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सियासत चालू आहे कि नाहीं ?क्या भाजपा के भीतर से ही उपज रहा विपक्ष, वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल का विश्लेषण

राकेश अचल, लेखक देश के जाने-माने पत्रकार और चिंतक हैं, कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में इनके आलेख प्रकाशित होते हैं।

अक्सर सोचता हूँ कि सियासत के बिना भी कोई दिन गुजरना चाहिए,लेकिन ऐसा होता नहीं है। सुबह-सवेरे जब नींद खुलती है तो सियासत चालू नजर आती है। मजे की बात ये है कि अब सियासत में सियासत शुरू हो गयी है। पक्ष में से प्रतिपक्ष झाँक रहा है और असल विपक्ष लगातार बिखरता दिखाई दे रहा है। यानि जो कुछ हो रहा है ,वो सियासत के इर्दगिर्द ही है।

भाजपा की नाकामियों से उपजे असंतोष को बिखरा विपक्ष भुना न ले जाये इसलिए समझदारी के साथ भाजपा ने अपने भीतर से ही एक विपक्ष खड़ा कर दिया है। भाजपा के विपक्ष में एक चेहरा रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का है तो दूसरा चेहरा मिस्टर क्लीन नितिन गडकरी का है। राजनाथ पंडित जवाहर लाला नेहरू जी नीयत का समर्थन कर रहे हैं और गडकरी सत्ता को समाज सेवा से विचलित होते देख खुद विचलित दिखाई दे रहे हैं। भाजपा के नक्कारखाने में बजने वाली ये तूतियाँ जनता को बरगलाने के लिए हैं।

संसद में मंहगाई और जीएसटी को लेकर आक्रामक विपक्ष के चार सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित करने वाले लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला भी कठपुतली की तरह सदन चलना चाहते हैं , हो वही रहा है जो भाजपा और उसके सुप्रीमो चाह रहे हैं। राष्ट्रपति चुनाव से फारिग होते ही भाजपा ने झारखण्ड सरकार को चित करने का अभियान तेज कर दिया है ,क्योंकि भाजपा की नजर में सत्ता समाजसेवा नहीं सत्ता के लिए ही है। मजे की बात ये है कि झारखण्ड में झामुमो, भाजपा के विधायकों को तोड़ने का दावा कर रही है जबकि खुद टूटने का खतरा उसे ज्यादा है।

भाजपा एक साथ अनेक मोर्चों पर काम कर रही है। भाजपा ने मध्य्प्रदेश के द्वैदीप्यमान नेता केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की मध्यप्रदेश में सक्रियता को कम करने के लिए उन्हें बंगाल की कमान दे दी है .सिंधिया की मप्र में सक्रियता से भाजपा दरकने लगी थी। स्थानीय निकाय चुनावों में ये परिदृश्य साफ़ नजर आया। सिंधिया के गृह नगर ग्वालियर के साथ ही कांग्रेस केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के गृह जिला मुरैना में भी स्थानीय निकाय चुनावों में हार गयी। अब सिंधिया बंगाल के लेनिनगढ़ में अनुसूचित जातियों के यहां मध्यान्ह भोजन कर भाजपा के लिए जमीन बनाने का काम कर रहे हैं।
बंगाल हारने की टीस भाजपा भूली नहीं है। बंगाल में पहले भाजपा ने मप्र के ही कैलाश विजयवर्गीय को कमान सौंपी थी लेकिन वे मालवा के बाहुबल के इस्तेमाल के बाद भी भाजपा को बंगाल की सत्ता नहीं दिला पाए। भाजपा बंगाल को हासिल करने के लिए एक तरफ ईडी का इस्तेमाल कर रही है तो दूसरी तरफ सिंधिया के चाकलेटी चेहरे का भी इस्तेमाल कर रही है। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने एक मंत्री के घर से करोड़ों रूपये बरामद होने के बाद जहां पूरे मामले से पल्ला झाड़ लिया है ,वहीं सिंधिया के आने के बाद वे अतिरिक्त रूप से सतर्क भी हो गयीं हैं।

देश में सियासत के चालू रहने के कारण और कुछ शुरू ही नहीं हो रहा।हो भी नहीं सकता क्योंकि सत्तारूढ़ दल हर समय चुनाव की तैयारियों में लगा हुआ है। उसे विकास से कुछ लेना देना नहीं है। बुंदेलखंड में जिस एक्सप्रेस वे का उद्घाटन माननीय प्रधानमंत्री ने किया था वो जगह-जगह से धंस गया लेकिन कहीं कोई हलचल नहीं हुई। हो भी कैसे , भाजपा ऐसा होने दे तब न ? नितिन गडकरी शायद इसीलिए दुखी हैं। गडकरी का दुःख उनके सहयोगी राजनाथ सिंह के दुःख से अलग नहीं है। दोनों दुखी हैं क्योंकि उन्हें दुखी दिखने के लिए कहा गया है | दोनों में से किसी में भी इतनी ताकत नहीं है कि वे इन्हीं मुद्दों पर मंत्रिमंडल की बैठक में या संसद में कुछ बोल सकें।

राष्ट्रपति चुनाव में आदिवासी वोट बैंक को तृप्त कर अब उप राष्ट्रपति के चुनाव में सियासत हो रही है। भाजपा जगदीप धनकड़ को उपराष्ट्रपति बनाकर राजस्थान में कमल खिलाना चाहती है। रेगिस्तान में कमल को मुरझाये काफी दिन हो चुके हैं। राजस्थान में जादूगर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के आगे भाजपा का न जादू चल पा रहा है और न ही दाल गल रही है। राष्ट्रपति चुनाव में बिखराव का शिकार विपक्ष भावनात्मक अपील कर रहा है। मार्गरेट अल्वा के नाम की घोषणा कर इस बार दोनों राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद पर महिला को आसीन कर इतिहास रचने की थीम पर प्रचार किया जा रहा है। अल्वा के पक्ष में महिला, अल्पसंख्यक और दक्षिण भारत को प्रतिनिधित्व देने की भावनात्मक अपील करते हुए कांग्रेस और उसके सहयोगी दल इस चुनाव में उन दलों को समर्थन जीतने का प्रयास करेंगे जो राष्ट्रपति के चुनाव में दूर छिटक गए थे।

एक तरफ ईडी से जूझ रहीं श्रीमती सोनिया गांधी विपक्षी एकता के लिए भी सक्रिय हैं। अल्वा की उम्मीदवारी की मजबूती के लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कमान संभाली हुई है। 103 महिला सांसदों से संवाद कायम किया जाएगा। संख्या बल में भले एनडीए आगे हो लेकिन यूपीए की रणनीति गैर एनडीए दलों को साधना है।मार्गरेट अल्वा इस मामले में ग्रेट हैं। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्ढा से भी समर्थन मांगने में नहीं हिचक रहीं हैं। मार्गरेट अल्वा उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी समर्थन मांगेंगी। उनका कहना है कि योगी से उनके पुराने संबंध हैं। जब वह सांसद हुआ करते थे, हम तब से दोस्त हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से भी वोट करने की अपील करने की बात कही।
चौतरफा वोट मांगने के सवाल पर मार्गरेट अल्वा ने कहा कि उनका सभी से वोट मांगने का आधार यह है कि वो एक एक महिला हैं और देश के सामने पहली बार उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवार कोई महिला है, इसलिए सभी को समर्थन करना चाहिए। अल्वा को समर्थन मिले या न मिले किन्तु सियासत तो चालू है ही.इस सियासत के चलते दही,मही ,आता पर जीएसटी के लगने और महंगाई के मुद्दे को पीछे धकेला जा रहा है .न संसद में बहस होती दिखाई दे रही है और न सड़कों पर।

सियासत के इस खेल में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार सक्रिय रहते हैं। उन्होंने राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह में गैर हाजिर रहकर फिर से सुरसुरी छोड़ दी है। नीतीश बाबू सुशासन बाबू हैं,वे क्या चाहते हैं ये भगवान भी नहीं जानता। उनकी चाह में कोई और है और बांह में कोई और है। बहरहाल सियासत चालू आहे। आप भी इसका मजा लीजिये।
@ राकेश अचल

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