनिया में आर्थिक अस्थिरता होती है, तो निवेशक शेयर बाजार और करेंसी से हटकर सोने में निवेश बढ़ा देते हैं। यही ट्रेंड 2024–25 में देखने को मिला।
अब क्यों गिर सकता है सोना?
अब चर्चा इस बात की है कि अगर रूस और अमेरिका के बीच डॉलर में व्यापार फिर से शुरू होता है, तो:
- डॉलर की वैश्विक साख मजबूत होगी।
- BRICS देशों द्वारा डॉलर से दूरी बनाने की गति धीमी पड़ सकती है।
- केंद्रीय बैंकों की सोना खरीदने की होड़ कम हो सकती है।
यदि डॉलर फिर से मजबूत होता है, तो सोने की मांग घट सकती है। मांग घटेगी तो कीमतों में गिरावट संभव है।
विशेषज्ञ क्या मानते हैं?
अंतरराष्ट्रीय आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रूस–अमेरिका के बीच डॉलर आधारित व्यापारिक समझौता स्थायी रूप लेता है, तो वैश्विक बाजार में स्थिरता लौट सकती है। इससे:
- निवेशक सुरक्षित निवेश की बजाय जोखिम वाले एसेट (जैसे शेयर) में लौट सकते हैं।
- केंद्रीय बैंक सोना खरीदने की रफ्तार कम कर सकते हैं।
- सोने की कीमतों में तेज गिरावट आ सकती है।
हालांकि, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि यह समझौता कितना मजबूत और दीर्घकालिक साबित होता है।
निवेशकों के लिए क्या संकेत?
सोना हमेशा से दीर्घकालिक सुरक्षित निवेश माना जाता है। लेकिन इसकी कीमतें वैश्विक राजनीति, डॉलर की मजबूती और केंद्रीय बैंकों की रणनीति पर निर्भर करती हैं।
अगर रूस–अमेरिका संबंधों में सुधार होता है और डॉलर फिर से वैश्विक व्यापार की धुरी बनता है, तो सोने की कीमतों में नरमी आ सकती है।
फिलहाल बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। इसलिए निवेशकों को जल्दबाजी में फैसला लेने के बजाय वैश्विक घटनाक्रम पर नजर बनाए रखनी चाहिए।
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