@विनोद भगत
सत्ता के लिए कोई भी दल किसी भी हद को पार कर सकता है। अब इसमें चाहें कांग्रेस को समझें या भाजपा को। जब कांग्रेस सत्ता में थी तो उसने भी हदों से बाहर जाकर सत्ता में काबिज रहने की पुरजोर कोशिश की थी। परिणाम एक विद्रोह के रूप में सामने आया था और उत्तराखंड से उसका सूपड़ा साफ हो गया था। हरीश रावत के “न खाता न बही हरीश रावत जो कहे वह सही” के अति आत्मविश्वास ने 70 सदस्यीय विधानसभा में उसे 11 पर लाकर खड़ा कर दिया। और तमाम वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी को अलविदा कह दिया था।
आज भाजपा भी उत्तराखंड में उसी राह पर दिखाई दे रही है। 57 सदस्यों के प्रचंड बहुमत से सत्ता पर काबिज हुई भाजपा शायद यह भूल गई कि अंततः जनता ही लोकतंत्र में सर्वोपरि होती है। हालांकि मोदी फैक्टर के चलते भाजपा आत्मविश्वास से लवरेज नजर आ रही है लेकिन काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती। प्रदेश की जनता ने पिछली बार जरूर मोदी के नाम पर जीत दिला दी थी। पर इस बार जनता काम भी देखेगी। काम की चाल और चरित्र भी देखेगी। सत्ता के लिए सिद्धांतो को ताक पर रखना कहीं आने वाले चुनावों में भाजपा को भारी न पड़ जाये।
पार्टी विधायकों की नाराजगी और जन भावनाओं के विपरीत फैसले भारी भी पड़ सकते हैं। हालिया घटनाक्रम लक्सर के विधायक कुंवर प्रणव चैंपियन की भाजपा में ससम्मान वापसी से भाजपा को लाभ नहीं हानि ही पहुंचेगी। देवभूमि उत्तराखंड के लोगों के प्रति अभद्र शब्दावली का प्रयोग करने वाले को पुनः पार्टी में ससम्मान वापस लेने से राज्य की जनता में ही नहीं पार्टी के भीतर भी घमासान है। और उस पर पूर्व अध्यक्ष व मौजूदा सासंद अजय भट्ट ने चैंपियन को प्रकांड विद्वान से सुशोभित कर साबित कर दिया है कि उत्तराखंड देवभूमि का अपमान करने वाले भी भाजपा में स्वीकार्य है। ऐसे राज्य की जनता की भावनाओं पर ठेस लगी है।
लोग जानना चाहते हैं कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि राज्य के लोगों की भावनाओं को आहत करने वालों को पार्टी गले क्यों लगा रही है? और क्यों उनकी शान में पार्टी के वरिष्ठ नेता कसीदे गढ़ रहे हैं? 

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