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मूल्यों का सवाल और अदालत का फैसला@सुप्रीम कोर्ट के फैसले की करो आलोचना, राष्ट्रपति का आह्वान, वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल का विश्लेषण

राकेश अचल, लेखक देश के जाने-माने पत्रकार और चिंतक हैं, कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में इनके आलेख प्रकाशित होते हैं।

क्या किसी देश के जीवन मूल्यों से जुड़े किसी फैसले को लेकर किसी अदालत को आड़े हाथ लिया जा सकता है ,?क्या किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष अपने ही देश की सबसे बड़ी अदालत के फैसले के खिलाफ जनता से विरोध प्रदर्शनों का आग्रह कर सकता है ? आप शायद कहेंगें ,कि ये नहीं हो सकता .होना भी नहीं चाहिए ,किन्तु दुनिया के महाबली अमेरिका में ये हो रहा है .अमेरिका के राष्ट्रपति ने गर्भपात से जुड़े एक फैसले को लेकर अपने देश के सुप्रीम कोर्ट की घोर आलोचना करते हुए जनता से शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने के लिए कहा है .

आपको बता दूँ कि अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने गत दिनों गर्भपात के संवैधानिक सुरक्षा के अधिकार को समाप्त कर दिया है .अदालत के इस फैसले के खिलाफ अमेरिका में भूचाल आ गया है. जनता सड़कों पर है और खुद राष्ट्रपति जो बाइडन इस फैसले की आलोचना कर रहे हैं .बाइडन का कहना है कि-‘ सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक रो बनाम वेड के फैसले को पलट कर एक बड़ी “दुखद गलती” की है। उन्होंने कहा, “अदालत ने वो काम किया जो इससे पहले कभी नहीं हुआ था। अदालत ने स्पष्ट रूप से एक संवैधानिक अधिकार को छीन लिया है जो इतने सारे अमेरिकियों के लिए मौलिक अधिकार भी है। मेरे विचार में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई एक दुखद गलती है।” देश को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अदालत के फैसले ने अमेरिका को 150 साल पीछे की ओर ढकेल दिया है।

हमारे देश में जब पंत प्रधान किसी भी ज्वलंत मुद्दे पर गुड़ खाकर बैठे रहते हैं ,वहीं अमेरिका में देश का राष्ट्रपति अदालत के फैसले पर देश को सम्बोधित करने का साहस दिखाता है .ये बारीक सा फर्क है. इसे समझना चाहिए कि जनता के प्रति हमारे नेताओं की प्रतिबद्धता का स्तर क्या है ? बहरहाल बात अमेरिका की हो रही है.अमेरिका के उच्चतम न्यायालय ने कई साल पहले रो बनाम वेड मामले में दिए गए फैसले को पलटते हुए गर्भपात के लिए संवैधानिक संरक्षण को समाप्त कर दिया है। इस फैसले से लगभग आधे राज्यों में गर्भपात पर प्रतिबंध लगने की संभावना है।

अमेरिकी जीवन मूल्यों में गर्भपात को संवैधानिक और मौलिक अधिकार माना गया है ,नए फैसले के बाद स्थितियां बदल जाएँगी.अब कोई महिला गर्भपात को अपना संवैधानिक अधिकार की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकेगी. अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने कि वह उन राज्यों में गर्भपात संबंधी नियमों के मद्देनजर महिलाओं के अधिकारों के संरक्षण के लिए अपनी ‘‘क्षमतानुसार’’ हरसंभव प्रयास करेंगे, जहां इन्हें प्रतिबंधित किया जाएगा। बाइडन ने कहा कि राजनेताओं को उन फैसलों में हस्तक्षेप की अनुमति नहीं दी जाएगी जोकि एक महिला और उसके चिकित्सक के बीच होगा।
अमेरिका में इस तरह का निर्णय कुछ साल पहले तक अकल्पनीय था। उच्चतम न्यायालय का फैसला गर्भपात विरोधियों के दशकों के प्रयासों को सफल बनाने वाला है। न्यायमूर्ति सैमुअल अलिटो की एक मसौदा राय के आश्चर्यजनक ढंग से लीक होने के एक महीने से अधिक समय बाद यह फैसला आया है।इस फैसले के संबंध में एक महीने पहले न्यायाधीश की यह मसौदा राय लीक हो गई थी कि अदालत गर्भपात को मिले संवैधानिक संरक्षण को समाप्त कर सकती है। मसौदा राय के लीक होने के बाद अमेरिका में लोग सड़कों पर उतर आए थे।अदालत का फैसला अधिकतर अमेरिकियों की इस राय के विपरीत है कि 1973 के रो बनाम वेड फैसले को बरकरार रखा चाहिए जिसमें कहा गया था कि गर्भपात कराना या न कराना, यह तय करना महिलाओं का अधिकार है। इससे अमेरिका में महिलाओं को सुरक्षित गर्भपात का अधिकार मिल गया था।

गर्भपात को लेकर अलग-अलग देशों के अपने-अपने मूल्य और अपने-अपने क़ानून हैं. भारत में गर्भपात कानूनी तौर पर वैध है। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी (एमटीपी) एक्ट के तहत गर्भावस्था की दूसरी तिमाही तक गर्भपात करना पूरी तरह लीगल है। हालांकि यह एक्ट महिलाओं को उनके देह पर हक दिलाने के लिए नहीं बल्कि जनसंख्या को नियंत्रित करने के इरादे से लाया गया था। लेकिन जिस तरिके से अमेरिका में गर्भपात के मुद्दे को राष्ट्रिय मुद्दा मानकर राष्ट्रपति तक बोले हैं उसे देखकर हैरानी भी होती है और संतोष भी होता कि किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष अपने देश की जनता कि नब्ज को पहचानता है .

सवाल नैतिकता से जुड़ा है इसलिए इस पर अलग से बहस हो सकती है ,लेकिन अभी मुद्दा ये है कि क्या किसी और देश में अपनी अदालतों को इस तरह आड़े हाथ लेने का नैतिक साहस लोगों के पास है ? हमारे यहां इसी तरह का एक मुद्दा लेस्बियन्स का आया था .मुद्दा देश की सबसे बड़ी अदालत ने ही तय किया .लेकिन कभी कोई राष्ट्राध्यक्ष नहीं बोला .हमारे यहां अदलतों से क्लीनचिट लेकर अपने प्रतिद्वंदियों के खिलाफ ईडी दूसरी जांच एजेंसियों के इस्तेमाल का साहस जरूर लोगों के पास है .तीस्ता के खिलाफ की गयी कार्रवाई की टाइमिंग देखकर आप समझ सकते हैं कि हमारे नेता कैसे ताक लगाए बैठे थे कि इधर क्लीन चिट मिले और उधर तीस्ता को गिरफ्तार किया जाये .

असल सवाल ये है कि क्या हमारे यहाँ अदलातों के फैसलों के खिलाफ जिस तरह से अमेरिका में बोला जा रहा है,बोला जा सकता है ? शायद नहीं बोला जा सकता. हमारे यहां अदालत की अवमानना एक बड़ा अवरोध है .इसका इस्तेमाल कब और कैसा हो जाये ,कोई नहीं जानता .अमेरिका में गर्भपात को लेकर अलग अलग राज्यों में एक जैसा क़ानून नहीं है. एक दर्जन से अधिक राज्य ऐसे भी जहाँ पहले से गर्भपात प्रतिबंधित है .अमेरिका मिसूरी राज्य में ऐसा करने वालों को 5 से 15 साल की जेल की सजा हो सकती है.

इस मुद्दे पर जो बाइडन अकेले नहीं हैं. अमेरिका की उपराष्ट्रपति उपराष्ट्रपति कमला हैरिस भी उनके साथ हैं. हैरिस ने एक ट्वीट में लिखा है, ”आपके पास ऐसे नेताओं को चुनने की शक्ति है जो आपके अधिकारों की सुरक्षित और संरक्षित करेंगे। और जैसा कि राष्ट्रपति ने कहा, आप अपने वोट से जवाब दे सकते हैं। अंतिम फैसला आपको लेना है।… तो यह खत्म नहीं हुआ है।”हैरिस के इस ट्वीट से लगता है कि बाइडेन सरकार गर्भपात के अधिकार को दोबारा कानूनी जामा पहना सकती है।

अमेरिका गर्भपात को लेकर विचलित है लेकिन भारत में दलबदल को लेकर कोई हलचल नहीं है. दलबदल के जरिए सरकारें बनाने और बिगाड़ने का खेल अनवरत जारी है ,किन्तु न जनता आंदोलित है और न नेता .अदालतों की तो बात ही अलग है .नेता खुद इस बीमारी के संरक्षक है .यहां दलबदल को संवैधानिक अधिकार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है .काश कोई इसके खिलाफ भी तनकर खड़ा होता .
@ राकेश अचल

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