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कहानी :”अधूरी चेतना का समाज “संस्कृति का विनाश, आदर्शों का रूपांतरण

@विनोद भगत

अधूरी चेतना का समाज

शीकापुर शहर के मध्य स्थित ‘शारदा पुस्तकालय’ कभी युवाओं का ज्ञानकेंद्र था। उसकी दीवारों पर लगी थीं भारत के महान विचारकों की तस्वीरें—स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, डॉ. अंबेडकर, टैगोर और मदर टेरेसा की। आज उन तस्वीरों को हटाया जा रहा था। उनकी जगह LED स्क्रीन लगाई जा रही थी जिसमें एक रैप कलाकार स्टेज पर खड़ा गा रहा था—”बोल मेरी रानी, तू हॉट है कहां से…”

पुस्तकालय के कोने में बैठे प्रोफेसर विवेकानंद शर्मा यह सब चुपचाप देख रहे थे। एक जमाने में उन्होंने यहीं बैठकर रामधारी सिंह दिनकर और भगवतीचरण वर्मा के साहित्य पर व्याख्यान दिए थे। पर आज किसी को उन नामों से सरोकार नहीं।

“सर, हम 21वीं सदी में हैं। आज़ादी का मतलब है कि हम जो चाहें वो पहनें, देखें, कहें। आपकी संस्कृति की बातें दकियानूसी लगती हैं।”

यह आवाज़ थी ऋचा की—तीसरे वर्ष की छात्रा, जिसके इंस्टाग्राम पर लाखों फॉलोअर्स थे। आज वह प्रो. शर्मा के “संस्कृति बनाम अश्लीलता” विषय पर आयोजित संगोष्ठी में बोल रही थी।

शर्मा ने गहरी सांस ली—
“आज़ादी अगर अनुशासनहीनता में बदल जाए, तो वह समाज को उच्छृंखल बना देती है। आज के युवा स्वतंत्र तो हैं, पर दिशाहीन हैं।”

“तो आप क्या चाहते हैं? हम फिर घूंघट में जाएं?”—एक अन्य छात्र ने व्यंग्य किया।

“नहीं,” शर्मा बोले, “मैं चाहता हूँ कि आप जानें कि संस्कृति कोई बंधन नहीं, वो एक दर्पण है—जो हमें हमारी असली पहचान दिखाती है।”

इस बहस का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
शीर्षक था—“संस्कृति के नाम पर बोलने की आज़ादी पर हमला!”
ट्रेंड चल पड़ा—#CancelOldMindset #LetYouthBreathe

मंच पर उभरता नया चेहरा था आदित्य, जो एक वेबसीरीज़ का हीरो था—वह जिसमें नंगा शरीर, शराब और गालियाँ ‘यथार्थ’ के नाम पर दिखाए जाते थे।

इंटरव्यू में उसने कहा, “हम नया भारत बना रहे हैं। जहाँ मन का किया जाय, न कि मनुवादी संस्कारों का बोझ उठाया जाए।”

उसे सुनने वाले हजारों थे, प्रोफेसर शर्मा को सुनने वाले अब गिने-चुने।

 

राघव मिश्रा, एक उभरते हुए राजनेता, आदित्य को अपने युवा सम्मेलन का मुख्य अतिथि बना लेते हैं। बैनर पर आदित्य का चेहरा गांधीजी से बड़ा छपता है।

राघव प्रेस मीट में कहते हैं, “हम युवा ऊर्जा को आगे लाना चाहते हैं। परंपराओं में जकड़े समाज को अब आगे बढ़ने की ज़रूरत है।”

कोई उनसे पूछता नहीं कि उनके खुद के बच्चे लंदन के स्कूलों में क्यों पढ़ते हैं?
या वे खुद क्यों स्वदेशी की बात करते हुए विदेशी ब्रांड पहनते हैं?

 

टेलीविज़न चैनलों पर बहस होती है—

“क्या रामायण अब भी प्रासंगिक है?”
“क्या संस्कृति विकास की दुश्मन है?”

हर बहस में प्रो. शर्मा जैसे वृद्ध चिंतकों को आमंत्रित किया जाता है, और फिर उन्हें ज़लील कर निकाल दिया जाता है।

चिल्लाते एंकर, भड़काते शब्द—“बोल्ड कंटेंट पर क्यों रोक लगे? कौन तय करेगा अश्लीलता की परिभाषा?”

 

एक दिन शर्मा अपने बेटे आकाश से बात कर रहे थे।

“बेटा, जब तुम छोटे थे तो रामायण पढ़कर सोते थे। अब तुम्हारा बेटा वीडियो गेम्स में बंदूक चला रहा है।”

आकाश ने गहरी साँस ली—“पापा, अब समय बदल गया है। आप हर बात में संस्कृति ढूंढते हैं। लेकिन आज की दुनिया में व्यावहारिक होना पड़ता है।”

शर्मा चुप हो गए। बेटे के तर्क में दम था, पर आत्मा खाली।

 

‘भारत संस्कार महोत्सव’ नामक कार्यक्रम होता है। राघव मिश्रा मंच पर बोलते हैं—
“हम संस्कारों को आधुनिकता से जोड़ेंगे!”

पीछे डांस ग्रुप ‘बॉलीवुड रील्स’ अंग्रेज़ी गानों पर ठुमके लगाता है। लड़कियाँ पारंपरिक कपड़ों में, पर नाभि और पीठ पूरी तरह उघड़ी हुई। दर्शक हर्षित। तालियाँ गूंजती हैं।

शर्मा सोचते हैं—“यह महोत्सव है या मज़ाक?”

अचानक उन्हें एक पत्र मिलता है—

> “सर, मैं नील हूँ। मैं आपकी कक्षा में पीछे बैठता था।
मैं जानता हूँ कि हम आपसे कटते जा रहे हैं, पर विश्वास कीजिए, हमें भी दिशा चाहिए।
क्या आप हमें फिर से गीता पढ़ाएँगे? अब समझ में आ रहा है कि हम कितनी उलझन में हैं…”

 

शर्मा की आँखें भर आईं। वर्षों बाद किसी छात्र ने विनम्रता से मार्ग माँगा था।

टीवी पर अचानक पुरुषोत्तम बाबा छा जाते हैं। वे कहते हैं,
“मैं संस्कृति का संरक्षक हूँ। जो औरतें छोटे कपड़े पहनती हैं, वे नरक जाएँगी।”

उन्हें फॉलो करने वालों की संख्या करोड़ों में पहुंचती है।
शर्मा आश्चर्यचकित—“जो सच कहे, उसे ट्रोल किया जाता है। और जो अंधविश्वास बेचे, उसे पूज लिया जाता है।”

 

एक मल्टीनेशनल कंपनी की मीटिंग—
“न्यू शो चाहिए—बोल्ड, न्यूड, अनफिल्टर्ड।”

“कोई कंटेंट नहीं, कॉन्ट्रोवर्सी चाहिए।”

कला, साहित्य, आदर्श—अब यह शब्द नहीं रहे। अब ‘क्लिक’ और ‘वायरल’ ही उद्देश्य हैं।

 

शर्मा कुछ दिन के लिए अपने पैतृक गाँव जाते हैं। वहां अभी भी लोग मंदिर जाते हैं, सुबह तुलसी में जल चढ़ाते हैं। पर अब भी गाँव में लड़के मोबाइल में “सुपर हॉट शॉर्ट्स” देखते हैं।

“संस्कार यहाँ भी दरकने लगे हैं,” उन्होंने दुख से कहा।

शर्मा शहर लौटते हैं और एक छोटा सा पोस्टर छपवाते हैं—
“शब्द नहीं, चरित्र बोलें।”

वह पोस्टर दीवारों पर नहीं, दिलों पर लगने लगा।
कुछ युवाओं ने चुपचाप उनका साथ दिया।

एक दिन उनका पोता आर्यन टीवी देख रहा था। विज्ञापन में एक अभिनेत्री बोलती है—“रिवीलिंग इज़ रिवोल्यूशन।”

आर्यन पूछता है—“दादाजी, हम कौन हैं?”

शर्मा आईना उठाकर उसे सामने खड़ा कर देते हैं।
पर आईने में चेहरा धुंधला है—जैसे पहचान खो गई हो।

नील, ऋचा, और कई अन्य युवा शर्मा से मिलने आते हैं।

“सर, हमें फिर से पढ़ाइए। हमारी आज़ादी में बेकाबूपन घुस गया है।”

शर्मा मुस्कुराते हैं—“चलो, अब गीता और कबीर दोनों पढ़ेंगे। बिना जज किए, बस समझने के लिए।”

अब भी समाज में भ्रम है।
पर कुछ युवा अब प्रश्न करने लगे हैं।
आदर्श अब थोड़े से लोग खुद चुनने लगे हैं—राजनेताओं द्वारा थोपे नहीं जाते।

शर्मा अब क्लास नहीं लेते, पर उनके घर हर संडे को युवा जुटते हैं।
चाय, किताबें और विचार चलते हैं।

और दीवार पर विवेकानंद की वही पुरानी तस्वीर फिर से टंगी है—
नीचे लिखा है—
“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य न प्राप्त हो।”

 

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