@शब्द दूत ब्यूरो (19 जनवरी 2026)
देहरादून। उत्तराखंड में Subharti–GBCM से जुड़ा विवाद अब सिर्फ़ एक प्रशासनिक मामले से आगे बढ़कर राजनीतिक व न्यायिक सवालों का विषय बन गया है। सरकारी दस्तावेज़ों, जांच रिपोर्ट और प्रशासनिक कदमों के आधार पर यह मामला तीन अलग-अलग मुख्यमंत्री के कार्यकाल में लिए गए निर्णयों तथा चूक से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है, जिससे न तो सिर्फ़ छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ है, बल्कि शासन-प्रशासन की जवाबदेही पर भी प्रश्नचिन्ह उठ रहे हैं।
सबसे पहले त्रिवेंद्र सिंह रावत के कार्यकाल में जारी Essentiality Certificate (EC) पर गंभीर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। जांच में सामने आया है कि भूमि स्वामित्व के नामों में अनियमितताएँ तथा पूर्वी निर्देशों के उल्लंघन के बावजूद यह EC जारी किया गया था, जिससे अब नीतिगत विफलता के आरोप लग रहे हैं।
इसके बाद तीरथ सिंह रावत के मुख्यमंत्री रहने के दौरान Subharti–GBCM से जुड़े मामलों की व्यापक समीक्षा न किए जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं। हजारों छात्रों के भाग्य से जुड़े ऐसे मामले में पुनः समीक्षा न करना आलोचनाओं का मुद्दा बना हुआ है।
वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कार्यकाल में ₹87.50 करोड़ की वसूली और कुर्की कार्रवाई के बावजूद राजनीतिक जवाबदेही तय न होने पर आलोचना हो रही है। वहीं उच्च स्तरीय जांच समिति (SIT) और सीबीआई जांच चल रही है, परन्तु सत्ता स्तर पर पारदर्शिता की कमी पर भी सवाल उठ रहे हैं।
नर्सिंग प्रवेशों को 2020 से 2025 तक अवैध घोषित किए जाने के बाद 300 से अधिक छात्रों के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। अभिभावकों ने सीबीआई एवं प्रशासन दोनों से स्पष्ट जवाब की मांग की है, जबकि सरकार केवल कार्रवाई के कदम उठा रही है और जिम्मेदारी तय करने से बच रही है।
प्रकरण के संबध में जनता और विशेषज्ञ कई सीधे सवाल उठा रहे हैं: -क्या Essentiality Certificate जारी करते समय पूरी जांच की गई थी?
-पूर्व निर्णयों की समीक्षा क्यों नहीं हुई?
-भूमि स्वामित्व रिकॉर्ड में खामियाँ रहते हुए संचालन कैसे चलता रहा?
-राजनीतिक जवाबदेही तय क्यों नहीं की गई?
-क्या सरकार पूरी फाइल जनता के सामने रखने को तैयार है?
Subharti–GBCM मामला अब केवल प्रशासनिक निर्णयों का प्रश्न नहीं रहा, बल्कि यह मुख्यमंत्री कार्यालयों की भूमिका, नीति-निर्माण की प्रक्रियाओं और राजनीतिक जवाबदेही का मुद्दा बन चुका है। सीबीआई जांच की घोषणा के बाद यह स्पष्ट है कि मामले को दबाया नहीं जा सकता, और शासन-प्रशासन तथा सत्ता पक्ष को अब पूरी सच्चाई सामने लानी होगी।
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