@शब्द दूत ब्यूरो (05 अगस्त, 2023)
2013 की आपदा ने केदारघाटी से लेकर केदारनाथ का भूगोल बदलकर रख दिया था। गौरीकुंड से रुद्रप्रयाग के बीच मुनकटिया, रामपुर, खाट, सेमी, भैंसारी, रामपुर, बांसवाड़ा, विजयनगर कई क्षेत्र हादसों का सबब बने हुए हैं लेकिन सरकारें, प्राकृतिक आपदा कम हो इसके प्रयास कम करने की योजना बनाने के बजाय केदारनाथ पुनर्निर्माण तक ही सिमटकर रह गई।
केदारनाथ पैदल मार्ग पर न तो भूस्खलन जोन का ट्रीटमेंट हो पाया न ही पैदल रास्ते का विकल्प ढूंढा गया। जबकि रुद्रप्रयाग जिला भूकंप व अन्य प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से पांचवें जोन में है।
साल 1976 में भूस्खलन से ऊपरी क्षेत्रों में मंदाकिनी का प्रवाह अवरुद्ध हो गया था। तीन साल बाद यानि 1979 में क्यूंजा गाड़ में बाढ़ से कोंथा, चंद्रनगर और अजयपुर क्षेत्र में भारी तबाही मची, जिसमें 29 लोग मारे गए।
साल 1986 में जखोली तहसील के सिरवाड़ी में भूस्खलन से 32 ग्रामीणों की मौत हो गई। इसी तरह 1998 में हुए भूस्खलन से भेंटी और पौंडार गांव ध्वस्त हो गए। साथ ही 34 गांवों को काफी नुकसान पहुंचा था। इस हादसे में 103 लोगों की जानें चली गई थीं।
साल 2001 में ऊखीमठ के फाटा में बादल फटा, जिसमें 28 लोगों की मौत हो गई थी। इसी प्रकार 2002 में बड़ासू और रैल गांव में भूस्खलन हुआ। साल 2003 में स्वारीग्वांस मेंं भूस्खलन की घटना के बाद 2004 में घंघासू बांगर में भूस्खलन हुआ।
साल 2005 में बादल फटने से विजयनगर में भारी तबाही हुई, जिसमें चार लोगों की मौत हुई। साल 2006 डांडाखाल क्षेत्र में बादल फटा और साल 2008 में चौमासी-चिलौंड गांव में भूस्खलन हुआ। एक युवक मरा और कई मवेशी मलबे मेंं दबे।
साल 2009 में गौरीकुंड घोड़ा पड़ाव मेंं भूस्खलन से दो श्रमिकों की मौत हो गई। साल 2010 में भी जनपद में कई स्थानों पर बादल फटने की घटनाएं हुई।
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