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इतिहास का सच और ‘गद्दार’

 समीक्षक – अशोक कुमार चौहान,                                                      सहायक प्रोफेसर 

सुनी-सुनाई बातें और किवदंतियाँ लोगों का मनोरंजन भले ही करती हों लेकिन इतिहास के रूप में उनसे कोई सही समझ विकसित नहीं हो पाती। मनघड़ंत बातों और झूठ को इतिहास बताकर लोगों के अंतर्मन में गहरे उतार दिया जाए तो फिर तमाम कोशिशों के बाद भी उस भ्रम से छुटकारा पाना मुश्किल हो जाता है। विडंबना ही है कि इस देश की जनता इतिहास और मिथकों, जनश्रुतियों और कहानियों में अंतर करना भी नहीं जान सकी। अब तो देश की आबोहवा ही ऐसी है कि अतीत अपनी ही सत्य घटनाओं के बारे में मुँह खोलते हुए डरता-सा दिखाई देने लगा है। जब मीडिया औऱ सत्ता के झूठ व नफरत के पाटों के बीच सत्य को पीसा जा रहा हो तब जरूरी हो जाता है कि जनता सच की तलबगार बने। सच की खोज करने की आदत डालें। इतिहास के तथ्यों एवं सत्यों से परिचित होना भी नागरिक बोध का ही हिस्सा होता है।

इतिहास और वर्तमान की जटिलताओं की इन सब बातों की रोशनी में जाने-माने पत्रकार एवं कवि-गजलकार राकेश अचल का हालिया प्रकाशित उपन्यास ‘गद्दार’ एक उजास की तरह है जो ऐतिहासिकता की खूबियों के साथ मौजूदा समय के राजनीतिक पतन की पड़ताल करता सा जान पड़ता है। किसी भी ऐतिहासिक विषय पर आधारित रचना की यही उत्कृष्टता व प्रासंगिकता भी मानी जाती है कि अपने समकाल के अंधेरों को भी चिह्नित कर देती हो।

कई बार हमको इतिहास पुनरावृत्ति करता सा लगता है बस उसका रूप बदल जाता है। सन सत्तावन के कंपनी राज में ब्रिटिश अफसरों की मदद करना और जनता को धोखा देना ‘गद्दारी’ कहलाता था लेकिन संविधान और लोकतंत्र के छद्म रूपकों के बीच आज जनता का चुना हुआ राजनेता अपनी फसल के सही दाम माँगने वाली खेतिहर रियाया को देशद्रोही बताता है और कंपनी मालिकों के हित में कानून पास कराता है तो देशभक्त कहलाता है।

‘गद्दार’ उपन्यास सन सत्तावन के विद्रोह के समय में सिंधिया राजवंश के उस शासक की जिंदगी का सच सामने लाने की एक सफल कोशिश है जिसके ऊपर ग्वालियर-चंबल की सरजमीं पर ही नहीं, देश भर में ‘गद्दार’ और ‘अंग्रेजों का मित्र होने का कलंक’ लगा हुआ है। इस उपन्यास को पढ़ने के बाद पाठकों को ही तय करना है कि क्या सिंधिया राजा वाकई गद्दार था?

उंपन्यास का शीर्षक ‘गद्दार’ और उसका आवरण चित्र बहुत कुछ संकेत करता-सा लगता है लेकिन ये आरंभिक दृश्यानुभूति व उसका प्रभाव ही समझ सकते हैं बस, क्योंकि बाद में तो उपन्यास की कथा शुरू से लेकर अंत तक हमारी बहुत-सी धारणाओं को बदलती चलती है और इसकी बुनावट हमें बाहुपाश में बांध लेती है।

यह उपन्यास पाठकों को इतिहास की उन विशाल वीथियों में ले जाता है जहाँ हम एक साधारण परिवार के किशोरवय बालक को राजवंश के उत्तराधिकारी के रूप में जिम्मेदारी निभाते हुए देखते हैं। महल के दीवान की ब्रिटिश कंपनी और उसके अफसरों के प्रति वफादारी, देशी रियासतों पर ब्रिटिश कंपनी के कसते जाते शिकंजे, रानी लक्ष्मीबाई और झाँसी के लोगों पर कैप्टन ह्युरोज के अत्याचार, पड़ोसी रियासतों की दुर्दशा पर राजा सिंधिया की चिंता और कुछ न कर पाने की मजबूरी व बेचैनी को भी पाठक महसूस कर सकते हैं। इस उपन्यास की खास बात है यह उस दौर के ग्वालियर के सामाजिक, भौगोलिक परिवेश और परिदृश्य को चित्र की तरह उपस्थित कर देता है।

वक़्त गुजरता जाता है लेकिन इतिहास आने वाली सदियों पर अपने निशान बना देता है। नया व स्मार्ट नाम की माला डालकर इतराता आज का ग्वालियर और उसके क्षेत्र-मुहल्ले इस ऐतिहासिक उपन्यास के कितने ही पात्रों की संस्मृतियों को आवाज देकर बुलाते से महसूस किए जा सकते हैं। नगर का सौंदर्यबोध भी यहां हम स्पंदित होता देखते है। घटनाएं कोलाज सा बनकर आंखों में उतरने लगती हैं।

इसमें दोराय नहीं इतिहास का स्वरूप एकरेखीय, सपाट या रंगमंचीय संवादों की तरह पूर्वनियोजित नहीं होता। इतिहास टीवी धारावाहिकों और फिल्मों की काल्पनिक पटकथा नहीं होता। अपने समय की बहुत-सी घटनाएँ, परिस्थितियाँ और शासकों की व्यक्तिगत एवं पारिवारिक कमजोरियाँ और उनके मजबूरियों में लिए गए फैसलों से भारत एवं दुनिया के बड़े-बड़े देशों के इतिहास की दिशा बदलती रही है।

लेखक का यह पहला ही ऐतिहासिक उपन्यास है और इस उपन्यास को पढ़ना शुरू करते ही हम उसके कथा प्रवाह में निर्बाध रूप से बहते चले जाते हैं। भाषा की सहजता और संवाद प्रभावित करते हैं। पाठक जाने पाते हैं कि जब ब्रिटिश कंपनी रियासतों पर छल-छद्म से भरी अपनी कूटनीति से कब्जा करती चली आ रही थी तब रानी झाँसी के विद्रोह से ग्वालियर का महल भी उदासीन नहीं था। गद्दार बता दिए गए सिंधिया शासक उन हालात से किस तरह जूझ रहे थे, ये सभी घटनाएँ जीवंत होकर आँखों के सामने से गुजरती जाती हैं। तेजी से बदलते दृश्य और उनमें एकांकी जैसी संक्षिप्तता उपन्यास को बोझिल व उबाऊ नहीं होने देती, रोचकता बनी रहती है।

ऐतिहासिक उपन्यास ‘गद्दार’ इसलिए भी अहम बन गया है क्योंकि इसमें रचनाकार राकेश अचल की जनसरोकारी पत्रकारिता के जमीनी अनुभव, ग्वालियर अंचल की जीवन-धारा और संस्कृति के प्रति उनका गहरा संवेदनासिक्त लगाव, सत्ता एवं धर्म के प्रति निरपेक्ष चिंतन, सिंधिया शासकों के इतिहास पर गंभीर शोध अध्ययन, इतिहास की वस्तुनिष्ठता के प्रति उनकी उत्तरदायी पक्षधरता और लेखकीय श्रम साफ नजर आता है।

हमारे दौर की सबसे बड़ी समस्या है कि लोग इतिहास के तथ्यों एवं सच को लेकर उदासीन और अनजान बने रहने में ही आनंद उठाने लगते हैं और यह कई बार जानबूझकर भी होता है। मौजूदा वक्त में नामसझी एवं तर्कहीनता का बोलबाला है। इतिहास को बिना पढ़े ही सब कुछ जान चुके होने का अहंकार पालना इस देश के लोगों का विशेष गुण है। सिंधिया की अंग्रेजों से मित्रता हो या रानी लक्ष्मीबाई का साथ देने की बजाय ग्वालियर छोड़ देने की बात सबके पीछे बहुत सारी बातें व कारक जिम्मेदार थे। इतिहास के ऐसे कितने ही प्रसंग जो पूर्वाग्रहों से जकड़े हुए हैं, गद्दार के लेखक ने बड़ी खूबी से उनको निर्मूल किया है। राकेश अचल जैसे चिंतनधर्मी लेखक जब किसी लांछित उपेक्षित ऐतिहासिक चरित्र व उसके कालखंड को जब अपनी कथा रचना का विषय बनाते हैं तो ये उनकी अनुसंधानात्मक अभिरूचि और नेपथ्य में धकेल दिए गए सच को सामने लाने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का प्रमाण ही है।

सन सत्तावन का विद्रोह भारत के इतिहास का महत्वपूर्ण मोड रहा है। ‘गद्दार’ उपन्यास के माध्यम से इतिहास के उस दौर को फिर से पढ़ने- समझने-जानने और तथ्यों का विश्लेषण करने का वातावरण तैयार किया है। इतिहास के झरोसे से वर्तमान के वास्तविक गद्दार की पहचान पुख्ता करना भी आसान काम नहीं था और वास्तव में रचनाकार को अपने उद्देश्य में कामयाबी मिली है।

‘गद्दार’ उपन्यास
– लेखक राकेश अचल
सन्मति पब्लिशर्स, हापुड़
मूल्य : 160 रूपए

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