छत्तीसगढ़, पंजाब, ओडिशा, यूपी और बिहार सहित कई राज्यों में धान की खेती बड़े लेवल पर होती है। किसान फसल काटने के बाद इसकी पराली को या तो जला देते हैं या खेतों में ही छोड़ देते हैं। इससे खेत को तो नुकसान होता ही है, साथ ही पर्यावरण भी बड़े लेवल पर प्रभावित होता है। ओडिशा के बारगढ़ जिले की रहने वाली जयंती प्रधान ने इस समस्या को दूर करने के लिए एक पहल की है। वे बेकार पड़ी पराली से मशरूम की खेती और वर्मीकम्पोस्ट तैयार करने का काम रही हैं। इससे वे हर साल 20 लाख रुपए की कमाई कर रही हैं।
38 साल की जयंती एमबीए ग्रेजुएट हैं। वे एक किसान परिवार से ताल्लुक रखती हैं। पिता चाहते थे कि पढ़-लिखकर कुछ करूं। इसलिए एमबीए की डिग्री भी ली, लेकिन मैं किसी कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने के बजाय फार्मिंग में करियर बनाना चाहती थी। इसलिए नौकरी के लिए कभी कोशिश नहीं की।
जयंती कहती हैं कि हमारे इलाके में ज्यादातर लोग धान की खेती करते हैं। इससे बहुत अच्छी कमाई नहीं हो पाती है। इसलिए मैंने तय किया कि कुछ ऐसी खेती की जाए जो सिर्फ जीविका चलाने का साधन न होकर कमाई का भी जरिया हो। जिससे दूसरे लोगों को भी रोजगार से जोड़ा जा सके।
साल 2008 में कालाहांडी के रहने वाले बीरेंद्र प्रधान से जयंती की शादी हो गई। बीरेंद्र तब सरकारी नौकरी करते थे, लेकिन जब उन्होंने देखा कि जयंती बेहतर कर रही हैं और उन्हें सपोर्ट की जरूरत है तो बीरेंद्र ने नौकरी छोड़ दी। वे भी जयंती के साथ खेती में लग गए। जयंती ने 35 लोगों को रोजगार दिया है। इसके साथ ही वो स्थानीय महिलाओं को मशरूम की खेती की ट्रेनिंग भी देती हैं।
जयंती ने 35 लोगों को रोजगार दिया है। इसके साथ ही वो स्थानीय महिलाओं को मशरूम की खेती की ट्रेनिंग भी देती हैं।
जयंती ने स्थानीय महिलाओं का एक समूह तैयार किया है। इसमें 100 से ज्यादा महिलाएं जुड़ी हुई हैं। जयंती इन्हें पैडी स्ट्रॉ मशरूम की खेती और प्रोसेसिंग की ट्रेनिंग देती हैं। ये महिलाएं अपना प्रोडक्ट तैयार करने के बाद जयंती के पास पहुंचा देती हैं। फिर जयंती उसे मार्केट में सप्लाई करती हैं।
हर महीने 200 क्विंटल से ज्यादा मशरूम का प्रोडक्शन ये महिलाएं करती हैं। इसके साथ ही उन्होंने 35 लोगों को रोजगार भी दिया है जो खेती और प्रोडक्ट्स की प्रोसेसिंग में जयंती की मदद करते हैं। अभी वे मशरूम से प्रोसेसिंग के बाद आचार, पापड़ जैसे एक दर्जन प्रोडक्ट तैयार करके स्थानीय मार्केट में भेजती हैं।
जयंती बताती हैं कि मशरूम तैयार करने के बाद जो पराली बच जाती है, हम उसका उपयोग वर्मीकम्पोस्ट तैयार करने में करते हैं। इसका फायदा ये होता है कि हमें खाद के लिए किसी और सोर्स पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है और पराली की समस्या का निपटारा भी हो जाता है।

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