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कैप्टन का हौसला यानि नया घोंसला, पंजाब के घायल शेर की अंतर्कथा बता रहे वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल

राकेश अचल, लेखक देश के जाने-माने पत्रकार और चिंतक हैं, कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में इनके आलेख प्रकाशित होते हैं।

नयी है लेकिन अप्रत्याशित खबर नहीं है कि पंजाब के मुख्य मंत्री रह चुके कैप्टन अमरिंदर सिंह अपनी नई पार्टी बनाएंगे और भाजपा के साथ चुनावी गठबंधन करेंगे .79 साल के कैप्टन द्वारा नया राजनीतिक दल बनाने का हौसला काबिले तारीफ़ है ,लेकिन ढलती उम्र में उनका ये हौसला उनके आत्म संतोष के अलावा किसी और कुछ नहीं दिला पायेगा .अपनी उपेक्षा से दुखी कैप्टन का अलग दल बनाने का फैसला किसी को चौंकाता नहीं है ,क्योंकि इसका आभास सभी को था .

कैप्टन अमरिंदर सिंह अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए अलग दल बनाने वाले पहले पूर्व मुख्यमंत्री नहीं हैं .एक लम्बी फेहरिस्त है ऐसा करने वालों की ,लेकिन बहुत कम लोगों को कामयाबी मिली.उन्हें आप अपवाद कह सकते हैं .मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती,गुजरात के केशूभाई,दिल्ली के मदनलाल खुराना ऐसे ही नाकाम मुख्यमंत्रियों में गिने जाते हैं .लेकिन हरियाणा के कुछ लाल और बंगाल में ममता बनर्जी उन नेताओं में से हैं जिन्होंने अपना वजूद बनाया और भारत की राजनीति को प्रभावित किया .

पंजाब में कैप्टन के अलग दल बनाने की अंतर्कथा किसी से छिपी नहीं है. इसका श्रेय कांग्रेस के असमर्थ नेतृत्व के साथ ही पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू को दिया जा सकता है .नए दल से न पंजाब के किसानों को कोई लाभ हो सकता है और न खुद अमरिंदर सिंह को.क्योंकि भाजपा का साथ देकर भी वे अब कभी पंजाब के मुख्यमंत्री तो नहीं बन पाएंगे ,हाँ उनका नया दल कांग्रेस के असंतुष्टों के लिए धर्मशाला का काम जरूर कर सकता है. उनके नए दल से पंजाब में भाजपा को थोड़ी सी ताकत मिल सकती है.यानि अकाली दल के अलग होने से जो नुक्सान हुआ है उसकी क्षति हो सकती है .

अमरिंदर सिंह जिन किसानों के आंदोलन के शुभचिंतक रहे हैं उनकी मदद वे एक मुख्यमंत्री के तौर पर तो कर सकते थे किन्तु एक नया दल बनाकर वे किसानों के किसी काम के नहीं हैं .किसानों का मसला या तो केंद्र सरकार को हल करना है या विपक्ष को इसे केंद्र पर दबाब डालकर हल करवाना है. कैप्टन ने पहले ही जाहिर कर दिया है कि वे विपक्ष नहीं हैं.वे सत्तारूढ़ भाजपा के अनुचर हैं और अनुचरों की राजनीति में क्या हैसियत होती है ,दुनिया जानती है ?
मै नहीं कहता कि कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नया दल बनाने का फैसला कर कोई गलत काम किया है. मुमकिन है कि उन्हें यही बेहतर विकल्प लगा हो ,लेकिन वे यदि कांग्रेस में ही अंतिम सांस लेने का फैसला करते तो उनकी गरिमा बनी रहती. अस्सी साल की उम्र में कैप्टन को अपनी महत्वाकांक्षाओं पर काबू करना चाहिए था .जाहिर है कि कांग्रेस में उन्हें जितना मिला वो कम नहीं था .वे कांग्रेस में रहकर भी किसानों की लड़ाई लड़ सकते थे ,किन्तु लड़ाई किसानों की नहीं उनके अपने वजूद की थी .कांग्रेस से अलग रहकर वे ‘घर के रहेंगे और न घाट के’ .नया दल बनाने से बेहतर था कि वे भाजपा में शामिल हो जाते ,भाजपा में शामिल होने पर मुमकिन था कि भाजपा उन्हें आने वाले चुनाव में अपना मुख्यमंत्री का प्रत्याशी बनाकर चुनाव लड़ती .लेकिन जो नहीं होना होता ,वो नहीं होता .कैप्टन अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मार चुके हैं .

नई पार्टी बनाने का ऐलान करने वाले कैप्टन अमरिनद्र सिंह दूसरी बार कांग्रेस से अलग हो रहे हैं. इससे पहले वे ‘ आपरेशन ब्लू स्टार ‘ के विरोध में कांग्रेस से अलग होकर शिरोमणि अकाली दल के साथ रह चुके हैं,लेकिन उन्हें अपनी गलती जल्द समझ आ गयी थी और वे 14 साल बाद दोबारा कांग्रेस में शामिल हो गए. कांग्रेस से ही अपना राजनीतिक जीवन शुरू करने वाले कैप्टन को कांग्रेस ने पंजाब कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष और मुख्यमंत्री का पद एक बार नहीं दो-दो बार दिया लेकिन कैप्टन की भूख खत्म नहीं हुई. वे कांग्रेस के एक छत्र नेता बने रहना चाहते थे .18 सितंबर 2021 को उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा .
राजनीति में उठापटक नयी बात नहीं है. कैप्टन भी इसी उठापटक के शिकार हुए ,लेकिन नई पार्टी की घोषणा करते समय वे ये भूल गए की 1984 और 2021 के बीच राजनीति में बहुत तब्दीली आयी है. बीते 37 साल में बहुत कुछ बदला है. अब कैप्टन के पास किसी को देने के लिए कुछ नहीं है. वे अब न भाजपा को बहुत लाभ दिला सकते हैं और न कांग्रेस का बहुत नुक्सान कर सकते हैं. कांग्रेस अपना नुक्सान खुद करती है .उसे किसी नेता की जरूरत नहीं होती .कैप्टन के पास अब इतना वक्त भी नहीं है की वे एक बार फिर कांग्रेस में वापसी कर सकें .

वे राजीव गांधी के साथी थे,उन्हें राजीव के बेटे का साथ निभाकर शायद ज्यादा मिलता लेकिन राजीव गांधी के बेटे से उनकी पटी नहीं. गलती राहुल की भी है ,उन्हें भी कैप्टन को थोड़ा सा और वक्त देकर अंतिम पारी खेलने का मौक़ा देना चाहिए था .लेकिन ‘हुइए है जो राम रचि रखा,को कह तर्क बढ़ावे साखा .’पंजाब में जो हो रहा है ,वो ही हो रहा है. मुमकिन है कि पंजाब की दशा भी उत्तर प्रदेश जैसी हो जाये .पंजाब एक बार फिर कांग्रेस के लिए सपना बन सकता है अब पंजाब उड़ता हुआ दिखाई दे रहा है. यहां कोई एक राजनीतिक दल इस हालत में नहीं है जो अकेले सत्ता का अश्व बांधकर अपने आंगन में रख सके . बावजूद इसके हम कैप्टन को नई पार्टी कि लिए शुभकामनाएं देते हैं कैप्टन एक घायल शेर हैं ,इसलिए वे घातक भी हो सकते हैं .देखना होगा की पंजाब उनका नए रूप में कैसे और कितना स्वागत करता है ?
@ राकेश अचल

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