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जानिए एमएलए और एमएलसी में क्या अंतर है, कैसे होता है इनका चुनाव?

विधानसभा और विधान परिषद को संविधान में अलग-अलग कार्य दिए गए हैं। शक्ति और अधिकार के मामले में विधान परिषद और विधानसभा में काफी अंतर है। दोनों की चुनाव प्रक्रिया भी काफी अलग है।

@नई दिल्ली शब्द दूत ब्यूरो (24 मार्च, 2022)

क्या आप जानते हैं कि विधानसभा और विधान परिषद चुनावों में क्या अंतर होता है? इन दोनों सदनों के सदस्यों को क्या कहकर बुलाया जाता है? एमएलए और एमएलसी में क्या फर्क होता है? दोनों का कार्यकाल कितना होता है, दोनों पर क्या-क्या जिम्मेदारियां होती है? ऐसे कई प्रश्न हमारे जेहन में तब आते हैं, जब हम विधान परिषद के चुनावों के बारे में पढ़ते हैं।

एमएलए का फुलफॉर्म मेंबर ऑफ लेजिस्लेटिव असेंबली होता है। वहीं एमएलसी का फुल फॉर्म मेंबर ऑफ लेजिस्लेटिव काउंसिल होता है। एमएलए किसी राज्य की विधान सभा का सदस्य होता है। वहीं एमएलसी किसी राज्य के विधान परिषद् का सदस्य होता है।

एमएलए चुने जाने के लिए न्यूनत्तम उम्र 25 वर्ष होती है जबकि एमएलसी चुने जाने की न्यूनत्तम उम्र 30 साल होती है। एमएलए का निर्वाचन सीधे तौर पर जनता करती है, जबकि एमएलसी का चुनाव अप्रत्यक्ष होता है। एमएलए का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है जबकि एमएलसी की कार्यावधि छह साल की होती है।

देश के सभी राज्यों में जहां विधानसभा का अस्तित्व है। वहीं दूसरी ओर विधान परिषद देश के छह राज्यों में ही है। जिनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक शामिल है।

विधान परिषद के सदस्य का कार्यकाल छह साल के लिए होता है। चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम 30 साल उम्र होनी चाहिए। एक तिहाई सदस्यों को विधायक चुनते हैं। इसके अलावा एक तिहाई सदस्यों को नगर निगम, नगरपालिका, जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत के सदस्य चुनते हैं। वहीं, 1/12 सदस्यों को शिक्षक और 1/12 सदस्यों को रजिस्टर्ड ग्रैजुएट चुनते हैं।

यूपी में विधान परिषद के 100 में से 38 सदस्यों को विधायक चुनते हैं। वहीं 36 सदस्यों को स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र के तहत जिला पंचायत सदस्य, क्षेत्र पंचायत सदस्य (बीडीसी) और नगर निगम या नगरपालिका के निर्वाचित प्रतिनिधि चुनते हैं। 10 मनोनीत सदस्यों को राज्यपाल नॉमिनेट करते हैं। इसके अलावा 8-8 सीटें शिक्षक निर्वाचन और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के तहत आती हैं।

विधान परिषद में एक निश्चित संख्या तक सदस्य होते हैं। विधानसभा के एक तिहाई से ज्यादा सदस्य विधान परिषद में नहीं होने चाहिए। उदाहरण के तौर पर समझिए यूपी में 403 विधानसभा सदस्य हैं तो यूपी विधान परिषद में 134 से ज्यादा सदस्य नहीं हो सकते हैं। इसके अलावा विधान परिषद में कम से कम 40 सदस्य होना जरूरी है। हालांकि एमएलसी का दर्जा विधायक के ही बराबर होता है।

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