@शब्द दूत ब्यूरो (26 जुलाई, 2022)
पर्यावरण और वन्यजीव प्रेमियों के लिए आज का दिन बेहद खास है। क्योंकि आज दुनिया के ऐसे मशहूर शिकारी का जन्मदिन है जिन्होंने न सिर्फ आदमखोर बाघों और गुलदारों का शिकार किया, बल्कि स्थानीय जनता को पर्यावरण का पाठ भी पढ़ाया। मशहूर शिकारी जिम कॉर्बेट का उत्तराखंड से खास नाता था।
उनके नाम पर साल 1936 में भारत का पहला नेशनल पार्क बना जिसे आज कॉर्बेट नेशनल पार्क के नाम से जाना जाता है। उन्होंने न सिर्फ 50 से ज्यादा आदमखोर बाघों बल्कि 250 से ज्यादा तेंदुओं का भी शिकार किया।
25 जुलाई 1875 को नैनीताल में जन्मे जिम कॉर्बेट के पिता क्रिस्टोफर कॉर्बेट नैनीताल के पोस्ट मास्टर थे और मां मेरी जैन एक व्यवसायी थीं। जिम, क्रिस्टोफर और मेरी की आठवीं संतान थे। नैनीताल में जन्म और फिर इसी माहौल में परवरिश होने के कारण जिम को शुरुआत से ही प्रकृति से लगाव था। बड़े होकर जिम कॉर्बेट ने पहले रेलवे और फिर ब्रिटिश आर्मी में काम किया। वे ब्रिटिश आर्मी में कर्नल रैंक के ऑफिसर भी रहे।
जिम ने 40 साल की उम्र यानी साल 1915 में कालाढूंगी के नजदीक छोटी हल्द्वानी नाम के गांव में 40 एकड़ जमीन खरीदी। उस समय जमीन की कीमत तकरीबन 1500 रुपये थी। जिम ने इसी जमीन के एक कोने में साल 1922 में एक बंगला बनाया, जिसमें वह अपनी बड़ी बहन मैगी के साथ जाड़े के दिनों में रहा करते थे। गर्मी के दिनों में जिम अपनी नैनीताल वाली कोठी में रहने चले जाते थे।
जीवन के अंतिम दिनों में जिम कॉर्बेट ने भारत छोड़ दिया। साल 1947 में भारत से कीनिया जाते समय उन्होंने अपनी यह कोठी चिरंजीलाल नाम के शख्स को बेच दिया। इस कोठी को साल 1965 में चिरंजीलाल से फॉरेस्ट डिपार्टमेंट ने खरीद लिया। जिम कॉर्बेट की ये कोठी आज 100 साल की हो गई है। जिम कॉर्बेट की इस कोठी को अब म्यूजियम बना दिया गया है। जिसे कॉर्बेट नेशनल पार्क प्रशासन मैनेज करता है। इस म्यूजियम में जिम कॉर्बेट से जुड़ीं यादगार तस्वीरों के साथ ही उनके खाने के बर्तन, जंगल में काम आने वाले हथियार, आने-जाने वाली डोली, जिम का फर्नीचर जैसी चीजें संजो कर रखी गई हैं।
बहुत काम लोग जानते हैं कि जिम कॉर्बेट छोटी हल्द्वानी की जमीन पर खेती भी किया करते थे। खेती के लिए जिम ने 10-15 किसान परिवारों को भी काम पर रखा था। यहां रहते हुए उन्होंने कई जंगली जानवरों का शिकार भी किया। जिनमें कई आदमखोर बाघ भी शामिल थे। बाद में भारत की आजादी यानी साल 1947 में जिम इन्हीं परिवारों में अपनी जमीन बांटकर वे यहां से कीनिया चले गए। जिम ने अपने जीवन के अंतिम दिनों कीनिया में रहकर कई किताबें लिखीं. इनमें भारत, कुमाऊं और आदमखोर गुलदारों और बाघों की अनगिनत कहानियां हैं।
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