@विनोद भगत
उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा सीबीआई जांच की संस्तुति देना न केवल एक प्रशासनिक निर्णय है, बल्कि यह तीन वर्षों से चले आ रहे जनआक्रोश, सामाजिक दबाव और न्याय की निरंतर मांग का प्रतिफल भी माना जा रहा है। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब प्रदेश में इस प्रकरण को लेकर फिर से जनभावनाएं उफान पर थीं और सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे थे।
अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने के लिए प्रदेश भर में माताओं-बहनों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न राजनीतिक दलों ने समय-समय पर आवाज उठाई। हालांकि इस पूरे संघर्ष के दौरान यह भी देखने को मिला कि कुछ तत्वों ने इस संवेदनशील मुद्दे को राजनीतिक लाभ या व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए भुनाने का प्रयास किया। इसके बावजूद, जनदबाव लगातार बना रहा और अंततः सरकार को एक बड़ा निर्णय लेने के लिए बाध्य होना पड़ा।
मुख्यमंत्री धामी की निर्णय-प्रक्रिया को लेकर यह धारणा रही है कि वे त्वरित प्रतिक्रिया के बजाय परिस्थितियों की गहन समीक्षा के बाद कदम उठाते हैं। अंकिता भंडारी प्रकरण में भी सरकार का यही रुख देखने को मिला। लंबे समय तक यह तर्क दिया जाता रहा कि किसी भी बड़े निर्णय से पहले तथ्यों की जांच और कानूनी कसौटी पर परख आवश्यक है। आलोचक इसे देरी मानते रहे, लेकिन समर्थकों का मत रहा कि जल्दबाजी में लिया गया फैसला न्याय की प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है।
राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो यह मामला सरकार के लिए अत्यंत संवेदनशील रहा है। आरोपों के घेरे में प्रभावशाली नाम आने की चर्चाएं, विपक्ष का लगातार दबाव और सड़क से सोशल मीडिया तक फैला आक्रोश — इन सभी ने सरकार की चुनौती को और जटिल बना दिया। ऐसे में सीबीआई जांच की संस्तुति देना यह संकेत देता है कि सरकार अब इस प्रकरण को राज्य की सीमाओं से ऊपर उठाकर केंद्रीय एजेंसी के हवाले करने को तैयार है।
यह निर्णय उस पृष्ठभूमि में भी महत्वपूर्ण है, जहां उत्तराखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित घोटालों को लेकर पहले ही सीबीआई जांच कराई जा चुकी है। इससे यह संदेश जाता है कि सरकार कुछ मामलों में केंद्रीय जांच एजेंसी को अंतिम विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि जनविश्वास बहाल करने के साधन के रूप में देख रही है।
सामाजिक दृष्टि से अंकिता भंडारी मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रदेश की बेटियों की सुरक्षा, सत्ता-संरक्षण और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास को देखते हुए यह राज्य संवेदनशील मुद्दों पर चुप रहने वाला नहीं रहा है। यही कारण है कि इस मामले में सरकार का हर कदम जनभावनाओं की कसौटी पर तौला गया।
सीबीआई जांच की संस्तुति के बाद अब अपेक्षा यही है कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध होगी। यह फैसला तभी सार्थक माना जाएगा जब जांच के दायरे में सभी दोषी, चाहे वे कितने ही प्रभावशाली क्यों न हों, कानून के शिकंजे में आएं। आधे-अधूरे निष्कर्ष या चयनात्मक कार्रवाई से जनआक्रोश और गहरा सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह निर्णय मुख्यमंत्री धामी के नेतृत्व की एक परीक्षा भी है। यदि जांच निष्पक्ष रूप से आगे बढ़ती है, तो यह सरकार की साख को मजबूत करेगा। वहीं, किसी भी प्रकार की शिथिलता या दबाव में लिया गया कदम सरकार के लिए भारी पड़ सकता है।
अंकिता भंडारी प्रकरण में सीबीआई जांच की संस्तुति उत्तराखंड की राजनीति और प्रशासन में एक निर्णायक मोड़ मानी जा सकती है। अब यह जांच एजेंसी और सरकार, दोनों की जिम्मेदारी है कि वे इस निर्णय को केवल घोषणा तक सीमित न रखें, बल्कि इसे न्याय तक पहुंचाने का माध्यम बनाएं। तभी यह कहा जा सकेगा कि अंकिता को सचमुच न्याय मिला और जनविश्वास बहाल हुआ।
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