@शब्द दूत ब्यूरो (14 मार्च, 2022)
पूर्व सीएम हरीश रावत की तरह विधानसभा चुनाव के नतीजों ने पूर्व काबीना मंत्री हरक सिंह रावत को उनके राजनीतिक करियर के सबसे जटिल मोड़ पर ला खड़ा किया है। हरक के राजनीति करियर में यह पहला मौका है जब हरक खुद तो सत्ता की मुख्यधारा से कट ही गए हैं, उनकी उत्तराधिकारी मानी जा रहीं पुत्रवधु अनुकृति गुसाईं भी लैंसडाउन विधानसभा सीट से चुनाव हार गईं।
हरक सिंह के बारे में माना जाता रहा है कि वे गढ़वाल की किसी भी सीट से लड़कर जीत सकते हैं। यही नहीं, उनके राजनीतिक कौशल और प्रबंधन की भी बातें कही जा रही थी। लैंसडाउन सीट के नतीजे ने हरक से जुड़ी इन दोनों उपमाओं को भी बेमानी कर दिया। कांग्रेस में शामिल होने के बाद हरक सिंह ने दावा किया था कि प्रदेश की 35 सीटों पर उनके एक हजार से 25 हजार तक समर्थक हैं।
लेकिन लैंसडाउन में तो हरक का जादू नहीं ही चला, आसपास की हरक के प्रभाव की माने जाने वाली चौबट़्टाखाल, पौड़ी, श्रीनगर, कोटद्वार, रुद्रप्रयाग सीटों में भी उनका कोई असर नहीं दिखा। गौरतलब है कि वर्ष 1990 से राजनीति में सक्रिय हरक किसी ने किसी रूप में हमेशा सत्ता का हिस्सा रहे हैं।
हरक सिंह के सामने संकट यह है कि जिस भाजपा को ऐन चुनाव के वक्त छोड़ आए थे, वो फिर से पूर्ण बहुमत के साथ के साथ दोबारा सत्तासीन होने जा रही है। खुद तो हरक चुनाव लड़े नहीं और उनकी बहू की हार से उनके राजनीतिक असर पर सवाल और खड़े कर दिए हैं। भाजपा को छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए हरक ने अनुकृति को राजनीति में स्थापित करने के लिए खुद की महत्वाकांक्षाओं को कुर्बान कर दिया था।
वहीं बाजपुर सीट पर कम अंतर से जीतने वाले यशपाल आर्य के लिए भी कांग्रेस में डगर आसान नहीं है। वो भी तब जब उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी संजीव आर्य नैनीताल सुरक्षित सीट पर चुनाव हार गए हैं। हरीश रावत के दलित मुख्यमंत्री वाले बयान के बाद यशपाल आर्य ने कांग्रेस में वापिसी की थी। लेकिन बेटे संजीव आर्य के चुनाव हारने के बाद अब उनके सामने भी राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है।
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