@विनोद भगत
काशीपुर । सरकार कोरोना महामारी के दौरान अपनी अव्यवस्थाओं का ठीकरा चिकित्सकों और नर्सिंग होम पर फोड़ कर अपनी जिम्मेदारियों से बच रही है। जब कोरोना संक्रमण के चरम स्थिति के समय जो चिकित्सक सरकार को ईश्वर तुल्य नजर आ रहे थे अब उन पर चिकित्सालय की व्यवस्थाओं के नाम भेजे जा रहे नोटिसों से उनके द्वारा किये गये सेवा कार्य को बिसरा दिया गया है।
जानकारी के मुताबिक जिन चिकित्सालय या निजी नर्सिंग होम को सरकार ने जल्द बाजी में कोविड उपचार सेंटर बनाया था। अब उन्हीं नर्सिंग होम के मानकों को लेकर पूछताछ की जा रही है। हद तो तब हो गई जब ठीक हुये जिन मरीजों के आयुष्मान कार्ड नहीं बने हुए थे उनसे अब आयुष्मान कार्ड बनवा कर पूर्व में इलाज पर हुये खर्च की भरपाई निजी चिकित्सालयों से करने की बात कही जा रही है। यही नहीं चिकित्सालयों द्वारा उन मरीजों से इलाज के लिये गये पैसे वापस करने को कहा गया है। और उन्हें सरकार आयुष्मान योजना के तहत भुगतान करेगी।
आयुष्मान का अजीब खेल है। पहले तो मरीज अपने आयुष्मान कार्ड के बारे में भर्ती के समय नहीं बताता। चिकित्सालय से डिस्चॉर्ज होने के बाद जब पेमेंट का समय आता है तो बताया जाता है कि मरीज का आयुष्मान कार्ड बना हुआ है। ऐसी स्थिति में चिकित्सालय पर आयुष्मान योजना में गड़बड़ी का आरोप तो सीधे लग जाता है परंतु किन परिस्थितियों में ऐसा हुआ इसकी ओर ध्यान नहीं दिया जाता। आमतौर पर चिकित्सक व नर्सिंग होम संचालकों को ही इसका दोष दिया जाता है।
कुछ चिकित्सकों से शब्द दूत की बातचीत हुई तो एक और तथ्य सामने आया। नर्सिंग होम में कार्यरत स्टाफ को भी नर्सिंग होम संचालकों द्वारा पूर्व निर्धारित मेहनताने की जगह दुगुनी तिगुनी सेलरी भी देनी पड़ी। कोरोना महामारी में एक ओर आम जनता को मार झेलनी पड़ी वहीं दूसरी ओर चिकित्सकों के ऊपर सरकारी मानको के उल्लंघन की तलवार भी लटकती रही।
हो सकता है कुछ नर्सिंग होम संचालक व चिकित्सक गलत हों लेकिन इसके लिए सारे चिकित्सकों को कठघरे में खड़ करना न तो न्यायसंगत है और न तर्कसंगत। सरकारी रवैये से चिकित्सकों में भय व्याप्त है अगर जैसा कि संभावना जताई जा रही है कि तीसरी लहर आ सकती है तो अंततः यही चिकित्सक काम आयेंगे यह नहीं भूलना चाहिए।

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