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हिजाब और खिजाब में उलझीं सरकारें:ताजा घटनाक्रम पर वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल की खरी खरी

राकेश अचल, लेखक देश के जाने-माने पत्रकार और चिंतक हैं, कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में इनके आलेख प्रकाशित होते हैं।

पर्दा प्रथा मुझे बिलकुल पसंद नहीं ,लेकिन हमारे समाज में तमाम प्रगतिशीलता के बावजूद आज भी पर्दा प्रथा का वजूद कायम है. लेकिन यदि कोई महिला स्वेच्छा से अपना सर या मुंह ढंकने के लिए कोई इंतजाम करे तो मुझे कोई उज्र नहीं.इस निजी इंतजाम के खिलाफ क़ानून बनाने की भी कोई जरूरत भी मै महसूस नहीं करता ,लेकिन हमारे देश में कुछ ख़ास मानसिकता की सरकारें हैं जो अब ये तय करने लगी हैं कि कौन क्या पहने ?कौन क्या खाये ? कौन कब जागे और कौन कब सोये ?

दरअसल सरकारों के पास अब करने के लिए कोई काम रह नहीं गया है इसलिए सरकार कुछ न कुछ ऊल-जुलूल करती रहती है.पहले किसानों के लिए किसानों से पूछे बिना क़ानून बनाये और फिर बाद में उन्हें वापस ले लिया .ऐसे ही अब हिजाब के खिलाफ कानून बना लिया और हिजाब का इस्तेमाल करने वाली लड़कियों या महिलाओं से पूछा तक नहीं .सवाल ये है कि ये क़ानून बनाने की मांग आयी कहाँ से ? इस क़ानून के बिना किसके अधिकारों का हनन हो रहा था ?

केंद्र ने तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाया तो उसका स्वागत हुआ ,विरोध भी हुआ लेकिन महिलाओं ने उसे पसंद किया ,उस क़ानून की जरूरत थी .लेकिन हिजाब पर पाबन्दी की जरूरत अचानक कैसे आन पड़ी .इस पाबंदी के लिए बनाये गए कथित क़ानून का पालन करने के लिए भगवा ब्रिगेड कैसे तैनात कर दी गयी ? कैसे एक लड़की को घेरने शैक्षणिक संस्थान में भगवा ब्रिगेड जा घुसी ? एक ख़ास मानसिकता की सरकारें अतीत में भी कथित लव जिहाद के खिलाफ क़ानून बना चुकी हैं जबकि उनके अपने नेताओं ने युगों पहले और कानून बनने के बाद लव भी किया है और जिहाद भी ,लेकिन उनके सारे क़ानून माफ़,क्योंकि वे आपके माउथपीस बन गए हैं .

आज दुनिया में जहाँ मनुष्य और मनुष्यता ने विकास की अनंत सीढ़ियां तय कर लीं हैं तब किसी के पहनावे,खानपान और रहन-सहन को कानूनों के जरिये नियंत्रित करना एक तरह की तालिबानी संस्कृति को प्रोत्साहित करना है.
मै न हिजाब के अतीत में जाना चाहता हूँ और न वर्तमान पर मुझे कोई बात करना है,मेरी फ़िक्र ये है कि सरकारें आखिर अपने असली दायित्वों को ताक पर रखकर वे सब काम क्यों कर रहीं हैं जिनके लिए उन्हें चुना ही नहीं गया .ऐसी ही ख़ास मानसिकता वाली सरकार गुजरात में मांसाहार को प्रतिबंधित करने में गौरव अनुभव करती है,जबकि खुद मांस का निर्यात कराती है .अरे भाई दुनिया में ऐसा कौन से लोकतंत्र में हो रहा है कि सरकारें आपके खानपान और रहन-सहन को निगमित करने लगें ? यदि ये स्पर्धा शुरू हो गयी तो मुश्किलें कम होने के बजाय और बढ़ जायेंगीं .समाज में शांति कायम हो ही नहीं पाएगी .

हिजाब पर हुड़दंग शुरू कराकर सरकार ने खुद समाज की शांति भंग करने का प्रयास किया है. ये एक आपराधिक कृत्य है .इसे रोका जाना चाहिए और पूरी ताकत से रोका जाना चाहिए .कल को कोई दूसरी सरकार आएगी वो कहेगी की हमारे शंकराचार्य सिर पर धोती क्यों रखते हैं ,ये भी एक तरह का हिजाब है ,इसे भी पाबंद किया जाये ? राजस्थान ,गुजरात ,हरियाणा में अनेक महिलाएं आज भी घूंघट करतीं हैं ,कल को उन्हें भी घूंघट लेने से रोका जाएगा ? नहीं रोका जा सकता क्योंकि वे अल्पसंख्यक नहीं हैं .सरकारें जब नग्नता पर रोक नहीं लगा सकतीं तब हिजाब पर रोक कैसे लगा सकतीं हैं ? संविधान ने सबको निजी स्वातंत्र्य दिया है ,इसमें दखल का हक किसी को नहीं है .खासतौर पर सरकार को तो ये कोशिश करना ही नहीं चाहिए .

सियासत को एक ख़ास रंग देने की मुहीम में लगीं सरकारें आजकल उन्माद का शिकार हैं. इन सरकारों के नेता खुद बहुरूपिये बने घूम रहे हैं लेकिन उन्हें अल्पसंख्यकों के रीति-रिवाजों की चिंता है .समाज सुधार का काम समाज सुधारकों को करने दीजिये आप सरकार चलाइये.विकास पर ध्यान केंद्रित कीजिये.सड़कें,बिजली,पानी शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्थाएं कीजिये.कहाँ हिजाब और खिजाब के फेर में पड़े हुए हैं ?इस छेड़छाड़ से न आप उत्तर प्रदेश जीत सकते हैं और न लोगों का दिल .लोगों के मन में आपके प्रति आक्रोश ही पैदा होगा और कुछ नहीं .

विसंगति ये है कि सरकार जो करे सो सब ठीक और समाज जो करे सो सब गलत. हाल ही में विधानसभा चुनावों के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों ने मतदाताओं के सामने अपने -अपने चुनाव घोषणा पत्रों में जिस तरीके से मतदाताओं के सामने खैरात यानि घूस परोसने की बेशर्मी दिखाई है उसके खिलाफ क़ानून बनाने की पहल कोई सरकार नहीं करती .कोई केंचुआ नहीं बोलता कि ये सब लोकतंत्र को भ्र्ष्ट और दूषित करने वाले ऐलान हैं. भला आप किसी को मुफ़ी में माल क्यों देंगे ?क्यों स्कूटी और पेट्रोल बाँटेंगे .ये खुली रिश्वत है और रिश्वत लेना और देना पहले से कानूनन अपराध है ,किन्तु क़ानून की चिंता जब खुद सरकार चलने वालों को नहीं है तो सरकार बनाने वाले क्यों ऐसे कागजी कानूनों की परवाह करने लगे ?
आप एक तरफ देश को विश्व गुरू बनाने का ख्वाब देखते हैं और दूसरी तरफ उलझे हैं लोगों के खान-पान तथा पहनावे में .अरे भाई अपनी दृष्टि को बदलिए .सबको एक रंग में रंगने की कोशिश मत कीजिये. ये देश बहुरंगी है. इसके रंग न मुगल बदल पाए और न अंग्रेज .फिर आपको ये सनक क्यों सवार है ? सरजू भी सरजू रही .किसी ने गंगाजल का नाम आबे जमजम नहीं किया किसी ने न मथुरा बदली न काशी .संगम हमेशा से संगम रहा तो आप भी निरर्थक कोशिश मत कीजिये नया इतिहास गढ़ने के लिए नया काम कीजिये ,पुराने पर सफेदी या कालिख फेरने से नया इतिहास नहीं लिखा जा सकता .

मुझसे केसरिया ब्रिगेड के लोगों ने सवाल किया कि- क्या मुझे हिजाब पसंद है ? सवाल मेरी पसंद का नहीं है .सवाल दूसरों की पसंद का है. दूसरों की पसंद का सम्मान करने की कूबत हमारे पास होना चाहिए .कल को आप कहेंगे कि दाढ़ी मत रखिये,शिखा मत रखिये,मुंडन मत कराइये ,कान मत छिदवाइये .आप कुछ भी कह सकते हैं.किसी के भी खिलाफ क़ानून बना सकते हैं ,क्योंकि आपकी दृष्टि में मोतियाबिंद आ चुका है .आप सिर्फ वो ही मंजर देखना चाहते हैं जो आपको अच्छा लगता है. दूसरों से आपको कोई लेनादेना नहीं है .दूसरे आपके लिए अपने नहीं दूसरे हैं. .
@ राकेश अचल

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