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भारत में पिछले एक दशक में बढ़ती गरीबी और विदेशी कर्ज: विकास के भ्रमजाल में फंसी अर्थव्यवस्था — एक विश्लेषणात्मक लेख

@विनोद भगत

पिछले एक दशक में भारत ने वैश्विक मंचों पर अपने ‘विकासशील राष्ट्र’ से ‘विकसित राष्ट्र’ बनने के दावों को खूब प्रचारित किया। नारे गढ़े गए – “5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था”, “न्यू इंडिया”, “सबका साथ, सबका विकास”, लेकिन इन तमाम नारों के पीछे जो कड़वा यथार्थ छिपा रहा, वह था – गरीबी का पुनरुत्थान और विदेशी कर्ज का बढ़ता जाल।

2014 के बाद से जब केंद्र में राजनीतिक नेतृत्व बदला और आर्थिक सुधारों की बात की गई, तब यह अपेक्षा थी कि देश की आम जनता, विशेषकर निम्न और मध्यम वर्ग के लोग, आर्थिक रूप से सशक्त होंगे। लेकिन वास्तविकता यह रही कि गरीबी रेखा के नीचे जीने वालों की संख्या न केवल स्थिर रही, बल्कि कई रिपोर्टों के अनुसार 2018 के बाद से इसमें पुनः वृद्धि देखी गई।

अर्थशास्त्रियों की मानें तो कोविड-19 महामारी ने इस प्रवृत्ति को और गंभीर कर दिया। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लाखों लोग रातोंरात बेरोजगार हुए। शहरों से गांव लौटते हुए मजदूरों के काफिले महज दृश्य नहीं थे, बल्कि एक ध्वस्त आर्थिक संरचना की चीखते हुए गवाह थे।

इस लेख का उद्देश्य केवल आलोचना करना नहीं, बल्कि यह चेताना है कि यदि भारत को वास्तव में आत्मनिर्भर, समावेशी और टिकाऊ अर्थव्यवस्था बनानी है, तो उसे सबसे पहले गरीबी और ऋण के संकट को गहराई से समझकर ठोस नीतियों के साथ आगे बढ़ना होगा। वरना हम भले ही चंद्रयान भेजें, लेकिन ज़मीन पर भूखे पेट सोने वालों की संख्या और भी अधिक हो जाएगी। – लेखक 

भारत सरकार ने योजनाओं की घोषणा तो की, लेकिन ज़मीनी क्रियान्वयन में विफलता, भ्रष्टाचार और असमान वितरण ने इन योजनाओं को खोखला बना दिया। मनरेगा जैसी योजनाएं आज भी करोड़ों गरीबों का सहारा बनी हैं, जबकि यह केवल आपातकालीन रोजगार गारंटी योजना थी। यह अपने-आप में इस बात का संकेत है कि देश की गरीब जनता अब भी अस्थायी राहत पर निर्भर है, स्थायी समाधान से वंचित है।

अब बात करें विदेशी कर्ज की, तो यह स्थिति और भी चिंताजनक है। साल 2014 में भारत पर कुल विदेशी कर्ज़ लगभग 450 अरब डॉलर था, जो 2024 के अंत तक बढ़कर 630 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है। यह केवल आंकड़ों की बात नहीं है, यह उस नीति विफलता का परिणाम है जो ‘आत्मनिर्भरता’ की बात करते हुए भी निरंतर वैश्विक ऋण व्यवस्था पर आश्रित होती चली गई।

यह विडंबना है कि भारत जैसे विशाल और संसाधन-सम्पन्न देश को अपने बुनियादी ढांचे और जन कल्याण योजनाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय ऋणदाताओं की ओर देखना पड़ता है। इससे न केवल अर्थव्यवस्था पर ब्याज का बोझ बढ़ता है, बल्कि देश की आर्थिक स्वतंत्रता पर भी सवाल खड़े होते हैं।

इस दौरान भारत ने कई करोड़पतियों को अरबपति बनते देखा, लेकिन सामाजिक असमानता की खाई और गहरी होती चली गई। ऑक्सफैम, वर्ल्ड बैंक और IMF की रिपोर्टें बार-बार इंगित करती हैं कि भारत में गिनी कोफिशेंट (आर्थिक असमानता को दर्शाने वाला सूचकांक) तेजी से असंतुलित हुआ है।

जब सरकारें आंकड़ों के सौंदर्यीकरण में व्यस्त होती हैं और ज़मीनी समस्याओं को “अस्थायी” या “प्रोपेगेंडा” कहकर खारिज करती हैं, तब सामाजिक असंतोष धीरे-धीरे ज्वालामुखी में बदलने लगता है। भारत आज उसी कगार पर खड़ा है जहाँ गरीब अपनी हालत से हार मान चुका है, मध्यम वर्ग करों के बोझ से झुक चुका है और अमीर वर्ग नीतियों का लाभ उठा कर और अमीर होता चला गया है।

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