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“यकीनन इस जीत के कई मायने हैं, वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल की चुनावी नतीजों पर बेबाक टिप्पणी

राकेश अचल, लेखक देश के जाने-माने पत्रकार और चिंतक हैं, कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में इनके आलेख प्रकाशित होते हैं।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद मेरे मित्र मंडल को मेरी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है जबकि मै एक मामूली लेखक और पत्रकार हूँ. फर्क सिर्फ इतना है कि मै अपनी रौ में रहता हूँ. पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों को मै भी औरों की तरह ही जनादेश कहकर उसका सम्मान करने का रटा-रटाया यानि ध्रुव वाक्य कहने नहीं जा रहा .जनादेश का सम्मान तो झक मारकर आपको करना पड़ेगा ही लेकिन इसके साथ ही अपने-अपने गिरेबान में झांकर भी देखना पडेगा कि आपकी वजह से देश की राजनीति किस दिशा में बड़ी तेजी से आगे बढ़ रही है .

मेरा ‘आप’ केवल मतदाता नहीं ही. मेरे ‘आप’ में सभी राजनीतक दल हैं ,मतदाता हैं ,पक्ष है ,विपक्ष है ,पत्रकार हैं,लेखक हैं चारण हैं,भाट हैं ,क्योंकि सियासत हम सभी के योगदान को रेखांकित करती है .पांच राज्यों के चुनावों में चार राज्यों पर भारतीय जनता पार्टी की विजय भी रेखांकित करने योग्य है,क्योंकि भाजपा ने उन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद ये जीत हासिल की है जो किसी दूसरे दल की पराजय के लिए पर्याप्त थीं. देश में एक साल से ज्यादा लंबा चला किसान आंदोलन भाजपा को सत्ता में वापस आने से नहीं रोक सका, लखीमपुर खीरी जैसे जघन्य हादसे भाजपा की राह में आड़े नहीं आये,कांग्रेस का नया प्रयोग फेल हो गया,समाजवादी पार्टी जातिवाद के अमोघ अस्त्र से विजयश्री हासिल नहीं कर पायी और तो और हम जैसे हजारों लेखक और पत्रकार लोकतंत्र बचाओ का नारा दे-देकर तक गए किन्तु लोकतंत्र को बचाने में कामयाब नहीं हुए .यानि कागा के कोसने से कहीं कोई ढोर नहीं मरा .

भाजपा के सत्ता में आने से देश में लोकतंत्र मर नहीं जाएगा ,लेकिन उसकी जो दशा और दिशा होने वाली है उसकी कल्पना आज की तारीख में भाजपा को सत्ता सिंघासन पर बैठने वाली जनता को भी नहीं है .देश की जनता की समझदारी पर उंगली उठाने का हक न मुझे है न और किसी को ,लेकिन आगाह करने का हक सबको है .पांच राज्यों की जनता ने अपने-अपने हिसाब से सरकारें चुनी हैं ,इसलिए जनता और नई सरकारें बधाई की पात्र हैं .नयी सरकारों से जनता की जो उम्मीदें हैं वे पूरी होना चाहिए ,लेकिन जनता को समझ लेना चाहिए कि अब सत्तारूढ़ होने वाले दलों के लिए सियासत एक खेल से ज्यादा कुछ नहीं रह गयी है. इस खेल में बड़े से बड़ा मुद्दा निर्णायक नहीं हो सकता .

भाजपा हर तरह से दूसरे राजनीतिक दलों से श्रेष्ठ साबित हुई है. चुनावी रणनीति में कोई भाजपा के मुकाबिले नहीं ठहर पाया ,भाजपा की आक्रामकता,आत्मविश्वास ,एकाग्रता और ध्रुवीकरण के प्रति समर्पण स्तुत्य है ,लेकिन विपक्ष का लगातार क्षीण होना भी निंदनीय है .विपक्ष के कन्धों पर जो जिम्मेदारी है वो निभाई नहीं जा रही .कांग्रेस हासिये से भी नीचे जा चुकी है ,और दूसरा कोई राष्ट्रीय दल विचारधारा के स्तर पर भाजपा का मुकाबला करने की स्थिति में है नहीं .गैर भाजपा दलों का गठबंधन फिलहाल नेस्तनाबूद हो चुका है .पंजाब में ‘ आप ‘ की जीत भी बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं करती ,क्योंकि ‘ आप ‘ को राष्ट्रीय दल बनने में कम से कम आधी सदी तो लग ही जाएगी .

भाजपा ने राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश के अलावा उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में अपनी सत्ता बरकरार रखी, जबकि अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने तीन चौथाई बहुमत के साथ पंजाब में ‘प्रचंड जीत’ हासिल की है.आप आँख बंद कर कह सकते हैं कि अब भाजपा के लिए आने वाले तमाम विधानसभा चुनाव और आम चुनाव कोई बड़ी चुनौती नहीं रह गए हैं .क्योंकि भविष्य में किसान आंदोलन से बड़ा कोई दूसरा आंदोलन खड़ा होने वाला नहीं है .जनता महंगाई के खिलाफ लड़ना पहले ही भूल चुकी है .जनता को कोविड महामारी के दौरान दवा और हवा के अभाव में मरते और नदियों में बहते शव याद नहीं रहते .यानि भाजपा देश की जनता को जिस मादकता के साथ अपने काबू में करना चाहती थी उसमें कामयाब हो गयी है .और ये मादकता धर्म की थी .

आप कहना चाहें तो कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की बदौलत ‘नया इतिहास’ रचते हुए करीब तीन दशकों बाद उत्तर प्रदेश में निवर्तमान सरकार की सत्ता में वापसी हुई है.लेकिन क्या हकीकत में ये नेताओं की लोकप्रियता को प्रमाणित करने वाले चुनाव थे या इन चुनावों में बाकायदा एक रणनीति का इस्तेमाल कर चुनाव जीता गया ?प्रधानमंत्री जी ने कहा कि यह नतीजे पार्टी के ‘गरीब हितैषी और अति सक्रिय शासन’ पर जनता की बड़ी मजबूत मुहर है. उन्होंने कहा, “जो लोग उत्तर प्रदेश को जाति के चश्मे से देखते हैं, वे इसका अपमान करते हैं. राज्य के लोगों ने 2014 से हर बार विकास की राजनीति के लिए वोट दिया है.”

प्रधानमंत्री जी की इस प्रतिक्रिया पर उनके मुंह में घी-शक्कर भर देने का मन करता है .काश देश की राजनीति गरीब हितैषी और सक्रिय शासन वाली हो जाये .लेकिन ये दोनों शब्द भी एक जुमला है .भाजपा देश के लोकतंत्र को तीन रंगों के बजाय एक रंग में रंगने की कोशिश में लगी हुई है ,यही भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है भारत विविध रंगों का देश है इसकी विविधता बनाये रखना जरूरी है .देश को दो रंगा हिंदुस्तान नहीं बनाया जा सकता जिसमें हिन्दू और मुसलमान दो अलग-अलग ध्रुवों पर खड़े नजर आएं.

बहरहाल इन चुनावों के बाद किस राजनीतिक दल को क्या करना चाहिए ये बताने की जरूरत नहीं हैं ,क्योंकि हरेक दल को पता है कि उसे क्या करना चाहिए ? कांग्रेस के प्रति मेरी संवेदनाएं और गहरी हो गयीं हैं क्योंकि श्रीमती प्रियंका गांधी की तमाम ईमानदार कोशिशों के कांग्रेस उत्तरप्रदेश में जनता की नजरों में नहीं चढ़ पायी .समाजवादियों ने अपने ढंग से चुनाव लड़ा और बहन मायावती ने अपने ढंग से .माया मेम ने देश के दलितों के साथ जो खेल खेला है उसे इतिहास में कैसे अक्षरों में दर्ज किया जाएगा ये मै नहीं बता सकता .कांग्रेस की दुर्गति देखकर अब तो तरस भी नहीं आ रहा .बहरहाल परिदृश्य बदल रहा है .इसका आनंद लीजिये और लोकतंत्र को दो ध्रुवों में बाँटने से रोक सकें तो रोकिये .क्योंकि जनता के सामने विदोषक और संत-मंहत ही अब चुनने के लिए विकल्प बचे हैं ,बाक़ी हरी इच्छा !
@ राकेश अचल

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