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अजब-गजब सत्य:नरक के दरवाजे पर लगी भयंकर आग को बुझाने की कोशिश शुरू

@शब्द दूत ब्यूरो (10 जनवरी 2022)

एक बार फिर नरक के दरवाजे की भयावह आग को बुझाने की कोशिश शुरू हो गई है। इस दुनिया में अनोखी घटनायें होती रहती हैं। आमतौर पर पूरी दुनिया में स्वर्ग और नरक को लेकर अलग अलग शब्दों में बात की जाती है। 

लेकिन तुर्कमेनिस्तान में आज भी एक ऐसा दरवाजा है जिसे नरक का दरवाजा या गेट वे टू हेल के नाम से जाना जाता है। इस रहस्यमयी दरवाजे पर कभी न बुझने वाली भयावह आग लगी हुई है। दुनिया भर के पर्यटकों के लिए यह रहस्यमयी दरवाजा आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। हजारों लोग यहाँ आते हैं। लेकिन अब तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्रपति ने इसे बुझाने का आदेश दिया है। 

दरअसल तुर्कमेनिस्तान  देश के उत्तरी इलाके एक बड़े से गढडे को  ‘गेट्स ऑफ़ हेल’ यानी ‘नरक का दरवाज़ा’ कहा जाता है। इस देश के 70% हिस्से में काराकुम है। 3.5 लाख वर्ग किलोमीटर के इस रेगिस्तान के उत्तर की तरफ गेट क्रेटर नाम का बड़ा-सा गड्ढा है। 69 मीटर चौड़े और 30 मीटर गहरे इस गड्ढे में बीते कई दशकों से आग धधक रही है, लेकिन इसका कारण कोई ‘शैतान’ नहीं बल्कि इससे निकलने वाली प्राकृतिक गैस (मीथेन) है।

कहा जाता है कि कच्चे तेल की खोज के दौरान यहाँ बड़े बड़े गढडे बन गये थे तेल तो मिला नहीं लेकिन मीथेन गैस रिसने लगी। तब संभवतः वहाँ आग लगा दी गई यह सोच कर कि जब मीथेन गैस खत्म हो जायेगी तो आग बुझ जायेगी। हालांकि यह बात प्रमाणित नहीं है। वहीं यह भी कहा जाता है कि यहाँ बना विशाल गड्ढा वास्तव में साठ के दशक में बना और 80 के दशक में ही इसमें आग लगी। हालांकि, इस दावे के भी पुख्ता सबूत नहीं हैं।

इतिहासकारों के अनुसार  ‘नरक के दरवाज़े’ को लेकर जो रहस्य हैं वो बिल्कुल तार्किक हैं। जेरोनिम एक मशहूर इतिहासवेत्ता हैं उनका मानना है कि सोवियत संघ के दौर में केवल उन अभियानों की जानकारी सार्वजनिक की जाती थी जो सफल रहते थे लेकिन नाकाम अभियानों के बारे में बताया नहीं जाता था। उस दौर में सोवियत संघ के पास प्राकृतिक गैस या ईंधन की कोई कमी नहीं थी, वो हर साल सात लाख क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस का उत्पादन करता था। ऐसे में ये संभव है कि गैस को जला देना उनके लिए व्यावहारिक विकल्प रहा होगा।

वो कहते हैं, “स्विट्ज़रलैंड जैसा देश हर साल 15 हज़ार से 16 हज़ार क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल करता था, लेकिन इसका चार गुना जला कर नष्ट कर देना सोवियत के लिए बड़ी बात नहीं थी। इसके लिए तर्कसंगत रूप से ये सोचने की बजाय कि इसे पाइपलाइन में डाल कर दूसरी जगह ले जाया जाए, उन्होंने इसे जलाने का फ़ैसला किया होगा। प्राकृतिक गैस को दूसरी जगह ले जाने के लिए उन्हें यहां बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य करना होता।राष्ट्रपति गुरबांगुली बर्डीमुखामेदोव चाहते हैं कि इसे पर्यावरण और स्वास्थ्य कारणों के साथ-साथ गैस निर्यात बढ़ाने के प्रयासों के रूप देखा जाए। एक संदेश में राष्ट्रपति गुरबांगुली ने कहा, “हम महत्वपूर्ण प्रकृतिक संसाधन खोते जा रहे हैं जिनसे हमें बड़ा लाभ हो सकता था। हम इसका इस्तेमाल अपने लोगों के जीवन को बेहतर करने के लिए कर सकते थे। उन्होंने अधिकारियों का आदेश दिया है कि वो इस आग को बुझाने का कोई तरीका खोजेंद्ध

हालांकि ये पहली बार नहीं है जब तुर्कमेनिस्तान ‘गेटवे टू हेल’ में लगी इस आग को बुझाने की कोशिश कर रहा है। इससे पहले 2010 में भी राष्ट्रपति ने विशेषज्ञों को इस आग को बुझाने के तरीके खोजने के लिए कहा था। जेरोनिम पेरोविक कहते हैं कि दुर्भाग्य से ये एक ऐसी समस्या है जिसका अब तक कोई हल नहीं निकल पाया है।यह क्रेटर तुर्कमेनिस्तान के सबसे लोकप्रिय पर्यटक केंद्रों में से एक है। साल 2018 में राष्ट्रपति ने आधिकारिक तौर पर इसका नाम बदलकर ‘शाइनिंग ऑफ़ काराकुम’ रख दिया था।

हर साल क़रीब छह हज़ार सैलानियों वाले इस देश के लिए मीथेन उगलने वाला ये गड्ढा देश का सबसे बड़े पर्यटन स्थलों में से एक बन चुका है। काराकुम रेगिस्तान में ये गड्ढा रात को भी दूर से दिखाई देता है और कई सैलानी इसे देखने जाते हैं

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