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व्यंग्य :कहने को देवतुल्य जनता और हकीकत में भिखारीतुल्य, मुफ्तखोर बनाती सत्ता की व्यवस्था

@विनोद भगत 

नेताजी मंच पर चढ़े, माइक सम्हाला और अपने चेहरे पर वही पुराना भाव चिपका लिया—“आपकी सेवा में सदैव समर्पित हूं।” चारों ओर भीड़ थी, हाथों में झंडे, आँखों में उम्मीद, और जेबों में केवल अंगूठे। नेताजी की आवाज़ गूंजने लगी, “मेरी देवतुल्य जनता! हम आपको मुफ्त राशन देंगे, मुफ्त इलाज देंगे, मुफ्त शिक्षा देंगे… आपके जीवन की हर कठिनाई का बोझ सरकार उठाएगी।”

तालियों की गड़गड़ाहट! कुछ युवाओं ने मोबाइल निकाल कर वीडियो बनाना शुरू किया, कुछ वृद्ध महिलाओं ने आंखें बंद करके नेताजी के प्रति श्रद्धा प्रकट की, और कुछ बेरोजगार युवकों ने बगल वाले से पूछा, “भाई ये स्कीम कब से लागू होगी?”

तभी भीड़ के बीच से एक आवाज आई—“नेताजी कह तो रहे हैं कि हम देवतुल्य हैं, लेकिन बना रहे हैं हमें भिखारी तुल्य।”

यह वाक्य बिजली की तरह समूचे वातावरण में कौंध गया। नेताजी के चेहरे पर एक क्षण को बल पड़ा। उन्होंने चश्मा उतार कर फिर से चढ़ाया और बोले, “बेटा, यह सरकार आपके लिए माता तुल्य है। माता अपने बच्चों को देती है, उनसे कुछ नहीं मांगती।”

पर बच्चा अब बड़ा हो चुका था। वो जानता था कि जब सरकार किसी चीज़ को मुफ्त कहती है, तो वह दरअसल करदाता की जेब से पैसा निकालकर वोटर की थाली में परोस रही होती है।

भीड़ में एक पढ़ा-लिखा युवक बुदबुदाया, “मुफ्त का भोजन, मुफ्त की शिक्षा और मुफ्त इलाज से क्या हम सक्षम बनेंगे या सिर्फ़ आश्रित? क्या सरकार हमें आत्मनिर्भर बना रही है या आत्महीन?”

अब तक मंच के पास बैठे कुछ नेता चिंतित हो उठे थे—यह ज्यादा सोचने वाली जनता है, इसे “विकास” की बातों में उलझाना पड़ेगा।

नेताजी ने फिर से माइक संभाला—“हमने किसानों का कर्ज माफ किया, युवाओं को बेरोजगारी भत्ता दिया, बेटियों के विवाह के लिए सहायता राशि दी, और अब हम हर नागरिक को हर महीने एक निश्चित राशि देने जा रहे हैं ताकि किसी को कोई कष्ट न हो।”

जनता अब दुविधा में थी—आश्वासन तो मीठे थे, पर सवाल यह था कि यह सब देना कब तक संभव होगा? और किस कीमत पर?

व्यंग्य यह नहीं है कि सरकार मुफ्त दे रही है, बल्कि यह है कि वह देने के बहाने लोगों को अपनी क्षमता से दूर कर रही है। आज “देवतुल्य जनता” का अर्थ हो गया है—वोटबैंक मात्र, जिसे भले ही सशक्त न बनाओ, लेकिन संतुष्ट रखना ज़रूरी है। आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी यदि नागरिक अपनी आवश्यकताओं के लिए सरकार की ओर इस तरह टकटकी लगाए बैठे हैं, तो यह सामाजिक विकास की पराजय है।

बेरोजगार युवक ने आखिर में कहा, “नेताजी, हमें भीख नहीं, अवसर दीजिए। हमें मुफ्त खाना नहीं, मेहनत की रोटी चाहिए। मुफ्त इलाज नहीं, स्वच्छ जीवनशैली चाहिए। मुफ्त शिक्षा नहीं, गुणवत्ता वाली शिक्षा और रोजगार चाहिए।”

पर नेताजी मुस्करा दिए। भीड़ अब उनकी भाषणशैली की आभा में खो चुकी थी। मंच के नीचे लगी बड़ी होर्डिंग पर लिखा था—”आपके सपनों की सरकार!”

और जनता उसी सपने को आंखों में लिए फिर से घर लौट गई—आश्वासन की रोटी और योजना का नमक लेकर।

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