जल्दबाजी में जलविद्युत प्रोजेक्ट को मंजूरी देकर हिमालय के साथ खिलवाड़ बंद हो: चंडी प्रसाद भट्ट

@शब्द दूत ब्यूरो

ग्लेशियर टूटने से उत्तराखंड में आई आपदा को लेकर पर्यावरणविद सवाल उठाने लगे हैं। चिपको आंदोलन के नेता एवं मैगसायसाय पुरस्कार विजेता चंडी प्रसाद भट्ट ने कहा कि जल्दबाजी में गुपचुप तरीके से संवेदनशील क्षेत्र में जल विद्युत परियोजनाओं को मंजूरी दी दी जा रही है और ऐसे कामों से हिमालय के पारिस्थतिकी तंत्र से खिलवाड़ अविलंब बंद किया जाए।

भट्ट ने कहा कि चमोली के रैणी क्षेत्र में ऋषिगंगा नदी में आई बाढ़ इसी का नतीजा है। अंतरराष्ट्रीय गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित भट्ट ने कहा कि ऋषिगंगा और धौली गंगा में जो हुआ वह प्रकृति से खिलवाड़ करने का ही परिणाम है। हिमालय नाजुक पर्वत है और टूटना बनना इसके स्वभाव में है। भूकंप, हिमस्खलन, भूस्खलन, बाढ़, ग्लेशियर, तालों का टूटना और नदियों का अवरूद्ध होना आदि इसके अस्तित्व से जुड़े हुए हैं। भट्ट ने कहा कि बढ़ता इंसानी दखल हिमालय का पारिस्थितिकीय तंत्र बर्दाश्त नहीं कर सकता है।

1970 की अलकनन्दा की भयानक बाढ़ पर चिपको नेता ने कहा कि उस साल ऋषिगंगा घाटी समेत पूरी अलकनंदा घाटी में बाढ़ से भारी तबाही हुई थी जिसने हिमालय के टिकाऊ विकास के बारे में सोचने को मजबूर किया था। इस बाढ़ के बाद लोगों ने ऋषिगंगा के मुहाने पर स्थित रैणी गांव के जंगल को बचाने के लिए सफलतापूर्वक चिपको आंदोलन आरम्भ किया। इसके फलस्वरूप तत्कालीन राज्य सरकार ने अलकनंदा के पूरे जलाशय के इलाके में पेड़ों की कटाई को प्रतिबंधित कर दिया था। भट्ट ने कहा कि पिछले कई दशकों से हिमालय के एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक बाढ़ और भूस्खलन की घटना तेजी से बढ़ रही है। 2013 में गंगा की सहायक नदियों में आई प्रलयंकारी बाढ़ से न केवल
केदारनाथ बल्कि पूरे उत्तराखंड को गंभीर चिंतन करने के लिए मजबूर कर दिया।

भट्ट ने कहा कि ऋषिगंगा में घाटी की संवेदनशीलता को दरकिनार कर अल्प ज्ञान के आधार पर जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण को पर्यावरणीय स्वीकृति दे दी गई जबकि यह इलाका नन्दादेवी नेशनल पार्क के मुहाने पर है। 13 मेगावाट की जल विद्युत परियोजना की गुपचुप स्वीकृति देना ऐसी आपदाओं को दावत देने जैसा है। इस परियोजना के निर्माण की जानकारी मिलने पर दुख हुआ कि संवेदनशील क्षेत्र में इस परियोजना के लिए स्वीकृति कैसे दी गई। जबकि हमारे पास ऐसी परियोजनाओं को सुरक्षित संचालन के लिए इस क्षेत्र के पारिस्थितिकीय तंत्र के बारे में कारगर जानकारी अभी भी उपलब्ध नहीं है।

भट्ट ने सवाल उठाया कि परियोजनाओं को बनाने और चलाने की अनुमति और खासतौर पर पर्यावरणीय स्वीकृति तो बिना सवाल जवाब के मिल जाती है। लेकिन स्थानीय जरूरतों के लिए स्वीकृति मिलने पर सालों इंतजार करना पड़ता है।

Website Design By Mytesta +91 8809666000

Check Also

उत्तराखंड: बर्खास्त होने के बाद रो पड़े हरक सिंह रावत, कहा- इतने बड़े फैसले से पहले कुछ नहीं बताया गया

🔊 Listen to this @शब्द दूत ब्यूरो (17 जनवरी, 2022) उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *