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आपातकाल, इंदिरा गांधी और आरएसएस: बाला साहब देवरस का एक ऐतिहासिक पत्र की रोशनी में,इंदिरा गांधी से मिलने की थी इच्छा, सच झूठ की पड़ताल

@शब्द दूत ब्यूरो (25 जून 2025)

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून 1975 एक ऐतिहासिक मोड़ था, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की। वर्षों तक यह प्रचारित किया गया कि यह कदम केवल संसद सदस्यता बचाने के लिए उठाया गया था। किंतु, आरएसएस प्रमुख बालासाहब देवरस द्वारा लिखे गए पत्र से यह मिथक टूटता है।

1. ऐतिहासिक पत्र की झलक

प्रेषक: बालासाहब देवरस
प्राप्तकर्ता: श्रीमती इंदिरा गांधी
तिथि: 10 अक्टूबर 1975
स्थान: यरवदा केंद्रीय कारागार, पुणे

“उच्चतम न्यायालय के पाँचों न्यायाधीशों ने आपका चुनाव वैध ठहराया, इसके लिए आपको हार्दिक अभिनंदन।”

“संघ को समाप्त करने का कोई कारण नहीं है…”

“यदि सरकार कोई रास्ता निकालना चाहती है तो हमसे संपर्क किया जा सकता है।”

ये है वो पत्र जो कि बाला साहब देवरस ने लिखा था

2. विश्लेषणात्मक टाइमलाइन (1971 – 1977)

  • 1971: इंदिरा गांधी भारी बहुमत से चुनाव जीतती हैं।
  • 12 जून 1975: इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा चुनाव अवैध घोषित।
  • 24 जून 1975: सुप्रीम कोर्ट द्वारा आंशिक राहत।
  • 25 जून 1975: आपातकाल की घोषणा।
  • 10 अक्टूबर 1975: देवरस का पत्र – चुनाव वैध ठहराने पर बधाई।
  • 1976: आरएसएस पर प्रतिबंध और गिरफ्तारियाँ।
  • मार्च 1977: आपातकाल समाप्त, कांग्रेस की हार।

3. दस्तावेजी विश्लेषण: प्रमुख बिंदु

  • इंदिरा गांधी की संसद सदस्यता सुप्रीम कोर्ट द्वारा वैध ठहराई गई थी।
  • आरएसएस ने संघर्ष के बजाय समझौते का मार्ग अपनाया।
  • प्रचार और ऐतिहासिक यथार्थ में भारी अंतर है।

4. मिथक बनाम यथार्थ

प्रचारित मिथक ऐतिहासिक यथार्थ
इंदिरा गांधी ने संसद सदस्यता बचाने के लिए आपातकाल लगाया। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सदस्यता को वैध ठहराया था।
संघ ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया। संघ प्रमुख ने सरकार को पत्र लिखकर बधाई दी और समझौते का प्रस्ताव दिया।

आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी से मिलने की देवरस की इच्छा का जिक्र उनकी खुद की किताब में भी मिलता है। देवरस की पुस्तक ‘हिंदू संगठन और सत्तावादी राजनीति’ से पता चलता है कि जेल जाने के बाद उन्होंने इंदिरा गांधी को कई पत्र लिखे थे।

यरवदा जेल पहुंचने के करीब दो माह बाद देवरस ने इंदिरा गांधी को अपना पहला पत्र लिखा था। 22 अगस्त 1975 को लिखे इस पत्र शुरुआत कुछ इस तरह होती है, ”15 अगस्त 1975 को दिल्ली के लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करते हुए, जो भाषण आपने किया, उसे मैंने आकाशवाणी से, यहां कारागार में गौर से सुना, आपका भाषण समयोचित और संतुलित हुआ। और इसलिए मैंने आपको यह पत्र लिखने का फैसला किया।”

इसी पत्र में आगे देवरस इंदिरा गांधी को लगभग संघ की लगाम सौंपते हुए लिखते हैं, ”… जो आपने अपने 15 अगस्त के भाषण में सारे समाज का आह्वान किया वह समयोचित था। आरएसएस का कार्य पूरे देश में फैला हुआ है। उसमें समाज के सभी वर्गों, स्तरों के लोग हैं। अनेक त्यागी कार्यकर्ता संघ में हैं। संघ का सारा कार्य निस्वार्थ भावना पर आधारित है। संघ की ऐसी शक्ति का योजनापूर्वक उपयोग देश के उत्थान के लिए होना जरूरी है।” संघ से प्रतिबंध हाटने का निवेदन करते हुए देवरस अपने अपने पत्र के आखिर में लिखते हैं, ”आपको उचित जान पड़े, तो आपसे मिलने में मुझे आनंद ही होगा।”

यह पत्र पिछले 50 वर्षों से फैले एक बड़े राजनीतिक झूठ का पर्दाफाश करता है। इतिहास को प्रचार और भावनाओं के बजाय दस्तावेज़ों और तथ्यों के आधार पर पढ़ा जाना चाहिए। यह समय है कि हम अपनी नई पीढ़ी को सत्य से अवगत कराएं और इतिहास का पुनर्मूल्यांकन करें।

 

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