
दुनिया जानती है कि हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी फकीर हैं .उनकी सुरक्षा में कथित चूक को लेकर पूरे देश के साथ हम भी कम चिंतित नहीं हैं ,क्योंकि देश पहले ही दो प्रधानमंत्रियों की बलि आतंक की चौखट पर दे चुका है .इसलिए पंजाब में हुए वाकये को पूरी गंभीरता से लेते हुए आवश्यक कार्रवाई की जाना चाहिए .लेकिन ये कार्रवाई किसी राज्य में अपने मंसूबे पूरे न होने की वजह से नहीं होना चाहिए .यदि फिरोजपुर रैली के लिए गए प्रधानमंत्री की सुरक्षा के साथ सचमुच कोई इरादतन खिलवाड़ हुआ है तो देश के गृहमंत्री अमित शाह और पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत चन्नी को इस्तीफा दे देना चाहिए .
अब सवाल ये है कि इस वाकये के बाद प्रधानमंत्री जी ने जो टीप की है वो क्या उनके मन के चोर को नहीं दर्शाती ? क्या हमारे फकीर की दाढ़ी में भी का कोई तिनका फंस गया है ? क्या वे किसी प्रहसन का हिस्सा बनाये गए हैं ? क्योंकि इस घटना के समय पुल पर एक और से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिंदाबाद के नारे सुनाई दे रहे हैं तो पुल के नीचे मुर्दाबाद के नारे .सवाल ये है कि इस देश में हमारे प्रधानमंत्री की जान का दुश्मन कौन है ? किसान तो कम से कम नहीं हैं,फिर भी उनके ऊपर शंका की जा रही है .पंजाब की सरकार पर शंका की जा रही है .सवाल ये है कि क्या देश की सियासत सचमुच इतनी नीचे आ गयी है की कोई राज्य सरकार अपने ही प्रधानमंत्री की जान के पीछे पड़ जाए.
बात 1984 की है,भाजपा के शीर्ष नेता अटल बिहारी बाजपेयी लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे और स्पष्ट हो गया था कि वे हार रहे हैं ,तभी अटल बिहारी बाजपेयी की सभा में एक बम रखे जाने की खबर चलाई गयी और जब मामले की जांच हुई तो पता चला कि भाजपा के ही किसी समझदार ने स्टंट रचकर सभा स्थल पर नारियल लपेटकर रख दिया था .फिरोजपुर की घटना में भी यही झलक नजर आ रही है.
हकीकत ये है कि भाजपा ने देश में अभी तक ऐसा कोई पुरुषार्थ का काम नहीं किया है जिससे कि कोई उनके नेताओं की जान का दुश्मन बने .देश के किसान भी पूरे एक साल भाजपा सरकार की हठधर्मिता को सहन करते रहे,कुर्बानियां देते रहे लेकिन उन्होंने किसी भाजपा नेता को अपने गुस्से का शिकार नहीं बनाया . फिर भी प्रधानमंत्री तो प्रधानमंत्री है ,उनकी सुरक्षा में कोई चूक होना अक्षम्य ही है.
देश की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी और राजीव गांधी आतंकवाद के खिलाफ मोर्चा लेने वाले लोगों में शामिल थे इसलिए उन्हें जान से मार दिया गया ,लेकिन इन दोनों ने कभी इतना भय प्रदर्शित नहीं किया जितना कि माननीय मोदी जी ने किया है .सवाल ये है कि क्या वे किसानों से डरते हैं ? वे तो किसान हितैषी हैं.किसान उनके दुश्मन क्यों होने लगे ? सवाल ये है कि क्या कांग्रेस उनकी जान की दुश्मन है ? तो जबाब है कि कांग्रेस को तो खुद अपनी जान की पड़ी है ,वो मोदी जी के पीछे क्यों पड़ेगी ? फिर उनकी जान का दुश्मन कौन है ? शायद वे खुद अंदर से भयभीत हैं .देश में चौतरफा अपने प्रति नाराजगी से उनकी नींद उड़ी हुई है .उन्हें हर समय अपने चारों तरफ असुरक्षा दिखाई देती है .अब ऐसे असुरक्षित प्रधानमंत्री से कोई देश के बाहर किसी सुरक्षित स्थान पर जाने को तो नहीं कह सकता !
परम्परा ये है कि देश का चाहे प्रधानमंत्री हो या मुख्यमंत्री किसी का काफिला किसी भी सूरत में रखा नहीं जाना चाहिए,लेकिन अपवाद स्वरूप ऐसा होता है. मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का काफिला ग्वालियर में रोका गया लेकिन इसके एवज में तत्कालीन एसपी का तबादला भर किया गया और दस महीने बाद उसे पुन: पुरानी जगह पदस्थ कर दिया गया .सुनदरलाल पटवा के साथ भी यही हुआ था .लेकिन एक प्रधानमंत्री के साथ शायद ये पहली बार हुआ है ,जो नहीं होना चाहिए था. पंजाब सरकार ने संबंधित एसपी को निलंबित कर दिया है .उस गरीब को फांसी पर तो नहीं चढ़ाया जा सकता ,क्योंकि प्रधानमंत्री के काफिले के आसपास मौजूद भीड़ खुद भाजपा का ध्वज थामे लोगों की थी .उन्हें वो रोकता तो भी उसके ऊपर आरोप लगाए जाते .
प्रधानमंत्री की सुरक्षा का जिम्मा जिस एजेंसी पर है वो उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री के काफिले के पीछे दौड़ने पर मजबूर कर सकती है उसे इतना नहीं पता कि पंजाब में प्रधानमंत्री जी का काफिला रोकने की कोई साजिश हुई है ? ये नाकामी पंजाब सरकार से कहीं ज्यादा केंद्रीय गृहमंत्री की है .यदि उनमें कोई लाज-शर्म है तो वे तत्काल इस घटना की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेकर अपने पद से इस्तीफा दे देते.लेकिन उन्हें तो निशाना पंजाब सरकार और कांग्रेस को बनाना था,बहुत सम्भव है कि ये सारा प्रहसन उनकी अपनी पार्टी ने सिर्फ इसीलिए रचा हो ! इसलिए मामले की जांच के बिना कुछ नहीं कहा जा सकता .
प्रधानमंत्री की सुरक्षा में कथित लापरवाही के बाद से अनेक रहस्य उद्घाटन हो रहे हैं. प्रधानमंत्री के आधिकारिक दौरा कार्यक्रम में इस बात का कोई उल्लेख नहीं है कि उन्हें सड़क मार्ग से जाना था,फिर ये परिवर्तन किसने और कैसे किया ? प्रधानमंत्री कार्यालय से राज्य सरकार ने खराब मौसम और किसान आंदोलन का हवाला देकर दौरा रद्द करने का आग्रह किया गया था तो उसे क्यों नहीं माना गया? .क्या प्रधानमंत्री कार्यालय राज्य की अनुशंषाओं की अनदेखी कर प्रधानमंत्री की सुरक्षा का जोखिम ले सकता है ? बहरहाल जो हुआ उसे बहुत दुर्भाग्यूर्ण ही कहा जा सकता है .
माननीय नरेंद्र मोदी को भले ही देश की 31 फीसदी जनता ने चुना हो किन्तु वे इस देश के प्रधानमंत्री हैं ,इसलिए उनकी सुरक्षा में किसी भी लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता .भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति न हो ये सुनिश्चित किया जाना बहुत आवश्यक है .केंद्र और पंजाब पुलिस को संयुक्त रूप से इस घटना की जांच करना चाहिए ,ताकि हकीकत जनता के सामने आ सके .यदि इस मामले में भी मध्यप्रदेश की घटनाओं की तरह लीपापोती की गयी तो समझा जाएगा कि फकीर की दाढ़ी में भी कोई तिनका है ,जिसके जरिये प्रतिद्वंदी राज्य सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की जा रही है ,अन्यथा इस घटनाक्रम को लेकर भाजपा समवेत स्वर में पंजाब सरकार की बर्खास्तगी कर वहां राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग न करती .
हमारे प्रधानमंत्री ,हमारे प्रधानमंत्री हैं,उनकी सुरक्षा देश का प्रथम कर्तव्य है .जिसकी समझ में ये न आता हो वो कम से कम सामान्य स्थिति वाला तो नहीं कहा जा सकता .प्रधानमंत्री जी को भी चाहिए कि वे अपने मन से तमाम डर निकाल दें ,कोई उनका बाल-बांका भी नहीं कर सकता .
@ राकेश अचल
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