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उत्तराखंड: बंशीधर भगत दिल्ली दरबार तलब, मुख्यमंत्री और मंत्रियों पर सस्पेंस बरकरार

@शब्द दूत ब्यूरो (17 मार्च, 2022)

उत्तराखंड से ताजा खबर है कि भाजपा के वरिष्ठ विधायक बंशीधर भगत को दिल्ली दरबार ने तलब किया है। फिलहाल, राज्य में मुख्यमंत्री और मंत्री पद की दौड़ चल रही है। ऐसे में भगत के दिल्ली जाने से अटकलों का दौर शुरू हो गया है।

चुनाव जीतने के बाद मंत्री पद के लिए भाजपा के विधायक बेशक दिल्ली दौड़ लगा रहे हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि उनका कद चाहे कितना भी बढ़ गया हो, पार्टी के समीकरणों में फिट होना भी जरूरी है। ऐसे कई उदाहरण हैं कि सोशल इंजीनियरिंग और क्षेत्रीय-जातीय समीकरणों की कसौटी परखने के बाद पहली बार में कुछ विधायकों की मंत्री बनने की चाहत पूरी हो गई।

मंत्रिमंडल का गठन करते समय जातीय समीकरण की कसौटी सबसे अहम है। यह टिकट वितरण तक सीमित नहीं। सरकार गठन पर मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने वाले चेहरों को जातीय समीकरणों की कसौटी पर परखा जाता है। मिसाल के तौर पर 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद बनी भाजपा सरकार में पांच ब्राह्मण, पांच ठाकुर और दो अनुसूचित जाति वर्ग से जुड़े विधायकों को स्थान दिया गया।

मंत्रिमंडल के गठन के लिए दूसरी अहम कसौटी क्षेत्रीय संतुलन साधने की है। सरकारों की यह कोशिश होती है कि राज्य के तकरीबन सभी क्षेत्रों को कैबिनेट में प्रतिनिधित्व मिल जाएं। जिन जिलों में पार्टी को अधिक सीटें मिलती है, स्वाभाविक रूप से उनके खाते में मंत्री पद और अहम मंत्रालय जाने की संभावनाएं भी रहती हैं। साल 2017 में भाजपा को देहरादून जिले से 10 में से नौ सीटें मिलीं थीं।

सरकार में इस जिले को चार साल मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली। बाद में मुख्यमंत्री का पद ऊधमसिंह नगर जिले के खाते में गया तो इस जिले से एक कैबिनेट मंत्री बनाया गया। गढ़वाल मंडल से भाजपा ने छह कैबिनेट मंत्री बनाए थे। जिसमें रुद्रप्रयाग, चमोली और उत्तरकाशी को छोड़कर बाकी सभी जिलों को प्रतिनिधित्व मिला था।

इसी तरह चार साल तक कुमाऊं मंडल बंशीधर भगत, अरविंद पांडेय, यशपाल आर्य, रेखा आर्य कैबिनेट में रहे। बाद में धामी भी कुमाऊं से सीएम बन गए। सबसे बड़े जिले ऊधमसिंह नगर से मुख्यमंत्री के साथ दो कैबिनेट मंत्री भी मंत्रिमंडल में रहे।

अनुभव, वरिष्ठता और निष्ठा भी कैबिनेट में जगह बनाने का एक प्रमुख आधार माना जाता है। यह आम धारणा है कि वरिष्ठ विधायक को पार्टी कैबिनेट में जगह देती है, लेकिन क्षेत्रीय, जातीय या सोशल इंजीनियर का फैक्टर आड़े आने पर वरिष्ठ विधायक की राह मुश्किल भी हो जाती है। वरिष्ठ विधायक हरबंस कपूर इसके उदाहरण रहे हैं।

कैबिनेट में महिलाओं को भी प्रतिनिधित्व देने की परंपरा रही है। पिछली चार सरकारों में कम से कम एक महिला विधायक मंत्री रहीं। पूर्व कांग्रेस सरकार में डॉ. इंदिरा हृदयेश और अमृता रावत को भी मंत्री बनाया जा चुका है।

भाजपा में भी कई दिग्गज विधायक कतार में हैं। इनमें से कुछ उत्तराखंड गठन के बाद से जीत का पंच तो कुछ जीत का चौका लगा चुके हैं। इनमें बिशन सिंह चुफाल, बंशीधर भगत, प्रेमचंद अग्रवाल, मदन कौशिक, गणेश जोशी, चंदन राम दास, सहदेव पुंडीर के नाम प्रमुख हैं। जिन्होंने दो व तीन बार चुनाव जीता है, पार्टी के ऐसे विधायकों की भी लंबी सूची है।

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