
कहते हैं न इतिहास अपने आपको दुहराता है .जी हाँ सही कहते हैं ,क्योंकि हम सब इतिहास को दुहराते हुए देख रहे हैं .आज इतिहास के पन्नों पर भूले-बिसरे लालू प्रसाद यादव की यादें तेजी से उभर रही हैं .लालू जी एक जमाने में बिहार क्या पूरे देश में अपार लोकप्रिय नेता थे .उनका बिहार नए -नए प्रयोंगों की वजह से सुर्ख़ियों में रहता था .अराजक बिहार में भी लालू उसी तरह चुनाव जीत जाते थे जैसे आज यूपी में भाजपा के योगी आदित्य नाथ चुनाव जीत कर आये हैं .
संस्कृत में कहावत है-‘ महाजनो येन गत:,स पंथ :यानि महाजन जिस रास्ते पर जाते हैं लोग भी उसी रास्ते का अनुशरण कर उठते हैं .इसे अलंकृत भाषा में भेड़चाल कहा जाता है . लालू जी ने जो रास्ता अपने बाद के नेताओं को दिखाया था ,उसी रास्ते पर चलने की होड़ मची हुई है .जो लालू को भूल रहा है ,जनता उसे भूल रही है .यानि सियासत में लालू का फार्मूला हिट फार्मूला है .
आपको याद होगा की लालू जी अक्सर भोजपुरीमें कहा करते थे -‘ करिया भैंसिया के ऊजर दही ,ललुआ जवन कहे ऊहे सही ‘.और लालू जी सचमुच जो कहते थे उसे सही मानते हुए सूबे की जनता उन्हें जिताती रहती थी .सूबा नर्क में जा रहा था लेकिन इससे लालू जी की लोकप्रियता पर कोई असर नहीं लड़ रहा था .लालूजी ने राजनीति में जो रास्ता दिखाया आज उस पर चलने की होड़ लगी है .जहाँ-जहाँ भाजपा के मुख्यमंत्री है,वहां-वहां ये प्रतिस्पर्द्धा ज्यादा तेज है /हाल ही में आपने देखा होगा की यूपी में मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ इसी रस्ते पर चलकर दूसरी बार सूबे के मुख्यमंत्री बन गए .उनके पहले कार्यकाल में यूपी में खूब बुलडोजर चला,खूब असली/फजी मुठभेड़ें भी हुईं किन्तु योगी जी की लोकप्रियता बरकरार रही.
योगी से पहले एमपी में भी इस फार्मूले को दोहराया गया .उमा जी के ९ माह के कार्यकाल को लालूवाद का आरंभिक युग कहा जा सकता है .उमा जी के बाद बाबूलाल गौर और फिर लगातार शिवराज सिंह लालू दर्शन के प्रणेता रहे .प्रदेश हर मामले में पीछे खिसकता रहा लेकिन मामा शिवराज सिंह लोकप्रिय बने रहे.उन्हें उनकी लोकप्रियता का ओव्हर डोज ही ले डूबा ,लेकिन वे 18 माह बाद ही इस अलोकप्रियता से बाहर निकल आये और चौथी बार सत्ता में वापस आ गए .
मध्यप्रदेश में इन दिनों लालूवाद लगातार लोकप्रिय हो रहा है.मामा शिवराज सिंह के बुलडोजर चौतरफा दौड़ रहे हैं .मामा योगी की तरह बुलडोजर मामा बनकर लोकप्रिय होना चाहते हैं.लेकिन चाहने से कुछ नहीः होता .होता वो ही है जो मंजूरे खुदा होता है .मुश्किल ये है की मामा शिवराज खुदा को मानते नहीं . वे राम जी के भक्त हैं .वे हनुमान जी के भक्त हैं ,इसलिए वे उन्हीं के गुण- सूत्र के जरिए सियासत चलाने की कोशिश कर रहे हैं .उधर दुर्भाग्य है की उनका पीछा नहीं छोड़ रहा .
मामा शिवराज लालू यादव की तरह लोकप्रिय नहीं हो पा रहे हैं .योगी आदित्यनाथ हो गए.जाहिर है के लालू एक ही हो सकता है और उसकी डुप्लीकेट कॉपी भी एक ही हो सकती है लालू मास्टर कॉपी हैं .जैसे सिनेमा में आपने देखाहोगा की दिलीप कुमार के रहते उनकी डुप्लीकेट कॉपी को मुश्किल से सहा जाता था,उनकी डुप्लीकेट कॉपी राजेंद्र कुमार बन गए थे लेकिन बाद में अनेक आये और चले गए .लालू के रहते योगी जी ने इस दिशा में प्रयोग किया .वे चल निकले,लेकिन उनके बाद शिवराज सिंह को नहीं चलना था सो नहीं चले ,जैसे संजय खान नहीं चले .लालू का दर्शन राजनीति का आधुनिक युग का सर्वश्रेष्ठ दर्शन है .
लोकतंत्र में लालू दर्शन के आलोचक भी कम नहीं हैं ,लेकिन आलोचना से दर्शन और निखरता है.ये हकीकत बहुत कम लोगों को पता है .आलोचना को बर्दाश्त करना लालूवाद की महत्वपूर्ण कड़ी है जो आलोचना से बिदकता है उसे लोग चिढ़ाते हैं आजकल हमारे मामा शिवराज सिंह के साथ यही सब कर रहे हैं .यानि लालूपथ का अनुशरण करना किसी साधना से कम नहीं है..लालू जो कटे रहे ,बिहार की जनता उसे ही सही मानती आयी है .यूपी की जनता ने भी यही सब किया .शिवराज सिंह भी यही कर रहे हैं ,किन्तु लालू प्रसाद की तरह लोकप्रिय नहीं हो पा रहे हैं .
राजनीति में अलोकप्रियता अभिशाप है .इससे कोई नहीं बचा .बच भी नहीं सकता .बचना भी नहीं चाहिए . आप सब राहुल गांधी को जानते हैं .पूरा देश उन्हें जानता है किन्तु वे अलोकप्रिता के शाप से ग्रस्त हैं .शाप मुक्ति की युक्ति उन्हें पता नहीं है .इसलिए लगातार नाकाम होते नजर आ रहे हैं .उनकी नाकामी पर तरस आता है. काश उन्होंने लालूवाद का अनुशरण किया होता .आप माने या न माने लेकिन हकीकत ये है कि हमारे पंत प्रधान ने लालूवाद का अंधानुकरण करके ही अपार लोकप्रियता हासिल की है .
लालू वाद यानि बेशर्मी का वाद .जिसने की शर्म ,उसके फूटे करम .मोदी जी ने कभी भी शर्म नहीं की .वे शर्म से उतनी ही दूर रहते हैं जितना की उन्हें रहना चाहिए .बेशर्मी दरअसल एक ललितकला है. इंदिरा गांधी ने भी बेशर्मी की चादर ओढ़ी लेकिन अलप समय के लिए .हालाँकि इंदिरा जी के समय लालूवाद था नहीं.इंदिरा गांधी का अपना वाद था .आजकल आप वाले अरविंद केजरीवाल भी तीजी से लालूवाद का अनुकरण कर रहे हैं ,उन्हें इसका प्रतिसाद भी मिल रहा है.आज दिल्ली के बाहर पंजाब में भी आप की सरकार है .आने वाले दिनों में किसी और सूबे में भी उनके दल की सरकार हो सकती है.
कांग्रेस को इस समय लालूवाद की सख्त जरूरत है .लालू जी की लालटेन पार्टी अतीत में कांग्रेस की सहयोगी भी रही है .दोनों के बीच आज भी सद्भाव बरकरार है .मुझे कभी कभी बड़ा अफ़सोस रहता है की मामा शिवराज को लालू वाद क्यों नहीं फला? जबकि मामा है तो मध्य प्रदेश में लालू से ज्यादा काम कर रहे हैं ,लेकिन लोकप्रियता नहीं मिली .लालू दर्शन की राजनीति के शिखर पुरुष लालू यादव कहाँ तक फॉलो किये जाएंगे ,कहना कठिन है .आपको याद होगा की एक बार लालू जी ने उपमा अलंकार का इस्तेमाल करते हुए कहा था की वे बिहार की सड़कें हेमा मालिनी के गालों की तरह बनाना चाहते हैं .है किसी में इतनी हिम्मत जो अपने मुहावरे खुद गढ़ ले
@ राकेश अचल .
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