उत्तराखंड में पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध की जमीन तैयार हो गई है। किसान आंदोलन के बाद देवस्थानम बोर्ड के बहाने राज्य में भाजपा की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
@शब्द दूत ब्यूरो (01 नवंबर, 2021)
पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के बनाए देवस्थानम बोर्ड ने इस बार भाजपा सरकार के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है। जहां एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच नवंबर के केदारनाथ दौरे पर संदेह के बादल घुमड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ये आशंका भी जताई जा रही है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी बोर्ड को भंग कर कोई अस्थाई व्यवस्था कर सकते हैं।
प्रधानमंत्री की केदारनाथ यात्रा से पहले तैयारियों का जायजा लेने पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का वहां जिस तरह से विरोध हुआ, वह यह दिखाता है कि आने वाले दिनों में ये आंदोलन भाजपा के गले की हड्डी बन सकता है।
इधर, तीर्थ पुरोहितों के संगठन ने तीन नवंबर को केदारनाथ कूच का नारा देकर अपने इरादे जता भी दिए हैं। उनका कहना है कि अस्थाई राहत से काम नहीं चलेगा और देवस्थानम बोर्ड भंग किए जाने से कम में वे नहीं मानेंगे।
तीर्थ पुरोहितों ने देवस्थानम बोर्ड के उपाध्यक्ष मनोहरकांत ध्यानी द्वारा नामित बोर्ड के सदस्यों पर भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि नामित सदस्य तीर्थ पुरोहितों की बिरादरी का हिस्सा नहीं हैं।
फिलहाल, विरोध की इस चिंगारी की आंच प्रधानमंत्री मोदी के दौरे तक पहुंचना उत्तराखंड में चुनाव को देखते हुए खतरे की घंटी तो है ही, साथ ही मुख्यमंत्री धामी के लिए भी चुनौती है कि वे इस मामले से कैसे पार पाते हैं।
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