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गठबंधन के गुब्बारे की फजीहत@क्षेत्रीय दलों की अस्मिता पर लग रहे प्रश्न चिन्ह पर वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल की बेबाक कलम से

राकेश अचल, लेखक देश के जाने-माने पत्रकार और चिंतक हैं, कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में इनके आलेख प्रकाशित होते हैं।

देश में गठबंधन की राजनीति नयी नहीं है। आजादी के पहले से इस तरह की राजनीति के बीज पड़ गए थे, जो आज 75 साल बाद बटवृक्ष बन गए हैं। लेकिन बूढ़े बरगद भी कभी न कभी तो गिरते ही हैं। बिहार में गठबंधन का बटवृक्ष थरथरा रहा है। भाजपा के नेतृत्व में बने गठबंधन में अब जो भी राजनीतिक दल हैं वे या तो मजबूरी में हैं या उनके सामने कोई विकल्प नहीं है , और जिनके सामने विकल्प है वे भाजपा से कन्नी काटने के लिए हर तरह से उतावले दिखाई दे रहे हैं।

कहने को तो देश में एनडीए की सरकार है लेकिन उसमें गठबंधन का धर्म अब अधर्म में बदलता जा रहा है। बीते 24 साल से ये गठबंधन सत्ता संघर्ष में साथ-साथ रहा है, लेकिन धीरे-धीरे गठबंधन से आजिज दल भाजपा का दामन छोड़कर अलग हो रहे हैं। गठबंधन के सहारे भाजपा देश के 20 राज्यों में सत्ता हासिल करने में कामयाब रही लेकिन धीरे-धीरे छोटे या क्षेत्रीय दलों का भाजपा से मोहभंग हो रहा है। पहले एनडीए में 20 दल थे,अब तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना जैसे बड़े क्षेत्रीय दल उसके साथ नहीं हैं। बिहार में भी जेडीयू किस दिन भाजपा को अलविदा कह दे कहा नहीं जा सकता। किसान आंदोलन के समय पंजाब का अकाली दल भी भाजपा से अलग हो चुका है।

भाजपा की बढ़ती सत्तालिप्सा और सहयोगी दलों के मानमर्दन की नीति की वजह से एनडीए संकट में हैं। बिहार में नया गठबंधन के आकार लेने और एनडीए में टूट की आहट साफ सुनाई दे रही है। बिहार की ताजा सियासी गतिविधियो और तमाम दलों के नेताओं की प्रतिक्रियाओं से इस आहट को और बल मिला है। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह और प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा की प्रतिक्रिया से भाजपा के प्रति उनकी तल्खी साफ नजर आ रही है।

बिहार में स्वतंत्र रूप से सत्ता हासिल करना भाजपा का पुराना सपना है। बीते 72 साल में बिहार में लगभग सभी दलों ने शासन कर लिया लेकिन भाजपा के हिस्से में ये सौभाग्य नहीं मिला। हालाँकि भाजपा जेडीयू के साथ मिलकर सत्ता सुख भोग रही है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्ढा ने पिछले दिनों पटना में बिहार विधानसभा की 200 सीटों पर अकेले लड़ने और भविष्य में कोई भी क्षेत्रीय दल वजूद में न रहने की बात कहकर जेडीयू समेत तमाम क्षेत्रीय दलों की अस्मिता को झकझोर दिया है। अब यहां जेडीयू और भाजपा का भाई-भाई का रिश्ता टूटता दिखाई दे रहा है।

बिहार में यदि भाजपा की हठधर्मी की वजह से कोई नया गठबंधन आकार लेगा तो संख्याबल करीब दो तिहाई होगा। महागठबंधन में राजद 79, कांग्रेस 19 और वामदल 16 यानी कुल 114 विधायक हैं। जदयू-हम की संख्या 49 है। सभी मिलकर 163 विधायक होते हैं।अभी जो दल यूपीए के साथ हैं वे भाजपा को बिहार की सत्ता से बेदखल करने के लिए जेडीयू के साथ काम करने को तैयार हैं। जेडीयू अन्य दलों को भाजपा के मुकाबले कम खतरनाक दिखाई देता है।

सुशासन बाबू के नाम से जाने जाने वाले बिहार के मुख्यमंत्री एक जमाने में प्रधानमंत्री पद के लायक समझे जाते थे,लेकिन वे अपनी निजी मजबूरियों के चलते बिहार तक ही सीमित रहे। लेकिन वे समय-समय पर भाजपा को चमकाते रहे। केंद्रीय मंत्रिमंडल में जेडीयू के प्रतिनिधित्व के सवाल पर भाजपा की हठधर्मी ने नीतीश बाबू को एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वे अब भाजपा के साथ रहें या नहीं ? गुस्से में भरे नीतीश बाबू नीति आयोग की बैठक में भी नहीं गए। भाजपा ने नितीश कुमार के व्यवहार को नोट किया लेकिन अपनी रणनीति में कोई तब्दीली नहीं की है।

आपको याद होगा कि हिंदुत्व के मुद्दे पर एक राग अलापने और शिव सेना के साथ गलबहियां करने वाली भाजपा आज न केवल शिव सेना की दुश्मन नंबर एक है बल्कि उसने शिव सेना को दो फाड़ भी कर दिया है। महाराष्ट्र का प्रयोग भाजपा बिहार में भी दोहराना चाहती है | लेकिन महाराष्ट्र और बिहार के राजनितिक गणित एकदम उलटे हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना को तोड़कर भाजपा ने सत्ता हासिल कर ली किन्तु बिहार में ये नामुमकिन है। बिहार में यदि भाजपा जेडीयू का नुक्सान करने का सोचती है तो जेडीयू का साथ देने के लिए एक नहीं बल्कि अनेक दल पलक पांवड़े बिछाए खड़े हुए हैं। कांग्रेस हो या राजद सब इस मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहते।

खुदा न खस्ता यदि नीतीश कुमार अगर भाजपा से गठबंधन तोड़ते हैं तो कांग्रेस के साथ-साथ भाकपा माले, माकपा और हम ने उनके समर्थन का एलान किया है। कांग्रेस पार्टी ने विधानमंडल दल की बैठक में नीतीश कुमार को समर्थन देने का फैसला किया। माकपा ने कहा है कि बिहार में नये सत्ता समीकरण का वह स्वागत करेगा। वहीं एनडीए में जदयू के सहयोगी ‘हम’ ने कहा है कि वह हर निर्णय में जदयू के साथ है। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बिना शर्त समर्थन देने का ऐलान किया है । पार्टी विधानमंडल दल के नेता अजीत शर्मा के आवास पर हुई विधायकों की बैठक में पार्टी ने तय किया कि अगर कोई परिस्थिति बनती है और मुख्यमंत्री महागठबंधन के साथ सरकार बनाते हैं तो कांग्रेस उसका बिना शर्त समर्थन करेगी।

कुल मिलाकर स्थिति ये है कि बिहार में भाजपा घिर चुकी है| उसकी स्थिति सांप-छंछून्दर जैसी हो गयी है। वो यदि जेडीयू के साथ रहती है तो उसका राज्य में अकेले सरकार बनाने का भावी प्लान विफल होता है और अगर साथ छोड़ती है तो भविष्य की सम्भावनाएँ धूमिल होतीं हैं। कांग्रेस बिहार में बीते 34 साल से बाहर है। उसे सत्ता में वापसी तो दूर बिहार में खड़े रहने तक के लिए सहारा चाहिए। कांग्रेस के साथ अभी राजद जैसा प्रमुख विपक्षी दल है। यदि जेडीयू से भी उसकी दोस्ती हो जाये तो कांग्रेस को राहत मिल सकती है और भाजपा को रोकने के मकसद में भी आंशिक सफलता मिल सकती है।

इस बात की पूरी आशंका है कि बिहार में सत्ता परिवर्तन होते ही भाजपा बिहार में भी ईडी ,ईडी का खेल खेलगी ,लेकिन ऐसा करने से पहले उसे सौ बार सोचना पडेगा , क्योंकि बिहार दूसरे प्रदेशों से अलग राजनीति चरित्र वाला सूबा रहा है। बिहार जयप्रकाश नारायण के समग्र क्रांति आंदोलन का एक प्रमुख केंद्र रहा है। जेपी ने गुजरात जाकर क्रांति का बिगुल फूँका था। भाजपा यदि बिहार वालों को छेड़ती है तो उसे गुजरात में भी चुनौतियों का सामना करना ही पडेगा। अब देखना ये है कि गठबंधन के दो प्रमुख ध्रुव एनडीए और यूपीए क्या गुल खिलते हैं ? गठबंधन का गुब्बारा पंचर तो हो ही चुका है।
@ राकेश अचल

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