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गड्ढे और जलभराव : लोकतंत्र के अमर स्तंभ, एक व्यंग कृपया कमजोर दिल वाले न पढ़ें

@विनोद भगत

जब बारिश की पहली बूँदें गिरती हैं, तब आसमान को बादलों से, कवियों को प्रेम से, और भारत सरकार को गड्ढों से प्रेम हो जाता है। सड़कें ऐसी सजी-संवरी लगती हैं जैसे कोई बारात निकली हो—बस दूल्हा फिसल जाए तो शादी का मज़ा दोगुना हो जाए।

गड्ढा यानी विकास का प्रतीक। ये जितने गहरे, उतना ही गहरा राजनैतिक चिंतन!

हर गड्ढा एक कहानी कहता है।
एक सड़क का गड्ढा बताता है कि कितनी बार वहां टेंडर पास हुआ, कितने बार बजट आया और कैसे जनता को सड़क नहीं, सिर्फ आसवां मिलने की परंपरा दी गई।
गड्ढे की आत्मा कराहती है, लेकिन ठेकेदार मुस्कुराते हैं। नेता उसकी तस्वीर खींचता है, और विभागीय अभियंता कहता है – “ठीक तो था, बारिश ने धो दिया।”

जलभराव अब सिर्फ मौसम का खेल नहीं रहा, वो योजनाओं की नालियों से उपजा शहरी उत्सव है।
जहाँ जलभराव है, वहाँ मुद्दा है।
जहाँ मुद्दा है, वहाँ मीडिया है।
और जहाँ मीडिया है, वहाँ नेताजी छाता लिए खड़े हैं – “हमारी सरकार आते ही जल को रास्ता मिलेगा।”

गड्ढे चुनाव से पहले संवरते हैं।
वे भरते नहीं, गहराते हैं।
विपक्ष कहता है – “यह देखो पिछले कार्यकाल की करतूत।”
सत्ता कहती है – “हम सुधारने आए हैं, इसलिए तुम्हें दिख रहा है।”
जनता कहती है – “ये भी ठीक है, अगली बार दूसरे को मौका देंगे।”
गड्ढा मुस्कुराता है, जानता है – उसकी नौकरी पक्की है।

गली का बच्चा अब पार्क नहीं जाता।
वो स्कूल से लौटकर नाली पार कर गड्ढों में नहाता है।
जलभराव में उसका बचपन, राजनीति की मस्ती में डूबा होता है।
माँ डांटती है – “कीचड़ में क्यों कूदा?”
बच्चा कहता है – “नेताजी भी तो इसी में फोटो खिंचवा रहे थे!”

एक सड़क को बनवाने में जितना समय नहीं लगता, उससे ज़्यादा टेंडर पास कराने में लगता है।
फाइलें घूमती हैं, जैसे नृत्य कर रही हों।
इंजीनियर कहता है – “सड़क बनी थी, पर ट्रक चलने से टूट गई।”
ठेकेदार कहता है – “हमने तो गुणवत्ता का काम किया था, लेकिन जनता ने चल-चलकर खराब कर दी।”

देश के इंजीनियरिंग कॉलेजों में ‘गड्ढा विज्ञान’ पर शोध चल रहा है।
थ्योरी ये है कि अगर सड़क पूरी तरह से समतल हो जाए तो देश की जनता आलसी हो जाएगी।
गड्ढों से जीवन में स्पीड ब्रेकर आता है, और यही ब्रेकर देश को संतुलित करता है।
गड्ढा न हो तो सरकार के पास बहाना न बचे।

जब प्रशासन कहता है – “बारिश ने हमारा सिस्टम धो डाला।”
तो जनता कहती है – “कहीं आपका सिस्टम कागज़ पर तो नहीं था?”

कृत्रिम रूप से तैयार किया गया जलभराव अब स्मार्ट सिटी का हिस्सा है।
हर इलाके में “पॉकेट तालाब” बनाना आज की प्रशासनिक सफलता मानी जाती है।

नेताजी गड्ढे में खड़े होकर तस्वीर खिंचवाते हैं।
कैप्शन होता है – “हम हैं जनता के साथ, कीचड़ में भी।”
अगली तस्वीर में वही नेताजी हेलीकॉप्टर से उड़ जाते हैं।
गड्ढा वहीं का वहीं।
कमेन्ट में जनता पूछती है – “पानी नहीं निकला?”
सरकारी पेज जवाब देता है – “आपका सुझाव अधिकारियों तक पहुँचा दिया गया है।”

देशभर के लोग अब “गड्ढा पर्यटन” पर निकलते हैं।
“देखो, ये उस मुख्यमंत्री की गली है जहाँ गड्ढे में ट्रक समा गया था।”
“यहाँ पिछले साल नाव चलाई गई थी।”
यानी पर्यटन स्थलों में अब ताजमहल के साथ गड्ढों की श्रृंखला भी जोड़ी जा रही है।

जलभराव से उत्पन्न व्यापारिक अवसर

नाव विक्रेता खुश

ट्रैक्टर चालक व्यस्त

चप्पल कंपनियाँ चहकती

नल फिटर, मोटर मैकेनिक, बूट पालिशर – सब मुस्कुरा रहे
जलभराव न हो तो इनका व्यापार कैसे चले?

नेता और नाली का संबंध बहुत गहरा है।
जहाँ जलभराव होगा, वहाँ नाली पर आरोप होगा।
जहाँ नाली होगी, वहाँ फोटो सेशन होगा।
जनता सोचती है – “नाली साफ क्यों नहीं होती?”
नेता सोचते हैं – “अगर साफ हो गई तो फिर दिखाएँगे क्या?”

बारिश के मौसम में रिपोर्टर जलभराव में घुसकर लाइव रिपोर्ट करता है –
“मैं खड़ा हूँ इस डेढ़ फीट गहरे पानी में… यहां हर साल यही होता है…”
स्टूडियो में बैठा एंकर पूछता है – “क्या कोई नेता मौके पर पहुँचा?”
रिपोर्टर – “जी नहीं, वो चुनाव से पहले आए थे, अभी ट्विटर पर ही सक्रिय हैं।”

जनता की आदत डाल दी गई है।
वो सोचती है – “चलो, इस बार ज्यादा पानी नहीं भरा।”
अर्थात त्रासदी की तुलना ही उसकी तसल्ली बन गई है।
हर साल जलभराव होता है, और हर साल वही सरकार फिर वादा करती है।

कुछ बाबाजी कहते हैं – “गड्ढा तुम्हारे कर्मों का फल है।”
कुछ नेता कहते हैं – “हमारी नियति ठीक कर रहे हैं, सड़क बाद में।”
और जनता सोचती है – “क्या भगवान भी अब टेंडर सिस्टम से काम कर रहा है?

कौन गिरा सबसे स्टाइल में?

किसने सबसे लंबी छलांग लगाई?

गड्ढे में गिरकर सबसे जल्दी उठा कौन?

गांव की पंचायतें अब स्थानीय स्तर पर “गड्ढा ओलंपिक” की तैयारी कर रही हैं।

विपक्ष ने मोबाइल ऐप लॉन्च किया है – “गड्ढा बताओ, सरकार हटाओ!”
इसमें आप अपने इलाके का गड्ढा GPS से अपलोड कर सकते हैं।
नेता लोग गड्ढों की गिनती कराकर चुनावी घोषणा करते हैं।

हर ठेकेदार कहता है – “हमने पूरा मैटेरियल डाला था, जनता ही ज्यादा चलती है।”
कोई पूछे – “अगर जनता नहीं चलेगी तो सड़क किसलिए?”
ठेकेदार जवाब देता है – “सवालों से तो बजट नहीं मिलता।”

कोई भी पार्टी नहीं चाहती कि गड्ढा हमेशा के लिए भर जाए।
वरना अगली बार विपक्ष किस बात पर चिल्लाएगा?
जनता को मुद्दा चाहिए, नेता को बहाना।
गड्ढा दोनों को संतुष्टि देता है।

गड्ढा रहेगा, क्योंकि हम वही रहेंगे

हम बदलते नहीं।
हम हर बार गिरते हैं – या गड्ढे में या झाँसे में।
और फिर अगली बार उसी नेता से पूछते हैं – “इस बार कुछ होगा?”
वो मुस्कुराता है – “इस बार गड्ढा नहीं, फ्लाईओवर बनाएँगे।”
लेकिन हम जानते हैं – वह फ्लाईओवर भी पानी में ही तैरेगा।

अंत में एक निवेदन

अगर आपको यह लेख पढ़कर गुस्सा नहीं आया और सिर्फ हँसी आई,
तो समझ लीजिए — व्यवस्था ने अपना काम कर दिया।

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