@विनोद भगत
“अगर धरती पर कहीं सूर्य अपनी रथयात्रा पर उतरता है, तो वह स्थल उड़ीसा का कोणार्क ही हो सकता है।” — मेरे गाइड ने मुस्कराते हुए कहा, और मैं एकटक उस अद्भुत शिल्पकला के सामने खड़ा रह गया।
मेरी यह यात्रा पुरी से शुरू हुई, जो स्वयं एक तीर्थस्थल है। सुबह-सुबह जगन्नाथ मंदिर में दर्शन कर, मैंने टैक्सी ली और कोणार्क की ओर निकल पड़ा। सड़क समुद्र के साथ-साथ चलती है, और दूर तक फैली हरियाली, खजूर के पेड़ और स्थानीय जनजीवन इस रास्ते को मनोरम बना देते हैं। लगभग 35 किलोमीटर की यात्रा में करीब एक घंटे का समय लगा।
कोणार्क पहुँचते ही सबसे पहले मंदिर के विशाल प्रांगण ने मेरा ध्यान खींचा। प्रवेश द्वार से ही लगता है जैसे कोई समय-यात्रा पर निकल पड़ा हूँ। मंदिर का मुख्य ढांचा अब भी उतना ही भव्य है, जितना शताब्दियों पहले रहा होगा। मंदिर के ठीक सामने खड़े सात विशाल पत्थर के घोड़े – जिनमें अब अधिकांश भग्न हैं – सूर्यदेव के रथ को खींचते प्रतीत होते हैं।
यह मंदिर कोई साधारण मंदिर नहीं है। यह सूर्य के रथ के रूप में निर्मित है। दोनों ओर बारह विशाल पहिए – जो दिन के बारह घंटे दर्शाते हैं – और प्रत्येक पहिए में आठ तीलियाँ – यानी आठ प्रहर। यह समय के विज्ञान और आस्था का अद्भुत समागम है।
इन पहियों की शिल्पकला इतनी बारीकी से की गई है कि उनमें सजी आकृतियाँ, नारी शृंगार, संगीत व नृत्य मुद्राएँ, और दैनिक जीवन के दृश्य आज भी वैसी ही जीवंत लगते हैं जैसे अभी-अभी गढ़े गए हों।
13वीं सदी में गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। यह उनका सूर्यदेव के प्रति श्रद्धा भाव था। यह मंदिर सिर्फ पूजा का स्थल नहीं था, यह तत्कालीन वैज्ञानिक और खगोलीय ज्ञान का भी प्रतीक था।
मंदिर का मूल गर्भगृह अब बंद है। बताया जाता है कि अंग्रेजों के शासन काल में जब संरचना कमजोर होने लगी और कुछ मूर्तियाँ गिरने लगीं, तो उन्होंने मंदिर के मुख्य गर्भगृह को ईंटों से भरवा कर सील कर दिया। आज वहाँ केवल एक ऊँचा चबूतरा दिखाई देता है।
यहां एक विचित्र बात है – यह एक ‘मंदिर’ है, लेकिन यहाँ पूजा नहीं होती। ना कोई पुजारी, ना कोई आरती। लेकिन फिर भी, हजारों श्रद्धालु और पर्यटक हर दिन यहाँ आते हैं। यह स्थान अब ‘पूजा’ की जगह ‘दर्शन’ और ‘संवेदन’ का केंद्र बन गया है।
मंदिर के समीप ही चंद्रभागा समुद्रतट है। मंदिर दर्शन के बाद मैं वहाँ गया। सूर्य अस्त हो रहा था, और उसके रक्तिम प्रकाश में मंदिर की छाया समुद्र तक फैल गई थी। मैंने अपनी चप्पल उतारी, और कुछ क्षणों के लिए समुद्र की लहरों में अपने पैर डुबो दिए। जीवन की तमाम चिंताएँ जैसे वहीं बह गईं।
कोणार्क केवल एक स्थापत्य नहीं, यह एक दर्शन है। यह कला, विज्ञान, अध्यात्म और प्रकृति के सम्मिलन का प्रतीक है। यहां हर पत्थर बोलता है, हर आकृति कोई कहानी कहती है।
यह मंदिर हमारे पुरखों की उस चेतना का प्रमाण है, जिसमें शिल्प साधना, खगोलीय गणना और धार्मिक आस्था – तीनों का संगम हुआ करता था।
कोणार्क का सूर्य मंदिर मेरी अब तक की यात्राओं में सबसे विलक्षण अनुभव रहा। यहाँ समय ठहरता नहीं, बल्कि पहियों में घूमता है। घोड़े दौड़ते नहीं, पर प्रतीक हैं गति के। पूजा नहीं होती, लेकिन आस्था सिर झुकाती है।
यदि आपने अब तक कोणार्क नहीं देखा है, तो आप भारत की सांस्कृतिक विरासत का एक अद्भुत पन्ना पढ़ने से वंचित हैं।
यदि आप उड़ीसा जा रहे हैं, तो कोणार्क को अपनी सूची में अवश्य रखें। अक्टूबर से फरवरी के बीच का समय सबसे उपयुक्त है। साथ ही, वहाँ स्थित संग्रहालय में जाकर सूर्य मंदिर के इतिहास और संरचना की गहराई से जानकारी अवश्य लें।
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