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कहानी :”75 के मंत्री, 60 के शिक्षक “सक्रिय और निष्क्रिय की परिभाषा

@विनोद भगत

आज एक भव्य समारोह का आयोजन किया गया था? शिक्षा मंत्री का 75 वां जन्मदिन था और आज ही शहर के सबसे बड़े विद्यालय के तीन शिक्षकों का सेवानिवृत्त होने पर सम्मान समारोह भी था। दोनों आयोजन एक साथ जोड़ दिये गए थे।

सभागार भव्य था। रंगीन झालरों से सजे मंच पर सजीवता थी। कुर्सियों की कतारें व्यवस्थित थीं, जिन पर विभागीय अधिकारी, प्राचार्य, शिक्षकगण और कुछ छात्र-छात्राएँ बैठे थे। मंच के पीछे एक विशाल बैनर लहराता दिख रहा था —
“शिक्षा मंत्री श्री दुर्वासा प्रसाद जी को 75वें जन्मदिवस की शुभकामनाएँ।”

कार्यक्रम शुरू होने से पूर्व मंत्री जी की पार्टी का एक कार्यकर्ता मंत्री जी का परिचय इस अंदाज में दे रहा था। “हमारे ऊर्जावान, यशस्वी और 75 की उम्र में भी सक्रिय महापुरुष माननीय शिक्षा मंत्री श्री दुर्वासा प्रसाद जी का इस आयोजन में शामिल होने पर हम सब आपका आभार प्रकट करते हैं।

उधर मंच पर बैठे मंत्री जी ने अपने साथ प्रोटोकॉल के तहत आये सरकारी चिकित्सक को इशारा किया। दरअसल मंत्री जी को बीपी शुगर जैसी गंभीर बीमारियां थी। वह अचानक असहज महसूस करने लगे। थोड़ी देर के लिए कार्यक्रम रुक गया। चिकित्सक ने दवा दी और ऊर्जावान यशस्वी मंत्री जी फिर सहज हो गये।

तालियाँ बजने लगी । ढोलक की थाप पर सुरों की गूँज थी। कैमरे चमक रहे थे। सफेद झब्बेदार बालों वाले मंत्री जी जब माइक पर पहुँचे, तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। सामने कुर्सी पर बैठे लोग भी, जिनमें कई अधिकारी उनसे उम्र में छोटे थे, मुस्कुरा कर खड़े हो गए।

मंत्री जी ने माइक थामा और गला खँखारते हुए बोले —
“साथियों! यह क्षण मेरे लिए बहुत गौरव का है। मैं आज 75 वर्ष का हो गया। इस दीर्घ यात्रा में मुझे शिक्षा विभाग की सेवा करने का सौभाग्य मिला। और मैं आज भी उसी ऊर्जा से कार्य कर रहा हूँ जैसे 40 साल पहले करता था।” मंत्री जी के इतना कहते ही हॉल में तालियाँ बजने लगीं।

तालियों का शोर सुनकर मंत्री जी उत्साहित हो गये और  अपना स्वर ऊँचा किया। मेरे 75 वें जन्मदिन के साथ ही आज इस विद्यालय के 60 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके शिक्षकों का सेवानिवृत्ति का शुभ दिवस भी है।  दरअसल 60 की उम्र के बाद कार्यकुशलता में स्पष्ट गिरावट आ जाती है। और हमारे विद्यार्थियों को, हमारे देश को, केवल ऊर्जावान और दक्ष शिक्षक चाहिए। 60 के बाद आदमी थक जाता है… उसकी सोच पुरानी हो जाती है।”सभागार में फिर से तालियाँ बजीं, लेकिन कुछ चेहरे निर्विकार थे।

सेवानिवृत्त होने वाले तीनों शिक्षक अमरदेव शर्मा, ज्योति प्रसाद मिश्रा और श्यामलाल जी के गले में मालाएं पड़ी थी। तीनों शिक्षक अपने गले में पड़ मामालाओं के फूलों को हल्के हाथों से दबा रहे थे।  तीनों ने इसी शहर के राजकीय इंटर कॉलेज में 35 वर्षों तक सेवा की थी। और आज सेवानिवृत्त हो रहे थे।

उनकी आँखों में मंत्री जी की बातें सुनकर एक अजीब ठहराव था। चेहरे पर दर्द और व्यंग्य की परछाइयाँ थी। तीनों को अभी भी अपने कार्यकाल के दौरान छात्र छात्राओं को को पढ़ाय गगये अपने अपने विषय की पूरी जानकारी थी। लेकिन उम्र आड़ आआ गयी इसलिए वह अयोग्य घोषित थे। ये अयोग्यता नीति की वजह से उपजी अयोग्यता थी।

अमर देव शर्मा की प्रिय शिष्या  रीमा आज एक विश्वविद्यालय की व्याख्याता थी। वह भी समारोह में मौजूद थी। वह लपककर उनके पास पहुँची, चरण स्पर्श किए।

“गुरुजी, आपके दिये ज्ञान से आज मैं उच्च पद पर हूँ।

शर्मा जी ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन होंठ काँप गए।

“तुम्हें देखकर लगता है मैंने कुछ तो ठीक किया होगा ज़िंदगी में,” उन्होंने धीमे स्वर में कहा।

रीमा ने उत्सुकता से मंत्री जी की बातें सुनीं, फिर शर्मा जी की आँखों में झाँकते हुए बोली —
“आपके जैसे गुरु को नकारना ही हमारी व्यवस्था की विडंबना है।”

सभा समाप्त होने को थी। मंत्री जी मंच से उतरने ही वाले थे कि छात्र प्रतिनिधियों से संवाद का क्रम शुरू हुआ। एक-एक कर छात्रों को माइक दिया जाने लगा। कुछ ने कविता सुनाई, कुछ ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

तभी रीमा ने हाथ उठाया।

“मुझे एक प्रश्न पूछना है मंत्री जी से,” उसने कहा।

मंच पर थोड़ी हलचल हुई, पर मंत्री जी ने इशारे से अनुमति दे दी।

रीमा खड़ी हुई, स्वर में संयम था लेकिन शब्दों में आग —
“मंत्री महोदय, आपने कहा कि 60 वर्ष की उम्र में शिक्षक कार्यकुशल नहीं रह जाते, क्योंकि उम्र के साथ उनकी सोच पुरानी हो जाती है। क्या आप बता सकते हैं कि 75 की उम्र में जब आप स्वयं शिक्षा विभाग का नेतृत्व कर रहे हैं, तब आप अपनी सोच को कितना नया मानते हैं?”

सभा में सन्नाटा।

रीमा आगे बोली —
“यदि उम्र ही मानदंड है कार्यकुशलता का, तो क्या यह नीति सभी पर समान रूप से लागू नहीं होनी चाहिए? क्या आपके पास आज भी वह मानसिक ऊर्जा है जो एक शिक्षक को कक्षा में चाहिए? क्या आपने आखिरी बार किसी विद्यार्थी की आँखों में झाँककर देखा कि वह क्या सोच रहा है?”

मंत्री जी का चेहरा तमतमा उठा। उनकी मुस्कान जम गई थी। संचालक ने माहौल संभालने की कोशिश की, लेकिन श्रोता अब फुसफुसाने लगे थे।

मंच के पीछे बैठे अधिकारी चुप थे। कुछ गर्दनें झुकी थीं, कुछ आँखें गले में माला पहने बैठे सेवानिवृत्त हो रहे तीनों शिक्षकों की तरफ मुड़ी थीं।

रीमा ने अंतिम बात कही —
“अगर 60 की उम्र में ज्ञान निष्क्रिय हो जाता है, तो क्या 75 की उम्र में सत्ता सक्रिय रह सकती है?”

मंत्री जी ने कुछ जवाब नहीं दिया। उन्होंने माइक नीचे रखा, और मंच से उतरते हुए सिर झुका लिया।

सभा के बाहर मिश्रा जी एक पेड़ के नीचे खड़े थे। सूरज की धूप धीमे-धीमे पत्तों से छनकर उनके चेहरे पर पड़ रही थी।
रीमा उनके पास आकर बोली —
“गुरुजी, आज मंच से शायद मैंने एक बीज बोया है। अब देखना है कि वह पौधा बनता है या नहीं।”

मिश्रा जी ने मुस्कराते हुए कहा —
“शिक्षा का बीज जहाँ बोया जाता है, वहाँ देर-सबेर हरियाली ज़रूर आती है। तुम्हारे प्रश्नों ने मेरी पीड़ा को शब्द दिए हैं।”

वे दोनों चुपचाप चल दिए, और पीछे तालियों की गूंज धीरे-धीरे स्मृति में बदलती गई। उधर ऊर्जावान और यशस्वी मंत्री जी की जय जयकार के नारे लग रहे थे।

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