@शब्द दूत ब्यूरो (22 दिसंबर 2025)
काशीपुर। राधे हरि राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, काशीपुर में छात्र संघ और महाविद्यालय प्रशासन के बीच लगातार टकराव की स्थिति बनी हुई है। इसी पृष्ठभूमि में शब्द दूत ने महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. सुमिता श्रीवास्तव और छात्र संघ अध्यक्ष जतिन शर्मा से विस्तृत बातचीत की, जिसमें दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क और चिंताएं खुलकर रखीं।
महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. सुमिता श्रीवास्तव ने कहा कि छात्र संघ और प्रशासन के बीच टकराव न केवल कॉलेज की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि इससे उत्तराखंड प्रदेश की छवि भी प्रभावित हो रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह महाविद्यालय कुमाऊं विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षा निदेशालय, उत्तराखंड शासन के अधीन है, ऐसे में शासन और विश्वविद्यालय के दिशा-निर्देशों का पालन करना प्रशासन का दायित्व है।
डॉ. श्रीवास्तव के अनुसार, कई बार छात्र संघ पदाधिकारियों को सभी शासकीय नियमों की पूरी जानकारी नहीं होती, जिससे उन्हें कुछ मांगें व्यावहारिक लगती हैं, लेकिन नियमों के दायरे में वे संभव नहीं हो पातीं। इसी कारण टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है। उन्होंने यह भी कहा कि नियमों की जानकारी नोटिस और समय-समय पर संवाद के माध्यम से दी जाती है, लेकिन जागरूक रहना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी भी है।
प्राचार्या ने छात्रों से अपील की कि वे अपनी ऊर्जा सकारात्मक दिशा में लगाएं और नियमों के भीतर रहकर अपनी समस्याएं रखें, जिनका समाधान प्रशासन करता रहा है और आगे भी करता रहेगा।
वहीं छात्र संघ अध्यक्ष जतिन शर्मा ने प्रशासन पर छात्रों की बातों को गंभीरता से न सुनने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि छात्र संघ का चुनाव छात्रों द्वारा वोट देकर किया जाता है, ताकि उनकी समस्याओं को प्रतिनिधित्व के साथ उठाया जा सके। जतिन शर्मा का कहना है कि सितंबर में चुनाव होने के बावजूद अब तक छात्र संघ और प्रशासन की औपचारिक बैठक नहीं हो पाई, जो संविधान और परंपरा के विपरीत है।
उन्होंने आरोप लगाया कि छात्र संघ की कई मांगें नियमों के भीतर हैं, इसके बावजूद उन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही। 31 दिसंबर को प्रस्तावित सांस्कृतिक कार्यक्रम, परीक्षा संबंधी मुद्दों, छात्र संघ कार्यालय की बदहाली, परीक्षा फॉर्म और सुरक्षा जैसे विषयों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इन मुद्दों को उठाना गलत नहीं है।
जतिन शर्मा ने यहां तक कहा कि यदि उन्हें पूरी जिम्मेदारी और अधिकार दिए जाएं तो वे एक माह के भीतर कई समस्याओं का समाधान कर सकते हैं, अन्यथा वे अपने पद से इस्तीफा देने को भी तैयार हैं।
दोनों पक्षों की बातचीत से साफ है कि महाविद्यालय में टकराव की जड़ नियमों की व्याख्या, संवाद की कमी और आपसी समन्वय का अभाव है। जहां प्रशासन नियमों के पालन को सर्वोपरि बता रहा है, वहीं छात्र संघ छात्रों की आवाज को अनसुना किए जाने का आरोप लगा रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या संवाद और नियमित बैठकों के माध्यम से इस टकराव को कम किया जा सकता है, ताकि महाविद्यालय का शैक्षणिक वातावरण और छवि दोनों सुरक्षित रह सकें।
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