Breaking News

 क्या कलमकार कलयुगी नहीं होता : अपराध के आईने में हम और आप “कौन है जो आज कलयुगी नहीं है?

@विनोद भगत

जब भी कोई जघन्य अपराध होता है—भाई ने भाई की हत्या कर दी, बेटों ने माता-पिता को घर से निकाल दिया, रिश्तों का खून हो गया—हम मीडिया, अखबारों और सोशल मीडिया में एक वाक्य पढ़ते हैं: “कलयुगी बेटे ने…” या “कलयुगी भाई ने…”। यह वाक्य अब आम हो चला है। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि यह वाक्य लिखने वाला कौन है?

क्या वह सतयुग का है, या त्रेता, या फिर द्वापर युग का कोई बचा-खुचा प्रतिनिधि? नहीं! वह भी तो कलयुग का ही प्राणी है। तो फिर यह “कलयुगी” शब्द उसके लिए नहीं, सिर्फ अपराधी के लिए क्यों? क्या जो लिख रहा है, वह इस युग से बाहर खड़ा होकर मूल्यांकन कर रहा है?

भारतीय दर्शन में युगों को क्रमशः गिरते नैतिक मूल्यों के संदर्भ में देखा गया है। सतयुग – धर्म का पूर्ण पालन,त्रेता – धर्म का तीन-चौथाई, द्वापर – आधा धर्म, कलयुग – धर्म का एक-चौथाई अंश।

परंतु यहाँ प्रश्न यह उठता है कि क्या युग ही दोषी है या युग में रहने वाला इंसान?

जब राम ने रावण का वध किया था, क्या त्रेता युग निर्दोष हो गया था? जब कौरवों ने द्रौपदी का चीरहरण किया था, क्या द्वापरयुग अपराधमुक्त था? नहीं। अपराध हर युग में थे, फर्क बस यह था कि तब अपराध करने वाले को “दुराचारी” कहा जाता था, “त्रेतायुगी” या “द्वापरयुगी” नहीं।

जब हम किसी एक व्यक्ति के कुकृत्य को पूरे युग पर थोप देते हैं—“कलयुगी बेटा”, “कलयुगी भाई”, “कलयुगी बहू”—तो हम अनजाने में पूरे समाज के प्रति एक पूर्वग्रह (prejudice) गढ़ते हैं। यह वैसा ही है जैसे कोई कहे, “पंडित झूठे होते हैं” या “नेता चोर होते हैं”। ऐसे वाक्य तर्क की नहीं, भावनात्मक प्रचार की उपज होते हैं।

लिखने वाला भी तो कलयुग में जी रहा है, उसका कलम भी इसी युग का हिस्सा है। तो फिर अपराध को युग से जोड़ना कहाँ तक उचित है?

अगर हम पुराण और इतिहास पढ़ें तो पाते हैं कि रक्तपात, छल, कपट, लालच और हिंसा हर युग में थी। भाई ने भाई को सतयुग में भी मारा (इंद्र ने बलि का संहार किया), द्वापर में भी (कृष्ण और बलराम के बीच वैचारिक मतभेद), और कलयुग में तो तकनीक और हथियारों ने इसे और विकराल बना दिया।

तो फिर क्यों “कलयुग” को अपराध का पर्याय बना दिया गया?

यह लेख किसी युग विशेष का बचाव नहीं कर रहा, बल्कि उस मानसिकता का विरोध कर रहा है जो एक अपराधी की हरकत को पूरे युग के माथे मढ़ देती है। एक पत्रकार, लेखक या कवि जब किसी घटना का वर्णन करता है, तो उसे चाहिए कि विवेक और संतुलन बनाए रखे, न कि “कलयुगी” जैसे संज्ञाओं से समाज को निराशा में धकेले।

हमें अपने भाषा चयन में सतर्कता बरतनी होगी।अपराध को अपराध की तरह देखना होगा, युग से जोड़ने की प्रवृत्ति से बचना होगा। मीडिया और लेखक वर्ग को चाहिए कि कलयुग को कोसने के बजाय समाज को जागरूक करने पर ध्यान दें।

युग कभी दोषी नहीं होता, दोषी होता है उस युग में जी रहा इंसान। और अगर हम युग को कोसते रहेंगे तो हम अपने ही समय, अपने ही अस्तित्व को कलंकित कर रहे होंगे। हमें अपनी कलम से सच को सामने लाना है, न कि उसे ढंकने के लिए ‘कलयुग’ शब्द का सहारा लेना है। अगर कलयुग का दोष है तो हम सभी अपराधी हैं। और कलयुग का दोष है तो अपराधी निर्दोष है।

Check Also

आज काशीपुर आ रहे सीएम धामी से कांग्रेस नेता संदीप सहगल की अपील: ‘चैती मेले में रामनगर रोड से होकर आइए, तब दिखेगी जनता की परेशानी’

🔊 Listen to this @शब्द दूत ब्यूरो (30 मार्च 2026) काशीपुर। कांग्रेस के पूर्व महानगर …

googlesyndication.com/ I).push({ google_ad_client: "pub-