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हकीकत या अफसाना: सुरेश और नरेश,एक उच्च शिक्षित अफसर दूसरा अल्पशिक्षित नेता जब मिले तो….

आईएएस बनाम नेताजी (हकीकत या कुछ और फैसला आप पाठकों पर है)

सुरेश आईएएस में चयनित हो गया। पूरे परिवार में खुशी का माहौल था। नाते रिश्तेदार बधाईयां दे रहे थे। इससे पहले भी जब सुरेश ने हाईस्कूल व इंटर परीक्षा में टॉप किया था तब भी ऐसा ही कुछ हो रहा था।

पढ़ाई के दौरान सुरेश का एक सहपाठी था। क्लास का सबसे कमजोर और शरारती बच्चों में वह गिना जाता था। पूरे स्कूल के बच्चों को ताकीद की जाती थी कि नरेश से दूर रहा करो। नरेश दिन भर पढ़ाई-लिखाई के अलावा सारे वाहियात काम करता रहता था। जबकि इसके विपरित सुरेश का अधिकांश समय अध्ययन में बीतता था। उसका लक्ष्य था प्रशासनिक सेवा में जाने का।

सुरेश के घर में भी उसके परिवार से साफ चेतावनी थी कि नरेश से दोस्ती मत करना। बिगड़ा हुआ बच्चा है तुम्हें भी बिगाड़ देगा। नरेश के परिवार वाले भी उसकी वजह से हो रही बदनामी से परेशान होकर उस शहर को ही छोड़ कर चले गये। कहां गये? किसी को बताकर भी नहीं गये।और बताते भी क्यों? किसी को क्या पड़ी थी जो उनसे संबंध रखना चाहता।

खैर, छोड़िये नरेश का जिक्र ही क्यों करना? हमारी कथा का नायक तो सुरेश है । पर इस कथा में नरेश भी आयेगा आगे।

बात सुरेश की ही करते हैं। आईएएस में चयनित होने के बाद ट्रेंनिंग पीरियड में सुरेश को शहर के एसडीएम पद पर भेजा गया। नया शहर था लेकिन सुरेश प्रशासनिक अधिकारी के दायित्व के निर्वहन के लिए उत्सुक था। एक हाकिम के तौर पर नहीं बल्कि लोक सेवक के रूप में वह काम करना चाहता था।

शहर में कार्यभार ग्रहण करते ही शहर के तमाम लोग सुरेश से मिलने आये और स्वागत किया। इसमें उनके स्टाफ के अलावा सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के लोग शामिल थे।

सुरेश को भीतर ही भीतर अपने ऊपर गर्व हो रहा था।
इसी बीच एक फोन उसके पास आया। दूसरी ओर से रौबदार आवाज में एक शख्स बोल रहा था।

“नये एसडीएम बोल रहे हो तुम?” फोन पर अपने लिए कुछ अजीब सी आवाज जिसमें सम्मान कम रौब ज्यादा था। सुनकर सुरेश कुछ असहज महसूस करने लगा फिर भी एसडीएम पद की गरिमा को कायम रखते हुए सुरेश ने जबाब दिया जी हाँ, आप कौन?

मैं सत्ताधारी पार्टी के संगठन के अनुशासनात्मक कमेटी के अध्यक्ष का निजी सचिव बोल रहा हूँ।

सुरेश इस शहर में पहली बार आया था और उसके प्रशासनिक सेवा के प्रशिक्षण की यह पहली पोस्टिंग थीं इसलिए वह नम्रता से बोला, “जी, कहिये।

उधर से जबाब मिला कि तुम एक घंटे के भीतर साहब के कार्यालय में पहुंचो और साहब तुमसे मिलना चाहते हैं।
सुरेश अचकचा गया। एक प्रशासनिक अधिकारी से इस लहजे में बात। बात भी क्या आदेश था और वह भी सख्त लहजे में था।

आईएएस बनने के बाद सुरेश का यह पहला अनुभव था।
खैर, इसे नौकरी का पहला अनुभव सोच कर सुरेश बोला ठीक है कहाँ आना है?

फोन करने वाले ने कहा कि हमारा आदमी तुम्हारे पास पहुंच रहा है उसके साथ आ जाना।
सुरेश फिर अचम्भे में पड़ गया। हमारा आदमी ऐसा लग रहा था कि कोई गैंग का आदमी आयेगा।

बहरहाल थोडी देर बाद एक व्यक्ति आया और सीधे एसडीएम कार्यालय में घुस गया बोला आपको मेरे साथ चलना है। सुरेश ने उसे देखा। कुर्ता और जींस पहने वह व्यक्ति अजीब-सा लगा।

लेकिन सत्ताधारी दल का व्यक्ति था इसलिए सुरेश चुप रहा। सुरेश ने अपने सरकारी ड्राइवर को बुलवाया और उस व्यक्ति के साथ वह चल दिया। पंद्रह मिनट के बाद वह अनुशासन कमेटी के अध्यक्ष के निवास पर पहुंच गया।

भीतर पहुंचते ही एसडीएम सुरेश को एक सोफे पर बिठा दिया गया। एक व्यक्ति आया और बोला साहब अभी आते हैं।

दस मिनट बाद साहब यानी सत्तारुढ़ पार्टी की अनुशासन कमेटी के अध्यक्ष कमरे में आये।
सुरेश ने जैसे ही उसे देखा वह अचकचाकर खड़ा हो गया।

अरे, यह तो वही नरेश है जो उसका सहपाठी था। अब सुरेश की नजर उसके बंगले की साज सजावट पर पड़ी। शानदार बंगले का मालिक नरेश ठाठ-बाट के साथ उसके सामने खड़ा था। ये वही उसका सहपाठी था जो कि स्कूल का सबसे निकृष्ट छात्र था।

नरेश की आवाज से एसडीएम सुरेश के विचारों की श्रृंखला भंग हो गई।

क्या देख रहे हैं एसडीएम साहब?

सुरेश ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा और बोला “आप, वही है ना जो…..

एकाएक नरेश जोर से हंस पड़ा।” अच्छा, तो पहचान लिया मुझे।”

हां, मैं वही हूँ। तुम्हारे स्कूल के दिनों का बेकार छात्र। लेकिन आज देखो राजनीति ने मुझे कहाँ पहुंचा दिया। और शिक्षा ने तुम्हें कहाँ तक पहुंचाया। मैं ये नहीं कह रहा कि शिक्षा पाकर तुमने गलत किया। पर आजकल का दौर ही कुछ ऐसा है कि शिक्षा पर राजनीति हावी है। अब देखो ना मैं कक्षा आठ से आगे पढ़ नहीं पाया और तुम उच्च शिक्षा प्राप्त कर एक ऊंचे ओहदे पर पहुंच गए हो लेकिन दोस्त राजनीति ऐसी चीज है जहाँ अब शिक्षा की कोई वकत नहीं रह गई। अच्छे अच्छे शिक्षित लोग हम जैसे राजनेताओं के आदेश मानने पर विवश हैं।

खैर, छोड़ो मैं तुम्हारे सम्मान में कोई कमी नहीं छोड़ूंगा। चूंकि तुम मेरे मित्र रहे हो इसलिए अपनी खूब जमेगी। वो पहले वाला एसडीएम मेरी बात नहीं मान रहा था सो उसे सस्पेंड होना पड़ा।

आशा है कि तुम सहयोग बनाए रखोगे।
सुरेश आश्चर्य से उसे देख रहा था कि नरेश उसे चेतावनी दे रहा है या मित्रता निभा रहा है।

इसी बीच नरेश बोला कि मैं अब चल रहा हूँ पार्टी की मीटिंग है। फिर मिलते हैं। इतना कहकर नरेश चल दिया।
एसडीएम सुरेश अवाक था। अपनी सरकारी गाड़ी में बैठकर कार्यालय जाते हुये वह इतना ही सोच रहा था कि सही रास्ता कौन-सा है? उसका यानी सुरेश का या फिर जो रास्ता नरेश ने अपनाया? क्या राजनीति का एक रूप ये भी है?

नोट -क्या ये कहानी आपको हकीकत से रूबरू कराती है? अपनी राय जरुर दें।

– विनोद भगत “आंगिरस”

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