@वेद भदोला
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर के राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ वर्चुअल बैठक में वहां कोविड-19 के बढ़ते मामलों को लेकर चिंता जताई है। प्रधानमंत्री ने टूरिस्ट क्षेत्रों में उमड़ रही भीड़ और पूर्वोत्तर राज्यों में संक्रमण दर अधिक होने को लेकर चिंता जताई।
कुछ ऐसा ही हाल उत्तराखंड के नैनीताल, मसूरी समेत उत्तराखंड के कई हिल स्टेशनों का भी है। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद भी पर्यटक कोविड प्रोटोकॉल को धता बताते हुए इन जगहों पर भारी संख्या में जा रहे हैं।
भारत समेत विश्व के शीर्ष वैज्ञानिक और डॉक्टर ये चेता चुके हैं कि भारत में कोरोना की दूसरी लहर अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। पूर्वात्तर राज्य और दक्षिण के कुछ राज्य अभी भी दूसरी लहर की चपेट में हैं। ऐसे में श्रावण मास में उत्तराखंड के हरिद्वार में होने वाली कांवड़ यात्रा पर भी सवाल तो खड़े होने ही थे।
सवाल तो हाल ही में हरिद्वार में संपन्न महाकुंभ पर भी खड़े हुए थे। सवाल ये भी खड़ा हुआ था कि आखिर कोरोना महामारी में एक साल पहले ही ये महाकुंभ क्यों आयोजित किया जा रहा है। इसका सीधा सा जवाब है कि चूंकि उत्तराखंड में निकट भविष्य में चुनाव होने हैं, लिहाजा महाकुंभ को एक साल पहले ही आयोजित करवा लिया जाए। सरकार ने इस आयोजन से एक तीर से दो शिकार कर लिए। एक तो हिन्दू मतावलंबियों की धार्मिक तुष्टि हो गई और दूसरा साधु-संत समाज भी खुश हो गया। महाकुंभ आयोजित करने से क्या नफा-नुकसान हुआ, ये अब पुरानी बात हो गई है।
फिलहाल, कांवड़ यात्रा को लेकर खबर ये है कि श्रावण मास की कांवड़ यात्रा स्थगित कर दी गई है। निःसंदेह कोरोना काल में उत्तराखंड के नवनियुक्त मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का ये कदम सराहनीय है। धामी पहले भी चुके हैं कि नागरिकों की जान कीमती है और वे इसपर कोई रिस्क नहीं लेना चाहेंगे। प्रसंगवश, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लगभग तीन करोड़ कांवड़िए श्रावण मास में जल लेने हरिद्वार पहुंचते हैं। ऐसे में दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और मध्य प्रदेश से हरिद्वार जल लेने के लिए पहुंचने वाले कांवड़ियों की इतनी बड़ी संख्या के लिए कोविड मैनेजमेंट बेहद दुष्कर कार्य साबित होता।
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