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प्रतीकात्मक चित्र

41 साल बाद मां की तलाश में भारत लौटा नीदरलैंड का मेयर, नागपुर के अनाथ आश्रम में छोड़ गयी थी माँ

@शब्द दूत ब्यूरो (16 जनवरी 2026)

नागपुर/नई दिल्ली। ज़िंदगी कभी-कभी ऐसे मोड़ लेती है, जो किसी कहानी या महाकाव्य से कम नहीं लगते। 10 फरवरी 1985 को महाराष्ट्र के नागपुर में जन्मा एक नवजात, जिसे जन्म के महज तीन दिन बाद उसकी मां ने सामाजिक भय के चलते छोड़ दिया, आज नीदरलैंड के एक शहर का मेयर है। 41 साल बाद वही बच्चा अपनी जन्मदात्री को ढूंढने भारत लौटा है। उसका नाम है फाल्गुन बिनेनडिज्क।

आधिकारिक रिकॉर्ड्स के मुताबिक, फाल्गुन की मां उस समय महज 21 साल की अविवाहित युवती थीं। सामाजिक दबाव और भय के चलते उन्होंने अपने बच्चे को नागपुर स्थित MSS (मातृ सेवा संघ) में छोड़ दिया था। यह संस्था अनाथ बच्चों और पीड़ित महिलाओं के लिए काम करती है। फाल्गुन करीब एक महीने तक यहीं रहे।

अनाथ आश्रम की एक नर्स ने इस बच्चे को नाम दिया—फाल्गुन। फरवरी का महीना हिंदू पंचांग में फाल्गुन कहलाता है और बच्चे का जन्म भी इसी महीने हुआ था। यही नाम उसकी पहचान बन गया। कुछ ही हफ्तों बाद फाल्गुन को मुंबई लाया गया, जहां भारत घूमने आए एक डच दंपति ने उसे गोद ले लिया और अपने साथ नीदरलैंड ले गए।

नीदरलैंड में फाल्गुन की परवरिश हुई। भारत उनके लिए बस भूगोल की किताबों में दिखने वाला एक नक्शा था। लेकिन उम्र के साथ उनके मन में अपनी जड़ों, अपनी असली मां को जानने की बेचैनी बढ़ती गई। इसी तलाश ने उन्हें पहली बार 18 साल की उम्र में, वर्ष 2006 में भारत खींच लाया। तब उन्होंने दक्षिण भारत की यात्रा की, लेकिन मां से जुड़ा सवाल अनुत्तरित ही रहा।

इस बार फाल्गुन एक अलग उद्देश्य के साथ भारत आए हैं। वे नागपुर पहुंचे, उसी MSS अनाथ आश्रम गए, जहां से उनकी जीवन-यात्रा शुरू हुई थी। फाल्गुन आज नीदरलैंड के हीमस्टेड शहर के मेयर हैं, जो राजधानी एम्स्टर्डम से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित है।

अपनी भावनाएं साझा करते हुए फाल्गुन कहते हैं,

> “मैं हमेशा से एक खुली किताब रहा हूं। मैंने महाभारत पढ़ी है और मुझे लगता है कि हर कर्ण को अपनी कुंती से मिलने का अधिकार है।”

अपनी मां को ढूंढने के लिए फाल्गुन ने कई NGOs, नगर पालिकाओं और पुलिस से मदद मांगी है। उनका कहना है,

> “मुझे लगता है कि वो आज भी मुझे छोड़ने के सदमे में होंगी। मैं उनसे कोई शिकायत नहीं करना चाहता। मैं सिर्फ उन्हें यह बताना चाहता हूं कि मैं ठीक हूं, खुश हूं। बस एक बार उन्हें देखना चाहता हूं।”

एक मां का त्याग, एक बच्चे की अनाथ शुरुआत और फिर एक देश का सम्मानित नागरिक बनने तक का सफर—फाल्गुन की कहानी सिर्फ व्यक्तिगत तलाश नहीं, बल्कि उन हजारों अनकही कहानियों की प्रतीक है, जो समाज के डर और मजबूरियों में दबकर रह जाती हैं।

अब सवाल यही है—क्या 41 साल बाद कर्ण और कुंती का मिलन संभव हो पाएगा?

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