@विनोद भगत
उत्तराखंड में पलायन कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन आज यह राज्य के सामाजिक और सांस्कृतिक अस्तित्व के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। पहाड़ों से रोज़गार, शिक्षा और बेहतर जीवन की तलाश में वर्षों पहले लोग मैदानों और महानगरों की ओर चले गए। अब जब सरकार रिवर्स पलायन को बढ़ावा देने की बात कर रही है, तो एक उम्मीद जगी है कि पहाड़ फिर से आबाद होंगे। मगर इस उम्मीद के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ी है — अपनी ही पैतृक जमीन की पहचान और उस तक पहुंच।
विडंबना यह है कि पहाड़ छोड़ चुके अधिकांश लोगों या उनके वंशजों के पास आज भी राजस्व विभाग के पुराने दस्तावेज मौजूद हैं। खतौनी, खसरा, नक्शे—सब कुछ है, लेकिन जमीन कहां है, यह पता करना एक बेहद जटिल और दुर्लभ प्रक्रिया बन चुका है। समय के साथ सीमाएं मिट गईं, निशानियां खत्म हो गईं और स्थानीय जानकारी का स्रोत भी टूट गया।
राहत की बात यह है कि कुछ मामलों में ये जमीनें आज भी बंजर पड़ी हैं और उन पर अवैध कब्जे नहीं के बराबर हैं। समस्या वहां और गंभीर हो जाती है, जहां वर्षों तक लौटकर न देखने वाले लोगों ने अपनी पैतृक संपत्ति बाहरी बिल्डरों को बेच दी। इन सौदों के बाद पहाड़ों में बड़े होटल, रिसॉर्ट और बहुमंज़िला इमारतें खड़ी हो गईं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कई मामलों में इन निर्माण कार्यों के दौरान परंपरागत रास्तों को बंद कर दिया गया। परिणामस्वरूप, जो लोग आज अपनी जमीन तलाश कर भी लेते हैं, वे उस तक पहुंच नहीं पाते। मजबूरी में उन्हें अपनी पैतृक भूमि उन्हीं बिल्डरों को बेचनी पड़ती है, जिन्होंने रास्ते अवरुद्ध कर दिए हैं। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत नुकसान नहीं, बल्कि पहाड़ के मूल निवासियों के अधिकारों पर सीधा प्रहार है।
यदि सरकार और प्रशासन ने समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों से मूल निवासियों का अधिकार समाप्त हो जाएगा। इसके साथ ही पहाड़ों का सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक मूल स्वरूप भी बदल जाएगा।
रिवर्स पलायन को वास्तव में सफल बनाना है, तो केवल योजनाएं नहीं, बल्कि पैतृक जमीन की पहचान, रास्तों की सुरक्षा और भू-अभिलेखों के सरलीकरण पर गंभीर नीति की आवश्यकता है। अन्यथा रिवर्स पलायन केवल एक नारा बनकर रह जाएगा।
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