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भारत में रहने वाली वह मानव प्रजाति जो किसी बाहरी इंसान के ‘स्पर्श’ से मर जाती है, भारत के इन अजूबे नागरिकों के बारे में जानिये

@शब्द दूत डेस्क (15 जुलाई 2025)

भारतीय उपमहाद्वीप के सुदूर पूर्व में स्थित अंडमान निकोबार द्वीप समूह सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य और समुद्री जैव विविधता के लिए ही नहीं, बल्कि यहां रहने वाली विलुप्तप्राय मानव प्रजातियों के लिए भी विख्यात है। इन द्वीपों में कुछ ऐसी जनजातियाँ निवास करती हैं जिनका संपर्क आधुनिक सभ्यता से नगण्य रहा है। इन्हीं में से एक है – सेंटिनली जनजाति, जिन्हें “स्पर्श से मरने वाले इंसान” कहकर भी वर्णित किया जाता है। यह परिभाषा प्रतीकात्मक है, लेकिन इसके पीछे का वैज्ञानिक और सामाजिक तथ्य अत्यंत गंभीर है।

उत्तर सेंटिनल द्वीप पर निवास करने वाली यह जनजाति दुनिया की सबसे अलग-थलग रहने वाली मानव सभ्यताओं में गिनी जाती है। माना जाता है कि ये लोग पिछले 60,000 वर्षों से भी अधिक समय से इस द्वीप पर रह रहे हैं और इन्होंने खुद को बाहरी दुनिया से पूरी तरह काट रखा है। भारतीय सरकार और वैज्ञानिक समुदाय इन्हें अत्यंत संवेदनशील जनजाति (Highly Vulnerable Tribe) मानते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो ‘आम इंसान के छूने से मर जाना’ एक अतिशयोक्ति है, लेकिन इसके मूल में एक कड़वा सच छिपा है। सेंटिनली लोग हजारों वर्षों से पृथ्वी की बाकी सभ्यताओं से अलग-थलग हैं। इसका अर्थ यह है कि उनका शरीर आज की दुनिया में प्रचलित वायरल या बैक्टीरियल बीमारियों के लिए प्रतिरोधक क्षमता नहीं रखता।

अगर कोई बाहरी व्यक्ति उनके संपर्क में आता है – खासकर उन्हें छूता है, तो वह अनजाने में उनके शरीर में संक्रमण पहुंचा सकता है, जिससे वे घातक बीमारियों (जैसे फ्लू, खसरा, या सर्दी-जुकाम भी) से मर सकते हैं। उनके शरीर ने इन बीमारियों से लड़ने के लिए कोई एंटीबॉडी विकसित नहीं की है। इसलिए, एक सामान्य मानव का संपर्क भी उनके लिए प्राणघातक साबित हो सकता है।

सेंटिनली जनजाति की अत्यंत संवेदनशीलता के बावजूद कई बार बाहरी लोग उनके क्षेत्र में घुसने का प्रयास कर चुके हैं।2006 में, दो मछुआरे गलती से सेंटिनल द्वीप के पास चले गए और जनजातियों द्वारा मारे गए। 2018 में, एक अमेरिकी मिशनरी जॉन एलेन चौ द्वारा जबरन द्वीप में घुसपैठ का प्रयास किया गया। वह उन्हें ईसाई धर्म का प्रचार करना चाहता था। परिणामस्वरूप, वह भी मारा गया। इन घटनाओं ने पूरी दुनिया का ध्यान इस ओर खींचा कि आधुनिक समाज की लापरवाही किसी पूरी सभ्यता के लिए घातक हो सकती है।

भारत सरकार ने उत्तर सेंटिनल द्वीप को एक संरक्षित क्षेत्र घोषित किया है। किसी भी व्यक्ति का वहाँ जाना कानूनन प्रतिबंधित है।

‘Andaman and Nicobar Islands (Protection of Aboriginal Tribes) Regulation, 1956’ के तहत यह क्षेत्र संरक्षित है। यहां बिना अनुमति के जाना, किसी वस्तु का आदान-प्रदान करना, या उनके क्षेत्र में उतरना अपराध की श्रेणी में आता है।

प्राकृतिक और सांस्कृतिक विविधता की दृष्टि से सेंटिनली जनजाति मानव सभ्यता का अमूल्य जीवाश्म हैं। वे मानव विकास की उस अवस्था को दर्शाते हैं जहाँ तकनीक, भाषा, औद्योगीकरण, और धर्म जैसे पहलू कभी विकसित नहीं हुए।

इनके संरक्षण से हम यह समझ सकते हैं कि मानव विकास के विभिन्न सोपान कैसे रहे होंगे।साथ ही, उनकी असुरक्षित जैविक संरचना हमें यह सिखाती है कि ‘सभ्यता का विकास यदि विनाश का कारण बन जाए, तो वह प्रगति नहीं, आपदा है।’

सेंटिनली जनजाति कोई अजूबा नहीं, बल्कि हमारी ही तरह इंसान हैं – बस अलग ऐतिहासिक और जैविक संदर्भों में विकसित हुए। उनका ‘स्पर्श से मर जाना’ विज्ञान की उस भयावह हकीकत को उजागर करता है जहाँ ‘अत्यधिक विकसित’ समाज, एक असंक्रमित समाज के लिए जानलेवा बन सकता है।

इसलिए, इन्हें देखने या जानने की जिज्ञासा मन में हो तो भी, दूरी बनाए रखना ही मानवता की सबसे बड़ी सेवा होगी। उत्तरी सेंटिनल द्वीप करीब 60 वर्ग किलोमीटर का है और इसकी सटीक जनसंख्या बता पाना मुश्किल है। इस द्वीप पर जाना गैरकानूनी है।

सेंटिनल जनजाति भारत सरकार के अधीन आती है। साल 1956 में भारत ने उत्तरी सेंटिनल द्वीप को एक आदिवासी आरक्षित क्षेत्र घोषित किया और इसके पांच किलोमीटर के दायरे में किसी भी यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया।

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