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काशीपुर फ्लैश बैक :सत्येंद्र चंद्र गुड़िया के जमाने में किसी का एडमिशन न हो ऐसा संभव नहीं उन दिनों, शहर में तमाम शिक्षण संस्थान उनकी देन

शहर काशीपुर में शिक्षा संस्थान खोलने में पूर्व सासंद सत्येंद्र चंद्र गुड़िया का योगदान आज भी लोगों को स्मरण है। यहाँ के अनेक शिक्षा संस्थान स्व गुड़िया की देन है। शब्द दूत न्यूज पोर्टल पर स्व गुड़िया के व्यक्तित्व व कृतित्व पर एक श्रृखंला प्रकाशित कर रहा है। पेश है उसी श्रृंखला का अगला लेख

@शब्द दूत ब्यूरो (04 अप्रैल 2022)

काशीपुर । सर्व विदित है कि पढे लिखे बच्चों से ही अच्छा समाज और अच्छा राष्ट्र बनता है। दिवंगत पूर्व सांसद सत्येंद्र चंद्र गुड़िया ने जीते जी इस बात को न सिर्फ बखूबी समझा बल्कि उन्होंने मां सरस्वती के मंदिरों की उन्नति में कभी कोई कमी नहीं छोडी ।

शिक्षा के प्रति उनमें अथाह प्यार था। यही कारण है कि उनके जमाने में कोई बच्चा ऐसा नहीं रहा होगा जो शिक्षा से वंचित रह गया हो । विद्यालयों में प्रवेश ना मिले ऐसा श्री गुड़िया के जमाने में नहीं हुआ। वह दुखी अभिभावकों के दर्द के साथ साथ विद्यालयों में एडमिशन क्यों नहीं हो रहे इस बात को भी गहराई से समझते थे ,और जिन विद्यालयों में कमरे कम होते थे या फिर अध्यापक नहीं होते थे वहां वें उनकी भी व्यवस्था कराते थे । किसी स्कूल में किसी विषय की मान्यता होनी हो तो उस काम को भी वे पलक झपकते ही करा देते थे। आज स्थिति यह है कि स्कूलों में कहीं अध्यापक नहीं तो कहीं कमरे नहीं और जहां अध्यापक और कमरे हैं तो वहां विद्यालय की हालत इतनी जर्जर है कि अभिभावक अपने बच्चों को ही स्कूल भेजते हुए डरते हैं।

जहां तक सत्ता पक्ष के मौजूदा नेताओं तक का सवाल है तो वह पैर तो खूब पीटते हैं मगर श्री गुड़िया जैसा करिश्मा नहीं कर पाते ।यही कारण है कि आज काशीपुर क्षेत्र के सरकारी स्कूलों की दशा और दिशा अत्यंत सोचनीय स्थिति में है। कहीं स्कूलों में साप्ताहिक बाजार लगता है तो कहीं बरसातों में उनमें इतना पानी भर जाता है कि वे देखने मात्र से स्कूल नहीं बल्कि बूचड़खाना या फिर तालाब अधिक नजर आते हैं।

एक बार एक विकलांग लड़की को कम अंक होने के कारण राधेहरि डिग्री कॉलेज में प्रवेश नहीं मिला। लड़की ने गुड़िया जी के यहां गुहार लगाई । तब श्री गुड़िया ने तत्कालीन प्राचार्य को फोन कर उस लड़की का एडमिशन करने को कहा ,मगर प्राचार्य ने एडमिशन नहीं किया । श्री गुड़िया को यह बे-अदबी भला कहां बर्दाश्त थी। उन्होने तुरंत कुलपति को फोन कर प्राचार्य का तबादला करा दिया और नए प्राचार्य को इस शर्त पर चार्ज लेना पड़ा कि वे उस लड़की को विद्यालय में एडमिशन देंगे । ऐसा ही मामला एक सरदार जी का आया ।उनकी बेटी का जीजीआईसी काशीपुर में एडमिशन होना था ,मगर नहीं हुआ । सरदार जी अपनी बिरादरी के विधायक सहित क्षेत्र के लगभग सभी नेताओं के यहां चक्कर काट काटकर परेशान हो गए ,मगर कोई भी नेता उनकी बेटी का एडमिशन कराने में सफल नहीं हुआ । हार कर सरदार जी को गुड़िया जी के यहां जाना पड़ा। शुरू में तो गुड़िया जी ने भी इंकार कर दिया और कहा कि क्या आप अपने विधायक के पास एडमिशन कराने के लिए गए थे? उन्होंने एडमिशन क्यों नहीं कराया ? उस समय वहां शहर के एक वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्सक डा० रजनीश शर्मा बैठे हुए थे जिन्होंने उन सरदार जी को विधायक के यहां गुहार लगाते हुए देखा था। उन्हें सरदारजी पर दया आ गई और उन्होंने जब श्री गुड़िया से यह बताया कि बेचारे सरदार जी विधायक सहित लगभग सभी नेताओं के यहां चक्कर लगा चुके हैं मगर उनकी बेटी का एडमिशन नहीं हो रहा, जबकि वह एक होनहार बच्ची है। इतना सुनते ही श्री गुड़िया ने फोन किया और सरदार जी की बेटी का एडमिशन हो गया। नगर के एक पत्रकार बंधु को अपने बेटे का कक्षा ग्यारह में विज्ञान वर्ग में एडमिशन कराना था जो नहीं हो रहा था । विज्ञान वर्ग के हिसाब से बच्चे के नंबर कम थे और बच्चा साहित्यिक वर्ग के बजाय विज्ञान वर्ग में ही एडमिशन चाहता था। विद्यालय के प्रबंधक तक सिफारिस की गयी मगर उन्होंने साफ मना कर दिया तो फिर प्रधानाचार्य की तो हिम्मत ही कहां थी जो एडमिशन कर सकें। तब पत्रकार बंधु बहुत उदास हुए और मामला फिर श्री गुड़िया की बैठक तक जा पहुंचा। उम्मीद थी कि श्री गुड़िया भी इंकार कर देंगे क्योंकि बहुत कुछ उनके मूड पर भी निर्भर करता था लेकिन पत्रकार बंधु की कल्पना के विपरीत श्री गुड़िया ने पूरी बात सुनी और चूंकि मामला बच्चे की शिक्षा से जुड़ा था। अतः श्री गुड़िया ने तत्काल पत्रकार बंधु से कहा कि विद्यालय पहुंचिए बच्चे का एडमिशन हो जाएगा ।

श्री गुड़िया इतनी आसानी से एडमिशन कराने को राजी हो जाएंगे यह देख पत्रकार बंधु दंग रह गए, मगर उन्हें पता था कि श्री गुड़िया की बात में बहुत दम है लिहाजा पत्रकार बंधु को घोर आश्चर्य के साथ साथ अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था ,मगर गुड़िया जी ने जो कह दिया वह अटल सत्य था।

ऐसी एक नहीं बल्कि अनेक घटनाएं है जब श्री गुड़िया ने अनेक लोगों की सिफारिशें कर उनके बच्चों का न सिर्फ एडमिशन कराया बल्कि गरीब परिवारों के बच्चों की फीस माफ कराने के साथ साथ किताबों की निशुल्क व्यवस्था भी कराई ताकि किसी गरीब का बच्चा बगैर शिक्षा के न रहे। आज भी जब अभिभावक अपने बच्चों के एडमिशन को लेकर निराशा के भंवर में फंसते हैं तो उन्हें मौजूदा नेताओं से मिली निराशा के कारण श्री गुड़िया की बहुत याद सताती है। काश श्री गुड़िया आज भी हमारे बीच होते तो काशीपुर क्षेत्र में मां सरस्वती के मंदिरों की स्थिति ही कुछ और होती।

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