@विनोद भगत
उत्तराखंड की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन उससे पहले ही भारतीय जनता पार्टी के भीतर जो सियासी हलचल दिखाई दे रही है, उसने पार्टी की अनुशासित छवि पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खासतौर पर राज्य की तराई से उठी आवाज़ें अब तूफान का रूप लेती दिख रही हैं। गदरपुर विधायक अरविंद पांडे के पार्टी और सरकार के खिलाफ लगातार दिए जा रहे सार्वजनिक बयान न केवल विपक्ष को बैठे-बिठाए मुद्दे दे रहे हैं, बल्कि यह संकेत भी दे रहे हैं कि भाजपा के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर अरविंद पांडे जैसे वरिष्ठ नेता के बयानों पर संगठन की ओर से अब तक कोई ठोस और निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? भाजपा, जिसे देशभर में अनुशासन और संगठनात्मक मजबूती के लिए जाना जाता है, वहां खुले मंच से अपनी ही सरकार और नेतृत्व पर सवाल उठाना सामान्य बात नहीं मानी जाती। इसके बावजूद चुप्पी यह संकेत देती है कि या तो इस पूरे घटनाक्रम को किसी स्तर पर मौन सहमति प्राप्त है, या फिर पार्टी के भीतर कोई बड़ा सियासी खेल खेला जा रहा है।
यह स्थिति इसलिए भी अधिक गंभीर हो जाती है क्योंकि जो काम सामान्यतः विपक्षी दलों को करना चाहिए था, वह आज भाजपा के नेता स्वयं कर रहे हैं। सरकार की नीतियों, नेतृत्व और कार्यशैली पर सार्वजनिक तौर पर सवाल उठाकर पार्टी की फजीहत हो रही है। इसका सीधा असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ रहा है और संदेश गलत जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व अपने ही नेताओं को नियंत्रित करने में असमर्थ है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को लेकर उठ रहे अप्रत्यक्ष सवाल भी इस पूरे प्रकरण को और जटिल बनाते हैं। क्या यह विरोध सीधे तौर पर मुख्यमंत्री के नेतृत्व के खिलाफ है, या फिर 2027 से पहले नेतृत्व परिवर्तन अथवा शक्ति संतुलन को लेकर अंदरखाने कोई रणनीति तैयार की जा रही है? राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि इस पूरे खेल में भाजपा के कुछ दिग्गज सांसदों और वरिष्ठ नेताओं की भूमिका भी हो सकती है, जो फिलहाल पर्दे के पीछे रहकर चालें चल रहे हैं।
और भी हैरानी की बात यह है कि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट की चुप्पी भी लगातार सवालों के घेरे में है। संगठन के मुखिया की ओर से स्पष्ट संदेश या सख्त कार्रवाई का अभाव इस धारणा को मजबूत करता है कि या तो मामला हाईकमान के स्तर पर विचाराधीन है, या फिर जानबूझकर समय लिया जा रहा है ताकि हालात अपने आप किसी निष्कर्ष तक पहुंचें।
उत्तराखंड की राजनीति में पाला बदलना कोई नई बात नहीं है। इतिहास गवाह है कि चुनाव से पहले असंतोष, बगावत और दल-बदल यहां आम रहे हैं। ऐसे में यदि भाजपा ने समय रहते इस सियासी असंतुलन को नहीं संभाला, तो 2027 का चुनावी रण उसके लिए आसान नहीं रहने वाला। लगातार हो रही अंदरूनी कलह न केवल विपक्ष को मजबूत करेगी, बल्कि जनता के बीच पार्टी की विश्वसनीयता पर भी असर डालेगी।
फिलहाल पूरा प्रदेश “वेट एंड वॉच” की स्थिति में है। सबकी निगाहें दिल्ली के पार्टी हाईकमान पर टिकी हैं कि वह इस पूरे खेल का पटाक्षेप कब और कैसे करता है। यदि जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो तराई से उठा यह सियासी तूफान पूरे उत्तराखंड में भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
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