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राजपथ से लोकपथ पर लथपथ -लथपथ? झाड़ू के बहाने सियासी प्रहसन पर वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल की बेबाक

राकेश अचल, लेखक देश के जाने-माने पत्रकार और चिंतक हैं, कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में इनके आलेख प्रकाशित होते हैं।

लोकतंत्र में भले ही लाख बीमारियां हों लेकिन जब-तब यही लोकतंत्र मनमोहक दृश्य भी उपलब्ध करता रहता है. ग्वालियर में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को सड़कों पर झाड़ू लगते देखना एक ऐसा ही दृश्य है. सिंधिया जनादेश द्वारा ठुकराए गए जन प्रतिनिधि हैं और आज भी उनके नाम के साथ ‘ महाराज ‘ शब्द बाबस्ता है .वे भी इससे अलग नहीं होना चाहते .
सिंधिया परिवार ग्वालियर की पूर्व रियासत का सदियों तक नेतृत्व कर चुका है और आजादी के बाद रियासत का भारतीय गणराज्य में विलय होने के बाद भी ये परिवार राजनीति में लगातार सक्रिय है .अपवाद स्वरूप गुना की जनता ने पिछले आम चुनाव में भाजपाई रणनीति के तहत ज्योतिरादित्य सिंधिया को पराजय का हार पहना दिया था .हारे हुए सिंधिया को बहुत जल्द समझ में आ गया कि भविष्य के लिए पराजय का हार पहनाने वाली भाजपा में ही उनका भविष्य सुरक्षित है इसलिए वे मात्र 18 माह की कांग्रेस सरकार को पटखनी देकर भाजपा में शामिल हो गए थे .

ग्वालियर की सड़कों पर ज्योतिरादित्य सिंधिया को झाड़ू लगते देखकर उम्मीद जाएगी है कि अब ग्वालियर इंदौर के मुकाबिल खड़ा होने की कोशिश कर सकता है .दरअसल ग्वालियर सामंतवाद के बिना चलने की आदत भूल चुका है. जब सिंधिया राजनीति में कुछ समय के लिए हासिये पर गए तो ग्वालियर ने नव सामंतवाद के प्रतीक केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को अपना नेता मान लिया .लेकिन असल सामंतवाद और नव सामंतवाद में फर्क होता है .तोमर अपने प्रभा मंडल से ग्वालियर के लिए बहुत कुछ लेकर आये किन्तु जनता को किसी भी रूप में आंदोलित नहीं कर पाए ,फलत: ग्वालियर की दशा सुधर नहीं सकी .

स्वच्छता के मामले में ही नहीं दूसरे अनेक मामलों में ग्वालियर न भोपाल का मुकाबला कर पा रहा है और न इंदौर का .जबकि अतीत में ग्वालियर मध्यप्रदेश बनने से पहले के राज्य की राजधानी रह चुका है और सिंधिया के पूर्वज इस प्रान्त के राज्य प्रमुख .बहरहाल ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भाजपा में शामिल होने के बाद अपने आपको बदलने की हैरान कर देने वाली कोशिश की है .वे कार्यकर्ता आधारित भाजपा में संध दीक्षित न होते हुए भी समर्पित कार्यकर्ता की हैसियत से काम कर रहे हैं ,ये बात और है कि भाजपा कार्यकर्ता भी उन्हें ‘महाराज ‘ बनाये हुए हैं .

पिछले दो साल में सिंधिया ने अपने आपको जितना कार्यकर्ता बनाने की कोशिश की है वे उतने ज्यादा महाराज बना दिए गए हैं.कांग्रेस में तो उनके लिए पालक-पांवड़े बिछाने और जय-जयकार करने वालों की भीड़ थी ही ,लेकिन अब भाजपा में भी उनका अपना छत्रप पूरी उग्रता के साथ खड़ा हो गया है .भाजपा के संघ दक्ष कार्यकर्ता भी अब महल में हाथ जोड़कर खड़े नजर आने लगे हैं. मुख्यमंत्री से लेकर जिलाध्यक्ष तक सिंधिया के बिना ग्वालियर में एक पत्ता भी नहीं हिला रहे हैं ,और ये ग्वालियर के मुस्तकबिल के लिए शुभ संकेत है .
ग्वालियर का दुर्भाग्य रहा है कि जिस सामंतवाद की वजह से उसका विकास रुका था वो ही सामंतवाद ग्वालियर के विकास की धुरी भी बन जाता है. 1984 से पहले ग्वालियर देश की राजनीति की मुख्यधारा से कटा था किन्तु माधवराव सिंधिया के ग्वालियर से चुनाव जीतने के बाद ग्वालियर विकास की मुख्यधारा में जुड़ गया था .माधवराव सिंधिया जब तक ग्वालियर से चुनाव लड़ते और जीतते रहे ग्वालियर का नाम सुर्ख़ियों में बना रहा. 2001 के बाद ग्वालियर का पराभव फिर शुरू हुआ. ग्वालियर से भले ही भाजपा और महल के लोग चुनाव जीतते आ रहे हैं किन्तु ग्वालियर का वो जलवा नहीं है जो पहले था .

विकास की मुख्यधारा में जुड़े रहने के लिए धारदार नेतृत्व की जरूरत है. ग्वालियर के सांसद श्री विवेक नारायण शेजवलकर सिंधिया के मुकाबिले में ज्यादा प्रभावी सांसद नहीं हैं .ग्वालियर से केंद्रीय मंत्रिमंडल में बैठे श्री नरेंद्र सिंध तोमर भले ही मोदी सरकार के एक भरोसेमंद मंत्री हैं लेकिन उनका प्रभामंडल सिंधिया जैसा नहीं है ,और सिंधिया के भाजपा में आकर उनका आभा मंडल अपने आप धूमिल पड़ गया है .सिंधिया ने स्थानीय सांसद के साथ ही केंद्रीय मंत्री तोमर की आभा को भी लील लिया है .अब ग्वालियर में वे ही वे हैं .ग्वालियर में अपने हाथों में झाड़ू थामकर उन्होंने रही सही कसर भी पूरी कर दी है .ग्वालियर की जनता के लिए ये अद्भुद और आल्हादकारी दृश्य है कि सिंधिया राजघराने के कोई व्यक्ति आम आदमी के साथ ग्वालियर के लिए मैदान में खड़ा दिखाई दे रहा है .

भाजपा कार्यकर्ता और स्थानीय जनता सिंधिया परिवार पर 164 साल पहले लगाए गए कथित गद्दारी के कलंक को भूल चके हैं .पिछले आम चुनाव में सिंधिया पर गद्दारी का आरोप लगाने वाले भाजपाइयों के लिए यहां तक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के लिए महाराज एक स्तुत्य नेता हैं ,क्योंकि सियासत अब ‘शिवराज बनाम महाराज’ नहीं है. अब दोनों मिलकर राज कर रहे हैं .कांग्रेस भी अब सिंधिया की खिलाफत करते-करते थक सी गयी है. ग्वालियर में सिंधिया का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस के पास सिंधिया के कद का कोई नेता है ही नहीं .अकेले दिग्विजय सिंह या खुद कमलनाथ बार-बार तो ग्वालियर आने से रहे .

बहरहाल अब आप राजपथ से लो पथ पर ए सिंधिया खंडन के चश्मों-चिराग ज्योतिरादित्य सिंधिया को स्पोर्ट शूज पहनकर सड़कों पर झाड़ू लगते हुए देखने का मजा ले सकते हैं .पंजाब जीतकर आई ‘ आप ‘भी अपने चुनाव चिन्ह को सिंधिया के हाथ में देखकर खुश हो सकती है ,.भाजपा को भी अब सिंधिया पर आँखें बंद कर भरोसा करना पडेगा क्योंकि सिंधिया ख़ास से जितना आम हो सकते थे उन्होंने होकर दिखा दिया है .हालाँकि सड़कों पर झाड़ू लगना सियासी प्रहसन होता है लेकिन ग्वालियर को इस प्रहसन का कुछ न कुछ लाभ अवश्य मिल सकता है ऐसा मेरा अपना अनुमान है .सियासत में अपनी जगह बनाये रखने के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ सकता है ,सिंधिया इसकी मिसाल हैं और भविष्य में नजीर भी बन जायेंगे .आगे-आगे देखिये होता है क्या ?
@ राकेश अचल

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